(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) आश्वित्ज शिविर (Auschwitz Camp)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) आश्वित्ज शिविर (Auschwitz Camp)


द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की नाज़ी सरकार ने तकरीबन पूरे यूरोप के तकरीबन 17 लाख लोगों को कंसंट्रेशन कैंप में मौत के घाट उतार दिया था । इन 17 मौत के शिविरों में सबसे कुख्यात और सबसे बड़ा शिविर था औश्वित्ज़ कैंप । औस्वित्ज़ शिविर को होलोकॉस्ट के इतिहास का केंद्र माना जाता था और इस शिविर में हुई मौतें आज भी किसी का भी दिल दहला देने के लिए काफी हैं । 27 जनवरी को इस होलोकॉस्ट में बचे हुए लोग औस्वित्ज़ के दर्दनाक हादसे से आज़ादी की 75 वीं बरसी मना रहे हैं ।

आज के DNS में हम जानेंगे होलोकॉस्ट के इतिहास के बारे में और जानेंगे की क्यों 27 जनवरी को होलोकॉस्ट दिवस के रूप में मनाया जाता है।

द्वितीय विश्व युद्ध अपने आखिरी दिनों में था । बात है नाज़ी साम्राज्य के पतन से कुछ महीने पहले की । नाज़ी अधिकारियों ने जबरन युद्धबंदियों को पूरे यूरोप में फैले शिविरों में भेजना शुरू कर दिया । बंदियों को कपकपाती ठण्ड में लम्बी दूरी तक पैदल बिना खाने पीने के जबरन एक शिविर से दुसरे शिविर भेजा जा रहा था । ये जबरन स्थानांतरण कई दफे हुआ था । इस स्थानांतरण में कइयों ने दम तोड़ दिया। कई लोगों का ये भी मानना था की बंदियों को एक शिविर से दुसरे शिविर इसलिए भी भेजा जाता था ताकि शिविरों में रह रहे बंदियों को कभी आज़ादी न मिल सके और नाज़ी अधिकारीयों के मानवता के खिलाफ इस कुकृत्य को दबाया भी जा सके ।कई बंदी ऐसे भी थे जिनके बीमार या विकलांग होने की वजह से उन्हें शिविरों में ही मरने के लिए छोड़ दिया जाता था।

मित्र देशों की सेनाएं पश्चिम की ओर बढ़ रही थीं जबकि सोवियत संघ की लाल सेना के सिपाही यातना शिविरों से बचे हुए कैदियों को छुड़ा रहे थे । जुलाई 1944 में लाल सेना के सिपाहियों ने पोलैंड के मजदानेक शिविर को आज़ाद कराया।

27 जनवरी 1945 को सेना औस्वित्ज़ में घुस गयी जहां उसने कई बीमार , भूखे और हाल बेहाल कैदियों को यातना शिविर से बाहर निकाला । साल 2005 में संयुक्त राष्ट्र ने 27 जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय होलोकॉस्ट दिवस के रूप में घोषित किया ।इसके अलावा जब लाल सेना ने औस्वित्ज़ में कदम रखे तो उन्हें कई कैदियों के सामानों का ज़खीरा भी मिला जिसे नाज़ी अधिकारीयों ने उनसे छीन लिया था । संयुक्त राष्ट्र होलोकॉस्ट संग्रहालय के मुताबिक़ इन सामानों में लाखो कपडे, जूते और अन्य कई व्यक्तिगत सामान बरामद किये गए । कैदियों में कई सारे ऐसे कैदी थे जिन्हे लम्बे समय से भूखा रखा गया था ।ये भूखे कैदी इतने कमज़ोर हो गए थे की इलाज़ के बावजूद कुछ ही दिनों में इनकी मौत हो गयी ।नाज़ी अधिकारीयों और सैनिकों ने कई सारे सबूतों को मिटा दिया था लेकिन इसके बावजूद भी कई सारी गुमनाम कब्रें और लूटा हुआ सामान आज भी नाज़ियों के यहूदियों पर किये गए ज़ुल्मों की दास्तान बयान कर रहे हैं।

