(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) एशिया का पहला ग्रीन विलेज : खोनोमा - नागालैंड) (Asia's First Green Village : Khonoma - Nagaland)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) एशिया का पहला ग्रीन विलेज : खोनोमा - नागालैंड) (Asia's First Green Village : Khonoma - Nagaland)



भारत की ज़्यादातर मेट्रो सिटीज़ प्रदूषण और ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार है...लेकिन इन सबके बावजूद हमारे ही देश में एक ऐसी जगह है, जहां हरियाली है और लोग स्वच्छ हवा में सांस ले रहे हैं..यह सिर्फ़ भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया का पहला ‘ग्रीन विलेज’ यानी हरित गांव है.ये ख़ूबूसरत गांव है खोनोमा....

खोनोमा नागालैंड की राजधानी कोहिमा से महज़ 20 किलोमीटर की दूरी पर है....खोनोमा हरियाली से घिरा एक गाँव है...ये गांव तकरीबन 700 साल पुराना है...यहां लगभग 600 घर हैं और इनमे 3000 लोगों की आबादी रहती है...

आज DNS में जानेंगे एशिया के पहले हरित गाँव या ग्रीन विलेज खोनोमा के बारे में, इसकी हरित गाँव बनने की यात्रा के बारे में...

खोनोमा भारत ही नहीं एशिया का भी पहला ग्रीन विलेज है। खोनोमा में रहती है भारत में अपनी बहादुरी और मार्शल आर्ट्स कौशल के लिए जानी जाने वाली ‘अंगमी' (Angami) जनजाति। खोनोमा गांव पूरे भारत में अपने हरे-भरे जंगलों और खेती की पारंपरिक तकनीक के लिए भी जाना जाता है। सतत विकास या सस्टेनेबल डेवलपमेंट के सिधान्तों को कई साल पूर्व ही अपनाने वाला खोनोमा हरित गांव का मॉडल बन चुका है। खोनोमा गाँव में जंगलों की कटाई और शिकार पर 90 के दशक में ही प्रतिबंध लगा दिया गया था।

पेड़ों की कटाई और शिकार पर है खोनोमा में प्रतिबन्ध

पूरे गाँव में पेड़ो को काटने और शिकार की मनाही है। लेकिन ये सब रातों रात नहीं हुआ। अंगामी जनजाति शिकार के लिए पूरे भारत में जानी जाती है । शिकार इस जनजाति की परंपरा का एक अहम हिस्सा था। लेकिन 90 के दशक में गांव वालों ने एक शिकार प्रतियोगिता के दौरान एक हफ़्ते में ही करीब 300 ब्लाइद ट्रॅगोपॅन की हत्या कर दी...

ब्लाइद ट्रॅगोपॅन पर यूँ ही अस्तित्व का संकट मंडरा रहा था। ये प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर थी... इतनी बड़ी तादाद में इन पक्षियों की हत्या ने वन्य जीव संरक्षकों और गांव के बड़े-बुजुर्गों को कदम उठाने के लिए मज़बूर कर दिया...

दिसम्बर 1998 अट्ठानवे में खोनोमा में इस प्रजाति के शिकार को प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रतिबन्ध के बाद खोनोमा के जंगल और 20 वर्ग किलोमीटर के इलाके को गांव की पंचायत ने ‘खोनोमा नेचर कंज़रवेशन एंड ट्रॅगोपॅन सैंक्चुअरी नाम से अलग कर दिया है

शिकार पर लगे प्रतिबन्ध से ग्रामीणों की जीवन-शैली में काफी बदलाव आया। हालांकि शुरुआत में गाँव वालों को थोड़ी परशानी का सामना जरूर करना पड़ा लेकिन मौजूदा वक़्त में यहां के लोगों ने शिकार छोड़ कर प्रजातियों के संरक्षण के रास्ते को तवज्जों देना सीख लिया है। अब यहां के निवासी लकड़ी के लिए पेड़ों को ना काटकर सिर्फ उनकी शाखाओं से लकड़ी का इंतज़ाम करते हैं।

मौजूदा वक़्त में खोनोमा वासी सक्रिय रूप से जंगलों और जंगली जानवरों की रक्षा कर रहे हैं। खोनोमा सैलानियों के बीच काफी लोकप्रिय है यहां हर साल बड़ी तादाद में पर्यटक आते हैं। यहां के निवासी इन पर्यटकों को अपना गांव और परंपरा बढ़-चढ़ कर दिखाते हैं। इसके साथ ही साथ ये लोग पर्यटकों को अपने घर में रहने के लिए आश्रय भी देते है।

कौन है अंगामी जनजाति

अंगामी एक नागा समूह है उत्तर पूर्वी भारत के नागालैंड राज्य में बसा है। अंगामी जनजाति ख़ास तौर पर नागालैंड के कोहिमा और दीमापुर ज़िले में बसी हुई है। अंगामी जनजाति मणिपुर राज्य के हिस्सों में भी बसी है। अंगामी जनजाति 4 इलाकों के आधार पर 4 भागों में बांटा गया है और इसी आधार पर इन्हे नाम भी दिए गए हैं चाखरो अंगामी , उत्तरी अंगामी , दक्षिणी अंगामी और पश्चिमी अंगामी। चकेसांग जो अब अंगामी जनजाति से अलग वज़ूद रखते हैं उन्हें पूर्व में पूर्वी अंगामी जनजाति का दर्ज़ा मिला हुआ था।

अंगामी जनजाति के लोग पहाड़ो पर रहते हैं। ये आमतौर पर खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। अंगामी आम तौर पर पहाड़ काटकर सीढ़ीनुमा खेती करते हैं।

आज से तकरीबन 100 साल पहले अंगमी आदिवासियों ने अंग्रज़ों से जंग लड़ी थी . एक तरफ जहां आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेज़ी सेना थी तो दूसरी ओर निहत्थे आदिवासी। लेकिन निहत्थे होने के बावजूद अंगामियों ने इस हमले का जवाब बड़ी बहादुरी से दिया. अंगामियों ने अपने रणनीतिक हुनर और मार्शल आर्ट्स कौशल की वजह से इस लड़ाई में अँगरेज़ सेना को काफी नुकसान पहुंचाया। ये इनकी बहादुरी का ही ज़ज़्बा था की अंग्रेज़ों ने 1830 से 1880 तक इस इलाके में घुसने की हिम्मत तक नहीं की।

गौरतलब है की अंग्रेज़ी राज में ही खोनोमा गांव में ईसाई धर्म आया। मौजूदा वक़्त में खोनोमा में ज़्यादातर लोगों की तादाद ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों की है। हालांकि आज खोनोमा भारत समेत पूरी दुनिया के लिए एक ऐसे गाँव की तस्वीर पेश करता है जहां सतत विकास का उन्नत मॉडल अपनाया गया। इस गाँव में सीमित संसाधन और लगन से यहाँ के लोगों ने इस इलाके को एक ऐसे इलाके में बदल दिया है जो पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त है और हरा भरा है।