(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्रीमी लेयर - आरक्षण पर विवाद (Creamy Layer and Disputes on Reservation)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्रीमी लेयर - आरक्षण पर विवाद (Creamy Layer and Disputes on Reservation)


हाल ही में केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से एक प्रश्न पर सुक्षाव मांगा है कि क्या क्रीमी लेयर की अवधारणा को SC और ST पर भी लागू करना चाहिये तथा सरकार ने इस प्रश्न को 7 जजों वाली बेंच द्वारा सुनवाई के लिये भी आग्रह किया है।

हमारे आज के DNS में हम जानेंगे कि क्या है क्रीमी लेयर की अवधारधरणा तथा इसके साथ ही इस सम्बन्ध से जुडे़ कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों पर भी चर्चा करेंगे।

  • क्रीमी लेयर किसी समूह के उस हिस्से को कहते है जो अपने समूह में बाकी लोगों से आर्थिक व सामाजिक रूप से सक्षम है। लेकिन इसकी परिभाषा बहुत विस्तृत है क्रीमि लेयर में मुख्यतः निम्न प्रकार के लोग आते है।
  • व्यक्ति जो संवैधानिक पदों पर आसीन है।-जैसे राष्ट्रपति ,उप-राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के न्यायाधीश, UPSC के चेयरमैन,मुख्य चुनाव आयुक्त , CAG इत्यादि।
  • केन्द्र व राज्यों के ग्रुप A व ग्रुप B के अधिकारी तथा बैंको PSUs बीमा कंपनियों विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर आदि के समकक्ष अधिकारी सेना तथा अर्धसैनिक बलों में कर्नल व उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी तथा ऐसे व्यक्ति जिनकी वार्षिक आया 8 लाख से अधिक हो क्रीमी लेयर की श्रेणी में रखा गया है।
  • दरअसल Means text और क्रीमी लेयर की अवधारणा सबसे पहले इंदिरा साहनी v/s Union of India Case 1992 में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दी गई थी। इस case की सुनवाई 9 जजों वाली बेंच ने की थी।
  • इस महत्वपूर्ण केस में मंडल आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए OBC यानि other backward clones को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की कही गयी थी। लेकिन इसी केस ने आरक्षण को अधिकतम 50 प्रतिशत तक सीमित करने की बात भी कही थी।
  • इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आरक्षण को सिर्फ प्रारम्भिक नियुक्तियों पर ही लागू किया जाये इसे प्रमोशन इत्यादि में लागू न किया जाये।
  • हालांकि इंदिरा साहनी केस ने आरक्षण के पन्नों पर एक नया अध्याय शुरू कर दिया जिसके बाद संसद ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर गतिरोध पैदा करने के लिये 77वाँ, 81 वाँ ,82वाँ और 85वाँ संविधान संशोधन किया और आरक्षण को प्रमोशन व Carry Forward Quota पर भी लागू किया
  • संसद के इस संशोधनों को चुनौती देने के लिये कई केस सुप्रीम कोर्ट मे फाइल किये गये जिसमे 2006 का नागराज केस बहुत प्रसिद्ध है।
  • इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने सभी चारों सशोधनों की संवैधानिकता बनाये रखी तथा क्रीमी लेयर की अवधारणा को SC व ST समुदाय पर भी लागू करने की बात कही। जबकि इंदिरा साहनी केस में इसे सिर्फ OBS पर लागू किया गया था।
  • नागराज केस के लगभग एक दशक बाद हुये जरनैल सिंह केस में 5 जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता मे कोर्ट ने क्रीमी लेयर की अवधारणा को Right to equality के आधार पर सही ठहराया तथा कहा कि आरक्षण के आधार पर सही ठहराया तथा कहा कि आरक्षण का लाभ weakest of the weak यानि सबसे कमजोर व्यक्तियों के लिये है जिसे क्रीमी लेयर द्वारा नही छीना जाना चाहिये।