(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) कोरल ब्लीचिंग (Coral Bleaching)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) कोरल ब्लीचिंग (Coral Bleaching)



ग्रेट बैरियर रीफ पर क्यों हो रही कोरल ब्लीचिंग?

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है की आने वाले हफ़्तों में ऑस्ट्रेलिया का ग्रेट बैरियर रीफ गर्मी के दौर से गुज़रेगा ।इसकी वजह से इन हफ़्तों में कोरल ब्लीचिंग की वजह से ग्रेट बैरियर रीफ को भारी नुक्सान होने की गुंजाइश है।

सागरों के बढ़ते हुए तापमान की वजह दरअसल में रीफ की बिगड़ती हुई सेहत की असल वजह है । ग्रेट बैरियर रीफ सागरीय पार्क अकार में इटली के बराबर है और यह 2300 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है । ये पार्क तकरीबन 3000 प्रवाल भित्तियों का घर है और इसमें 600 द्वीप शामिल हैं । इसके अलावा इसमें 1625 तरह की मछलियां 133 प्रजातियों की शार्क मछलियां और 600 तरह के कोरल पाए जाते हैं।

प्रवाल विरंजन या कोरल ब्लीचिंग क्या है?

तापमान , सूर्य के प्रकश , पोषक तत्वों में बदलाव की वजह से कोरल अपने ऊतकों में रहने वाले शैवालों को अलग कर देते हैं जिसकी वजह से प्रवाल विरंजन या कोरल ब्लीचिंग की समस्या पैदा होती है ।

कोरल ब्लीचिंग होना कोरल की मौत नहीं है जैसा की आम तौर पर समझा जाता है लेकिन इसके कारण कोरल के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो जाता है जिससे उनकी मरने की संभावना बढ़ जाती है।

महासागरों का बढ़ता तापमान कोरल ब्लीचिंग की सबसे बड़ी वजह है । मिसाल के तौर पर साल 2005 में कोरल ब्लीचिंग की वजह से अमेरिका ने कैरेबियन सागर में तकरीबन अपने आधे कोरल को खो दिया था।

लेकिन राष्ट्रीय समुद्री मौसम प्रशासन NOAA के मुताबिक़ ब्लीचिंग की घटना सिर्फ महासागरों के बढ़ते तापमान की ही वजह से नहीं है । जनवरी 2010 में फ्लोरिडा में ठन्डे पानी की वजह से भी ब्लीचिंग की घटना देखी गयी थी जिसकी वजह से कुछ कोरल ख़त्म हो गए थे।

ग्रेट बैरियर रीफ पूरी दुनिया के कोरल रीफ पारिस्थितिकी तंत्र का 10 फीसदी हिस्सा है । आज ऑस्ट्रेलिया स्थित ग्रेट बैरियर रीफ एक समुद्री पार्क और विश्व विरासत स्थल के रूप में जाना जाता है । ग्रेट बैरियर रीफ में कई तरह की गतिविधियां संचालित होती है और यह ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में हर साल तकरीबन 516 बिलियन डॉलर का योगदान करता है । इसके अलावा यह क्षेत्र 70000 रोज़गार भी हर साल मुहैय्या कराता है।

2019 की ऑस्ट्रेलियाई सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ग्रेट बैरियर रीफ के लिए जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ा खतरा है । अन्य खतरों में तटों के किनारे पर निर्माण गतिविधियां , गैर कानूनी तरीके से मछली पकड़ना और इंसानी हस्तक्षेप अहम् हैं।

साल 2016 17 में कोरल ब्लीचिंग की घटना की वजह से प्रवाल भित्तियों पर घातक असर देखने को मिले थे । हालांकि ग्रेट बैरियर रीफ का कुछ ही हिस्सा इसके असर में आया था बाकी हिस्सा अभी भी अच्छी दशा में बताया जा रहा है।

कोरल रीफ क्या होते हैं?

प्रवाल या कोरल्स फोटोसिंथेटिक शैवाल के साथ पारस्परिक रूप से साथ में रहते हैं, जिसे ज़ोक्सांथेला ( zooxanthellae ) कहा जाता है। कोरल प्रवाल भित्तियों की एक मजबूत कैल्शियम कार्बोनेट संरचना बनाते हैं और ज़ोक्सांथेला के लिए सुरक्षा और एक घर प्रदान करते हैं। इसके बदले मे ज़ोक्सांथेला मूंगा को पोषक तत्व प्रदान करते हैं। जब महासागर की सतह एक सीमा से अधिक गरम हो जाती है, तब कोरल ज़ोक्सांथेले को बाहर निकाल देता है, जिससे 'प्रवाल विरंजन' या कोरल ब्लीचिंग की घटना होती है। इस दौरान अक्सर ही प्रवालों की मौत हो जाती है। प्रवाल ज़्यादातर कम गहराई पर पाए जाते हैं, क्योंकि अधिक गहराई पर सूर्य के प्रकाश व ऑक्सीजन की कमी होती है। प्रवालों के विकास के लिये साफ़ पानी की ज़रुरत होती है क्योंकि पानी में मौजूद गन्दगी की वजह से प्रवालों का मुंह बंद हो जाता है और वे मर जाते हैं।

प्रवालों का वितरण

दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रवाल हिंद-प्रशांत क्षेत्र या इंडो पसिफ़िक रीजन में पाए जाते हैं। ये भूमध्य रेखा के 30 डिग्री तक के क्षेत्र में पाए जाते हैं।

विश्व में पाए जाने वाले कुल प्रवाल का लगभग 30% हिस्सा दक्षिण-पूर्वी एशिया क्षेत्र में पाया जाता है। यहाँ प्रवाल दक्षिणी फिलिपींस से पूर्वी इंडोनेशिया और पश्चिमी न्यू गिनी तक पाए जाते हैं।

प्रशांत महासागर में स्थित माइक्रोनेशिया, वानुआतु, पापुआ न्यू गिनी में भी प्रवाल पाए जाते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर स्थित ग्रेट बैरियर रीफ दुनिया की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति है। भारतीय समुद्री क्षेत्र में मन्नार की खाड़ी, लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार आदि द्वीप भी प्रवालों से बने हुए हैं। प्रवाल लाल सागर और फारस की खाड़ी में भी पाए जाते हैं।

प्रवाल विरंजन या कोरल ब्लीचिंग का होना समुद्री परिस्थतिक तंत्र के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है ये न सिर्फ समुद्र में रहने वाले समुद्री जीवों के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाता है बल्कि ये समुद्र में नाइट्रोजन के स्तर को कायम रखने में भी मददगार है । इसके अलावा कई मछलियों की प्रजातियां भी कोरल्स को अपने निवास और प्रजनन के लिए इस्तेमाल करती हैं कोरल्स के ख़त्म हो जाने पर इन मछलियों के प्रवास पर भी गहरा असर हो सकता है । इसके अलावा मूंगे की चट्टानों में कई तरह की औषधियां और खाद्य पदार्थ भी पाए जाते हैं । प्रवाल भित्तियों के नष्ट होने की दशा में समुद्री जीवन पर तो असर पडेगा ही साथ साथ पूरा वातावरण और पारिस्थितकी तंत्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा।