(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) एशिया का पहला डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र (Asia's First Dolphin Research Center)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) एशिया का पहला डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र (Asia's First Dolphin Research Center)


मुख्य बिंदु:

आठ वर्षों के अथक प्रयास के बाद भारत के पहले डॉलफिन रिसर्च सेंटर की आधारशिला आने वाले पांच अक्टूबर को पटना में रखी जाएगा।गौरतलब है कि यह एशिया का पहला डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र होगा जिसका निर्माण कनाडा और जापान के डॉलफिन केन्द्रों की तर्ज़ पर किया जाएगा।

विशेषज्ञों की माने तो पूरे देश में डॉलफिन की संख्या 1800 है जिनमें अकेले बिहार में ही 1200 से 1300 डॉलफिन हैं।बिहार में डाल्फिन की घटती संख्या को लेकर साल 2012 में बिहार सरकार ने 5 अक्टूबर को डॉलफिन दिवस घोषित किया था।जिसका मकसद डॉलफिन संरक्षण हेतु लोगों में जागरूकता फैलाना है।

आज के डीएनएस में हम भारत में डॉल्फिनों की घटती स्थिति के कारणों और उनके महत्व को समझने का प्रयास करेंगे...

विलुप्ति के कगार पर पंहुची डॉलफिन को भारत सरकार ने साल 2009 में राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित करते हुए वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की लिस्ट में डाल दिया था। गौरतलब है कि अवैध शिकार, तस्करी,अवैध व्यापार से देश के वन्य जीवन की रक्षा करने हेतु वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 लागू किया गया था।इस अधिनियम का उद्देश्य सूचीबद्ध लुप्तप्राय वनस्पतियों और जीवों तथा पर्यावरण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों को सुरक्षा प्रदान करना है।

देश में पाए जाने वाले कुल डॉलफिन में से आधे से अधिक केवल बिहार में पाए जाते हैं इसलिए इस संबंध में बिहार सरकार की अधिक जिम्मेदारी बनती है। उल्लेखनीय है कि डॉलफिन संरक्षण हेतु बिहार सरकार ने वर्ष 1991 में बिहार में सुल्तानगंज से लेकर कहलगांव तक के करीब 60 किलोमीटर क्षेत्र को 'गैंगेटिक रिवर डॉल्फिन संरक्षित क्षेत्र' घोषित किया था।

वैज्ञानिकों की माने तो डोल्फिन की तादाद में लगातार हो रही कमी की वजह उनका लगातार हो रहा शिकार व गंगा का प्रदूषण है।गौरतलब है कि गंगा नदी जैव विविधता का एक बहुत बड़ा केंद्र है।गंगा में न केवल डॉलफिन बल्कि मछलियां, पक्षी, वनस्पति, शैवाल इत्यादि बड़ी संख्या में पाई जाती हैं।

डॉल्फिन के बारे में बात करें तो यह हमेशा से ही लोगों के लिए कौतूहल का विषय रही है।बहुत लोग इसे मछली के रूप में जानते हैं, लेकिन डॉल्फिन मछली नहीं है, बल्कि एक स्तनधारी जलीय जीव है। माना जाता है कि धरती पर डॉल्फिन का जन्म करीब दो करोड़ वर्ष पूर्व हुआ और डॉल्फिन ने लाखों वर्ष पूर्व जल से जमीन पर बसने की कोशिश की, लेकिन धरती का वातावरण डॉल्फिन को रास नहीं आया और फिर उसने वापस पानी में ही बसने का मन बनाया।

प्रकृति ने डॉल्फिन अनोखा कंठ दिया है, जिससे वह विभिन्न प्रकार की लगभग 600 आवाजें निकाल सकती हैं।

ऐसे तो डॉल्फिन सभी समुद्रों में मिलती है लेकिन भूमध्यसागरीय समुद्र में इनकी संख्या सर्वाधिक है। पूरे विश्व में डॉल्फिन की 40 प्रजातियाँ पाई जाती हैं।भारत में कई प्रकार की डाल्फिन पाई जाती हैं जिनमें गंगेटीक डाल्फिन,इरावदी डाल्फिन और सिन्धु डाल्फिन इत्यादि प्रमुख हैं।

गंगा नदी में मिलने वाला डॉलफिन भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण डॉलफिन हैं।गैंगेटीक डॉलफिन को स्थानीय भाषा में सूँस कहते हैं।ये सूँस नेपाल, भारत एवं बांग्लादेश की गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना तथा कर्णफूली-संगू नदी-प्रणालियों में निवास करते है। आपको बता दें कि आईयूसीएन(IUCN) ने इस प्रजाति को संकटग्रस्त श्रेणी में रखा है।गंगेटीक डॉलफिन पानी में साँस नहीं ले सकता है इसलिए उसे हर 30-120 सेकंड में पानी से ऊपर साँस लेने के लिए आना पड़ता है।

गंगेटिक डाल्फिन के अलावा भारत में इरावदी डाल्फिन भी गंभीर रूप से लुप्तप्राय है एवं दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में लवणीय और स्वच्छ दोनों प्रकार के जल में पाई जाती है।

सिन्धु डॉलफिन स्वच्छ जल में पाई जाने वाली डॉलफिन की एक अंधी प्रजाति है। सिन्धु डॉलफिन शिकार को आवाजों के माध्यम से अपने शिकार को पकड़ती है।डाल्फिन की ये प्रजाति पाकिस्तान की सिन्धु नदी में पाई जाती है।

आपको बता दें कि गैंगेटीक डाल्फिन की नदी आहार श्रृंखला में बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यह हानिकारक कीड़े-मकोड़ों के अंडों को भी खा जाती है जिसके कारण जल की स्वच्छता बनी रहती है और कई प्रकार की जलजनित बीमारियों को फैलने से रोकती है। इस अद्भुत जीव की जलीय तंत्र में अहम हैसियत को ध्यान में रखते हुए हमें इसको बचाने के प्रयास में योगदान देना होगा ताकि डॉल्फिन सदियों तक प्रकृति की गोद में खेलती रहे।