(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) नकली मुद्रा का खतरा (Danger Posed by Fake Currency)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) नकली मुद्रा का खतरा (Danger Posed by Fake Currency)



हाल ही में, देश की आर्थिक संप्रभुता की सुरक्षा के उद्देश्य से राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने विशाखापत्तनम के फर्जी भारतीय मुद्रा नोट मामले में तीसरा पूरक चार्जशीट दायर कर दिया है। गंभीर बात यह है कि इस मामले में बांग्लादेशी तस्कर भी संलिप्त थे और यह देश की आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील मामला है।

DNS में आज हम आपको जाली करेंसी की दिक्कत के बारे में बताएँगे और साथ ही समझेंगे इससे जुड़े कुछ दूसरे पक्षों को भी ….

जाली मुद्रा ऐसी मुद्रा होती है जो सरकार की अनुमति के बिना अवैध तरीके से बनायी एवं प्रचालित की जाती है। जाली मुद्रा, जितना सम्भव हो, वैध मुद्रा से मिलती-जुलती बनायी जाती है ताकि लोगों को इसके अवैध होने का आसानी से पता न चल सके।

भारतीय मुद्रा के अधिकांश नकली नोट पाकिस्तान में छपते हैं और फिर सीधे या अन्य देशों जैसे बांग्लादेश या नेपाल के एक नेटवर्क के माध्यम से प्रवेश करते हैं। हाल ही में, पश्चिम बंगाल में कोलकाता के पास मालदा जिला जाली करेंसी के एक केंद्र के रूप में उभरा है।

बाजार में नकली करेंसी आने की वजह से यहां मौजूद धन की मात्रा में वृद्धि हो जाती है. इसकी वजह से माल और सेवाओं की भारी मांग होने लगती है. इसका परिणाम यह होता है कि बाजार में मुद्रास्फीति बढ़ जाती है। स्थिति और भी बुरी तब होती है जब बैंक इन फर्जी नोटों को लेने से मना करते हैं. इस तरह बैंकों की गैर-प्रतिपूर्ति की नीति लागू होती है यानी बैंक इस नुकसान की भरपाई नहीं करते हैं। इससे मुद्रा का अवमूल्यन होता है। साथ ही, इससे जनता के विश्वास की हानि होती है, माल की कालाबाजारी होती है और उत्पादों का अवैध भंडारण होता है। कुल मिलाकर जाली मुद्रा का वितरण भारत की अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है। इसके अलावा, इससे उत्पन्न राजस्व का उपयोग आतंकवादियों द्वारा भारत के खिलाफ तमाम तरह के कामों को अंजाम देने के मकसद से इस्तेमाल में लाया जाता है।

इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं. सरकार ने राज्य सुरक्षा एजेंसियों और केंद्र के बीच नकली नोटों से जुड़ी सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए गृह मंत्रालय में एक विशेष नकली नोट समन्वय यानी FCORD समूह का गठन किया है। आतंक के वित्तपोषण और जाली मौद्रिक मामलों की जांच के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने एक आतंकवाद फंडिंग और नकली मुद्रा इकाई यानी TFFC की स्थापना की है। 1967 के गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत, इस तरह के अपराध को आतंकी कृत्य के समान घोषित किया गया है। इसके अलावा सरकार ने नकली नोटों की तस्करी और प्रचलन को रोकने के लिए बांग्लादेश के साथ एक समझौता भी किया है।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी के बारे में आपको बताएं तो यह एक संघीय जांच एजेंसी है, जिसकी स्थापना भारत सरकार द्वारा भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए साल 2009 में एनआईए एक्ट, 2008 के तहत किया गया था। एनआईए के पास समवर्ती अधिकार क्षेत्र हैं जिससे इसे देश के किसी भी भाग में आतंकवादी हमले की जांच पड़ताल करने का अधिकार प्राप्त होता है। इसके जांच के दायरे में देश की प्रभुसत्ता एवं अखंडता को खतरा पहुंचाने वाले हमले, बम विस्फोट, हवाई जहाज तथा समुद्री जहाज और परमाणु संस्थानों पर किए जाने वाले हमले शामिल हैं। आतंकवादी हमलों के अलावा जाली मुद्रा, मानव तस्करी, ड्रग्स या मादक पदार्थ, संगठित अपराध, जबरन धन वसूलने आदि से संबंधित अपराध भी इसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

ग़ौरतलब है कि पिछले साल ही एनआईए संशोधन अधिनियम, 2019 के जरिए एनआईए के क्षेत्राधिकार में वृद्धि करते हुए इसे जाली मुद्रा से जुड़े अपराधों की जांच पड़ताल करने और अभियोग चलाने का अधिकार दिया गया था।

एनआईए ने 315 मामलों को रजिस्टर कर उसकी जांच की है और चार्ज-शीट के प्रस्तुत करने के बाद सुनवाई में 60 मामलों में पूर्णतया या आंशिक तौर पर फैसला कर दिया गया है। 54 मामलों में दोषसिद्धि हुई है और एनआईए की दोषसिद्धि दर 90 प्रतिशत है।