(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) कार्टोसैट-3 (India's Eye in Space: CARTOSAT 3)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) कार्टोसैट-3 (India's Eye in Space: CARTOSAT 3)


बीते दिनों अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ने एक और बड़ी कामयाबी हासिल की। भारतीय अंतरिक्ष अनुंसधान परिषद् इसरो ने थर्ड जनरेशन के कार्टोसैट-3 उपग्रह के साथ ही अमेरिका के 13 नैनो सैटेलाइटों को भी सफलतापूर्वक सूर्य तुल्यकालिक कक्षा यानी Sun Synchronous Orbit में स्थापित कर दिया। इस उपग्रह को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित इसरो के सतीश धवन स्पेस सेंटर से PSLV - C47 के ज़रिए लॉन्‍च किया गया। इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत ये है कि कार्टोसेट 3 को आसमान में भारत की आंख कहा जा रहा है।

DNS में आज हम जानेंगे कि कार्टोसैट 3 उपग्रह क्या है। साथ ही इसकी उपयोगिता क्या है ?

कार्टोसेट 3 कार्टोसैट सीरीज का 9वां सैटलाइट है। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इसरो का यह 74वां लॉन्च यान मिशन है। कार्टोसेट 3 पूर्व के कार्टोसेट 2 से काफी अडवांस्ड है। दरअसल, कार्टोसेट 3 में लगे हाई रिजोल्यूशन स्पेशियल कैमरे (High Resolution Spatial Camera) होने के अलावा इनका ग्रांउड रिजोल्यूशन (Cartosat-3 Ground Resolution) भी काफी है। इसकी मदद से धरती से करीब 509 किमी की ऊंचाई से यह बेहद साफ तस्वीरें ले सकेगा। आपको यहां पर ये भी बता दें कि भारत के पास अब तक जितने ऑब्जरवेटरी सैटेलाइट्स (Observatory Satellite) मौजूद हैं उनमें कार्टोसेट 3 सबसे उन्नत किस्म का है। इसके अडवांस्ड स्पेशियल रिजोल्यूशन (Advanced Spatial Resolution) को आप इस तरह से भी देख सकते हैं कि जमीन पर मौजूद एक फीट की चीज को भी इस सैटेलाइट की मदद से आसानी से पहचाना जा सकता है।

इसकी मदद से भारत को अपनी सुरक्षा में भी काफी बढ़त मिल जाएगी। लिहाजा यह कहना गलत नहीं होगा कि काटोसेट 3 भविष्य में भारत की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाएगा। यह सुरक्षाबलों के लिए भी कई तरह से फायदेमंद होगा। इसकी मदद से स्पेस-सर्विलांस (Space Servilance) की क्षमता बढ़ेगी। कार्टोसेट 3 की मदद से भारत के तटीय इलाकों की बेहद सटीक जानकारी हासिल हो सकेगी जो इन इलाकों की इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग में मददगार साबित होगी। इसके अलावा यह सेटेलाइन सड़कों के नेटवर्क को मॉनिटर करने, नियमन, भौगोलिक स्थितियों में होने वाले बदलावों की भी जानकारी मुहैया करवाएगा। गौरतलब है कि काटोसेट-3 1623 किग्रा वजनी है। यह पांच वर्षों तक काम करेगा।

यह पहला ऐसा सैटेलाइट है जो पेनक्रोमैटिक मोड (Panchromatic Mode) में 16 किमी दूरी की स्पेशियल रेंज (Spatial Range) कवर कर सकता है। इसके अलावा यह मल्टी-स्पेक्ट्रम और हाइपर स्पेक्ट्रम (Multispectral and Hyperspectral) को भी आसानी से कैप्चर कर सकता है। सुरक्षा के लिहाज से यह सैटेलाइट इस लिए भी बेहद खास है क्योंकि इससे मिली इमेज को सेना जूम कर आंकलन कर सकती है। यही वजह है कि यह सैटेलाइट आतंकियों की पॉजीशन और उनके आतंकी ठिकानों की सटीक जानकारी सेना को मुहैया करवा सकता है। इन उपग्रहों से प्राप्त हाई रेज़ोल्यूशन छवियों की आश्वयकता विविध अनुप्रयोगों में उपयोगी हैं, जिनमें कार्टोग्राफी, अवसंरचना योजना निर्माण, शहरी एवं ग्रामीण विकास, उपयोगिता प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधन इवेंट्री एवं प्रबंधन, आपदा प्रबंधन शामिल हैं। गौरतलब है कि कार्टोसेट श्रृंखला के दो उपग्रह पहले ही से अंतरिक्ष में काम कर रहे है। इन्ही उपग्रहों के ज़रिये वो तस्वीरें मिली थीं जिनकी मदद से लाइन ऑफ कंट्रोल के पार पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक की गई थी और शायद यही कारण था की पाकिस्तान ने कार्टोसैट उपग्रह के प्रक्षेपण पर आपत्ति जताई थी।

पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल PSLV के बारे में बताएं तो ये भारत की तीसरी पीढ़ी का लॉन्च वीइकल है। यह भारत का पहला लॉन्च वीइकल है जिसमें लिक्विड स्टेज है यानी लिक्विड रॉकेट इंजन का इस्तेमाल किया गया है। 1994 में पहली बार इसका सफल लॉन्च हुआ था। तब से यह भारत के विश्वसनीय और बहुमुखी वर्कहोर्स लॉन्च वीइकल के तौर पर उभरा है। इसी वीइकल की मदद से साल 2008 में चंद्रयान-I अंतरिक्षयान को चांद पर और साल 2013 में मार्स ऑरबिटर स्पेसक्राफ्ट को मंगल ग्रह पर भेजा गया था।

पीएसएलवी की मदद से मुख्य रूप से वैसे सैटलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजा जाता है जिनकी मदद से धरती की निगरानी की जाती है या फिर तस्वीर ली जाती है। ऐसे सैटलाइट्स को रिमोट सेंसिंग सैटलाइट्स कहा जाता है। उन तस्वीरों के आधार पर जमीन के किसी खास हिस्से के बारे में सूचना एकत्रित की जाती है। पीएसएलवी आमतौर पर अंतरिक्ष की सन सिंक्रोनस सर्कुलर पोलर ऑर्बिट्स में सैटलाइट्स को भेजता है। बता दें कि सन सिंक्रोनस सर्कुलर पोलर ऑर्बिट्स पृथ्वी से 600 से 900 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित होती है। इसके अलावा पीएसएलवी आमतौर पर 1750 किलोग्राम तक के सैटलाइट्स को सन सिंक्रोनस सर्कुलर पोलर ऑर्बिट्स में भेजता है।

कार्टोसेट 3 के बाद इसरो दो और सर्विलांस सैटलाइट लॉन्च करेगा जिनमें रीसैट-2 बीआर 1 और रीसैट2बीआर2 शामिल हैं। इसरो इन्हें पीएसएलवीसी 48 और सी49 की मदद से दिसंबर में श्रीहरिकोटा से लॉन्च करेगा । इससे पहले इसरो ने 22 मई को रीसैट-2बी और 1 अप्रैल को ईएमआईसैट (शत्रु के रेडार पर नजर रखने के लिए बनाई गई सैटलाइट) लॉन्च किया था । उस दौरान चंद्रयान-2 मिशन के कारण ऑपरेशनल सैटलाइट की लॉन्चिंग में इतना समय लगा। दिलचस्प बात ये है की इसरो के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब श्रीहरिकोटा से साल में हुए सभी सैटलाइट लॉन्च सैन्य उद्देश्य से हुई हैं।