(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) दल-बदल कानून (What is Anti-Defection Law?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) दल-बदल कानून (What is Anti-Defection Law?)


हाल ही में महाराष्ट्र में हो रहे राजनैतिक उठा-पटक में कई सारे मुद्दे प्रकाश में ला दिये है। इसी परिप्रेक्ष्य में आज हम अपने DNS के कार्यक्रम में Anti-Defection Law के बारे में जानने का प्रयास करेंगे।

Anti-Defection Law यानि दल-बदल कानून सम्बन्धी प्रावधान भारतीय संविधान में 10वीं अनुसूची में दी गई है जिसके आधार पर चुने हुए सदस्यों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।

  • गैरतलब है कि यह कानून मूल संविधान में नही था बल्कि इस 10वीं अनुसूची को भारतीय संविधान में सन् 1985 में 52वें संविधान संशोधन डाला गया। यह कानून उन चुने हुए सदस्यों को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान करता है जो चुने जाने के बाद किसी अन्य राजनैतिक दल को शामिल हो जाते हैं या किसी एक दल में होते हुए किसी अन्य दल के लिए संसद में मतदान करते हैं।
  • गौरतलब है कि इस प्रावधान का मुख्य लक्ष्य राजनैतिक दल-बदल को रोककर संविधान के मूल्यों का संरक्षण करना है।
  • इसी परिप्रेक्ष्य में आइये जानते हैं दल-बदल कानून के अनुसार पर अयोग्यता के आधार-

ऐसे किसी सदस्य को जोकि-

  1. यदि चुना हुआ सदस्य स्वयं चुनने के बाद अपनी राजनैतिक दल की सदस्यता त्याग दें।
  2. यदि व्हिप जारी होने के पश्चात् भी कोई सदस्य अपनी पार्टी के विरूद्ध जाकर किसी अन्य दल के लिए संसद में मतदान करें।
  3. यदि व्हिप जारी होने के पश्चात् भी कोई सदस्य मतदान न करें।

इसके अलावा यदि उपरोक्त लिखित कृत्यों को उसके राजनैतिक दल या किसी सक्षम प्राधिकरण द्वारा 15 दिनों में गलत ठहराया जाना या अवैध ठहराया जाना अनिवार्य है।

इसी सम्बन्ध में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर भी ध्यान दिया जाना अनिवार्य है।

  1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद-102(2) एवं अनुच्छेद-191(2) दल-बदल के लिए प्रावधान करता है।
  2. इन प्रावधानों का मुख्य लक्ष्य संसद में भ्रष्टाचार या Horse-trading को रोकना व ‘‘आया-राम-गया-राम’’ की प्रथा को रोकना है।
  3. ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन प्रावधानों के द्वारा सरकार व राजनैथ्तक स्थायित्व को बरकरार रखा जाता है।
  4. यह कानून सांसदों व विधायकों को चुनाव के पश्चात् दलों को बदलने व व्हिप का उल्लंघन करने से रोकते हैं।
  5. यह कानून उन नामित यानि Nominated सदस्यों पर लागू होता है जो नामांकन के 6 माह के पश्चात् किसी राजनैतिक दल से जुड़ जाता है।
  6. यह उन निर्दलीय सदस्यों पर भी लागू होता है जो चुने जाने के बाद किसी राजनैतिक दल से जुड़े जाते हैं।

हालांकि दल-बदल कानून निम्न स्थितियों में लागू नहीं हो पाता है-

  1. यदि कोई सदस्य पार्टी के दो धड़ों में बट जाये और वह सदस्य और उसका धड़ा या ैमबजपवद मूल सदस्यों की कुल संख्या का 2/3वाँ यानि दो तिहाई हो।

सरल शब्दों में कहा जाये तो यदि दो तिहाई सदस्य एक साथ किसी राजनैतिक दल से अलग हो जाये एवं किसी अन्य दल में डमतहम या समाहित हो जायें तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता।

  • यह प्रावधान 91वें संविधान संशोधन 2003 द्वारा डाला गया।
  • इसी परिप्रेक्ष्य में स्पीकर यानि लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका भी दल-बदल के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
  • दल-बदल के संबंध में अयोग्य घोषित की जाने की समस्त शक्तियाँ केवल स्पीकर के पास ही है।
  • दसवीं अनुसूची स्पष्ट रूप से स्पीकर को इसके द्वारा किसी सदस्य को योग्य घोषित किये जाने की शक्तियाँ देता है।
  • न्यायपालिका को इस संबंध में प्रारम्भ में कोई शक्ति नहीं देती परन्तु इस कार्य की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

कुछ महत्त्वपूर्ण समितियों के सुझाव-

दल-बदल कानून के सन्दर्भ में पहली समिति-1990 में निदेश गोस्वामी समिति को माना जाता है जिन्होंने चुनाव सुधारों के साथ-साथ दल-बदल कानून को भी कुछ निम्न आधारों पर बेहतर करना चाहती थी जैसे-

  1. अयोग्यता के मामले सिर्फ किसी सदस्य के स्वेच्छा से अपने राजनैतिक दल की सदस्यता त्यागने पर हो एवं यदि वह सदस्य अविश्वास प्रस्ताव यानि छव-ब्वदपिकमदबम डवजपवद के दौरान व्हिप जारी करने के पश्चात् भी दल के विरूद्ध मतदान करें। व
  2. अयोग्यता का निर्धारण राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा चुनाव आयोग से परामर्श के पश्चात किया जाये।

इसी संबंध में चुनाव आयोग ने यह प्रावधान किया कि चुनाव आयोग का ऐसा परामर्श राष्ट्रपति या राज्यपाल पर बाध्यकारी होगा।

इसके अलावा सन् 2002 में संविधान समीक्षा समिति यानि Constitution Review Commission ने यह प्रावधान किया कि दल-बदल के आरोप में अयोग्य घोषित व्यक्ति बचे हुए कार्यकाल के दौरान किसी सार्वजनिक पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकेगा।