(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) आरटीआई के दायरे में चीफ जस्टिस ऑफिस (CJI Office Under RTI)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) आरटीआई के दायरे में चीफ जस्टिस ऑफिस (CJI Office Under RTI)


उच्‍चतम न्‍यायालय ने अपने एक हालिया फैसले में कहा है कि भारत के प्रधान न्‍यायाधीश का कार्यालय भी अब सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में इस बात का भी ज़िक्र किया है कि सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल निगरानी रखने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा किसी भी सूचना को लोकहित में उजागर करते समय न्‍यायिक स्‍वतंत्रता का भी ध्‍यान रखना होगा।

बता दें कि प्रधान न्‍यायाधीश न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्‍यक्षता वाली पांच न्‍यायाधीशों की संविधान पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के 2010 के निर्णय को सही बताते हुए और इसके खिलाफ दायर हाई कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल और शीर्ष अदालत के केंद्रीय सार्वजनिक सूचना अधिकारी की अपील को ख़ारिज करते हुए ये निर्णय दिया है। दरअसल इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब RTI कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन दायर किया और न्यायाधीशों की संपत्तियों पर सूचना मांगी। RTI कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल द्वारा किए गए आवदेन के जवाब में उन्हें सूचना देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद RTI कार्यकर्ता ने सूचना दिये जाने से इनकार के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में पहली अपील दाख़िल की। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इस अपील को भी खारिज कर दिया।

इसके बाद RTI कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल इस मामले को लेकर केंद्रीय सूचना आयोग CIC पहुंचे। साल 2009 में केंद्रीय सूचना आयोग CIC ने इस मामले पर हस्तक्षेप करते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस आधार पर न्यायाधीशों की संपत्तियों पर सूचना का खुलासा करने को कहा कि सीजेआई का कार्यालय आरटीआई अधिनियम के दायरे में आता है। केंद्रीय सूचना आयोग की इस करवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीआईसी आदेश के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया और दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय सूचना आयोग CIC के आदेश पर रोक लगा दी।

इस मामले में एक ओर जहां दिल्ली हाईकोर्ट का कहना था कि संपत्ति की जानकारी के मामले में जजों के साथ नेताओं की तरह व्यवहार नहीं किया जाना चाहिये तो वहीं सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि बहुत अधिक पारदर्शिता न्यायपालिका की आज़ादी में खलल डाल सकती है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि वो न्यायाधीशों की संपत्तियों की घोषणा करने के खिलाफ नहीं है। लेकिन इसके लिए संसद को इस तरह का ऐलान किये जाने से संबंधित एक कानून बनाना चाहिए और ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस कानून का दुरुपयोग नहीं होगा। इस मामले में टर्निंग पॉइंट तब आया जब 2 सितम्बर 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने केंद्रीय सूचना आयोग CIC के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें ये कहा गया था कि चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया का कार्यालय आरटीआई अधिनियम के दायरे में आता है। साथ ही इस कानून के तहत न्यायाधीशों की संपत्तियों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस एकल पीठ के फैसले को दो सदस्यीय पीठ के समक्ष चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने इस अपील को स्वीकार करते हुए इस मामले पर फैसला लेने के लिए तीन सदस्यीय विशेष पीठ गठित किए जाने आ आदेश दिया और उच्च न्यायालय ने इस अपील पर फैसला सुरक्षित रखते हुए 12 जनवरी, 2010 को कहा कि सीजेआई का कार्यालय आरटीआई अधिनियम के दायरे में आता है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा ये फैसला सुनाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल और शीर्ष अदालत के केंद्रीय सार्वजनिक सूचना अधिकारी ने उच्च न्यायालय और केंद्रीय सूचना आयोग के आदेशों के खिलाफ तीन अपील दायर की। साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को एक संविधान पीठ के पास भेजा। इसके बाद 04 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में फैसला सुरक्षित रखा कि क्या चीफ जस्टिस ऑफ़ इण्डिया का कार्यालय आरटीआई अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण है या नहीं।

इसी मामले पर सुनवाई करते हुए 13 नवम्बर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 2010 में दिये गए उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया का कार्यालय आरटीआई अधिनियम के दायरे में आता है। साथ ही इस कानून के तहत न्यायाधीशों की संपत्तियों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

आरटीआई एक्ट के बारे में आपको बताएं तो ये 2005 में बना भारत सरकार का एक क़ानून है। इसका मक़सद नागरिकों को सूचना का अधिकार उपलब्ध करना है। साथ ही ये कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग यानी DoPT सूचना का अधिकार और केंद्रीय सूचना आयोग का नोडल विभाग है। इस क़ानून के तहत भारत का कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी अथॉरिटी से सूचना माँग सकता है। संबंधित अथॉरिटी को 30 दिनों के भीतर नागरिक को जानकारी उपलब्ध करानी होती है। अगर मांगी गई सूचना जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ी है तो ऐसी सूचना को 48 घंटे के भीतर ही उपलब्ध करना होता है। तय समय सीमा में सूचना न पाने जैसी स्थिति में स्थानीय से लेकर राज्य और केंद्रीय सूचना आयोग में अपील की जा सकती है। अगर कोई ऐसी सूचना मांगी गई हो जिससे देश की संप्रभुता, एकता और अखण्डत पर गलत असर पड़े, तो ऐसे में सूचना देने से इनकार किया जा सकता है। ये क़ानून पूरे भारत में लागू है।

बीते दिनों इस क़ानून के सेक्शन 13, 16 और 27 में बदलाव करने के लिए संसद ने सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक, 2019 पारित किया था। मौजूदा वक़्त में सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक, 2019 क़ानून का रूप ले चूका है और जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पूरे देश में ये क़ानून लागू है।