ऐतिहासिक आंकड़ों से पता चलता है की नाज़ी अधिकारियों ने हालांकि यातना शिविरों खासकर औस्वित्ज़ में यहूदियों का वज़ूद मिटाने की कई कोशिशें की । औस्वित्ज़ शिविरों में बचे हुए कैदियों ने नाज़ी अधिकारीयों के ज़ुल्म की कहानियां बयान की हैं ।सारे यातना शिविरों में से औस्वित्ज़ की खासियत इस बात से ज़ाहिर होती है की इस शिविर को ख़ास दो मक़सदों के लिए बनाया गया था । पहला इस शिविर में कैदियों को गुलामों की तरह तैयार किया जाता था । दूसरा औस्वित्ज़ में कई गैस चैम्बर थे जिनका इस्तेमाल कैदियों को मारने के लिए किया जाता था।

औस्वित्ज़ कैंप पोलैंड के एक कसबे ओस्वीसिम के बड़े हिस्से में फैला हुआ था । औस्वित्ज़ को तीन हिस्से में बांटा गया था । औस्वित्ज़ के दुसरे हिस्से में लोगों को ख़त्म करने के लिए गैस चैम्बर्स बनाये गए थे । औस्वित्ज़ के तीसरे हिस्से में कई सारे छोटे शिविरों को बनाया गया था जिसमे नाज़ियों ने कई यहूदियों को जबरन मज़दूरी के लिए मज़बूर किया था । इसके अलावा इन ग़ुलामों को जर्मनी की कई सारी फैक्ट्रियों में काम करने के लिए भेजा जाता था।

नाज़ियों ने सिर्फ यहूदियों को अपनी क्रूरता का निशाना नहीं बनाया बल्कि कई सारे अन्य समूहों को भी अपनी बर्बरता का शिकार बनाया । होलोकॉस्ट में बचे कई सारे लोग अन्य समुदायों से भी आते हैं जिनमे रोमा , सिंती , सोवियत , समलैंगिक,विकलांग लोग भी थे । रोमा समुदाय के कई लोगों को औस्वित्ज़ शिविर में परिवार सहित अमानवीय और क्रूर यातनाओं से गुज़रना पड़ता था । इसके अलावा इस समुदाय के लोगों पर कई यातनापूर्ण प्रयोग भी किये जाते थे । नाज़ियों की इन यातनाओं के पीछे कई कई कारणों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है । इन कारणों में नस्लवाद , राजनैतिक धारणाएं , धर्म और कई अन्य कारणों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है।

तकरीबन 13 लाख लोगों को जबरन औस्वित्ज़ शिविर में भेजा गया इनमे से 11 लाख लोग मौत के मुंह में समा गए जिनमे से ज्यादातर यहूदी थे।

दुसरे विश्व युद्ध के आखिर में यूरोप के कई शहरों में मुक़द्दमे चलाये गए । ये मुक़द्दमे उन नाज़ी अधिकारीयों और लोगों के खिलाफ थे जो इन शिविरों में काम करते थे और जिन्होंने औस्वित्ज़ और अन्य यातना शिविरों में यहूदियों और अन्य कैदियों के खिलाफ आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दिया था । इन अपराधियों में कई सज़ाओं के डर से भाग गए और कइयों ने अपनी पहचान बदल ली और यूरोप अमरीका और विश्व के अन्य देशों में शरण ले ली।

औस्वित्ज़ शिविर होलोकॉस्ट में हुई वारदातों की ज़िंदा मिसाल है । साल 1947 में पोलैंड की सरकार ने इसे एक राज्य स्मारक के रूप में दर्ज़ा दिया । साल 1979 में UNESCO ने औस्वित्ज़ स्मारक को UNESCO की विश्व विरासत सूची में शामिल किया।