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Blog / 18 Jun 2020

(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) संविधान की नौवीं अनुसूची (9th Schedule of Indian Constitution)

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(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) संविधान की नौवीं अनुसूची (9th Schedule of Indian Constitution)



हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण से जुड़े एक मामले में अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक याचिका को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही आरक्षण से जुड़े कानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोर पकड़ने लगी है.

DNS में आज हम आपको बताएंगे कि संविधान की नौवीं अनुसूची क्या है और साथ ही समझेंगे इससे जुड़े कुछ दूसरे पहलुओं को भी…….

दरअसल तमिलनाडु के कई राजनीतिक पार्टियों ने केंद्र सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. याचिका में केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें सरकार ने मेडिकल पाठ्यक्रमों में अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को 50 फ़ीसदी आरक्षण न देने का फैसला लिया था. इसके अलावा, इस याचिका में अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण की भी मांग की गई थी.

याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 32 का उपयोग केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के दशा में ही किया जाना चाहिए और इस याचिका में पक्षकार यह बताएं कि किसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, क्योंकि आरक्षण तो कोई मौलिक अधिकार है नहीं. अदालत के इस फैसले के बाद से ही आरक्षण संबंधी प्रावधानों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोर पकड़ने लगी है. आपको बता दें कि नौवीं अनुसूची में डालने से आरक्षण संबंधी कानूनों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखने में मदद मिलेगी.

नौवीं अनुसूची में केंद्र और राज्य कानूनों की एक ऐसी सूची शामिल होती है जिन्हें न्यायपालिका में चुनौती नहीं दी जा सकती. मौजूदा वक्त में, संविधान की इस अनुसूची में कुल 284 कानून शामिल हैं. न्यायपालिका इन कानूनों की न्यायिक समीक्षा नहीं कर सकती यानी इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. नौवीं अनुसूची को साल 1951 में पहले संविधान संशोधन के जरिए शामिल किया गया था. गौरतलब है कि संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल तमाम कानूनों को संविधान के ही अनुच्छेद 31B के तहत संरक्षण प्राप्त है. इस अनुसूची की एक खास बात और है कि अगर किसी कानून को न्यायपालिका द्वारा असंवैधानिक करार दे दिया गया हो और अगर उसके बाद उस कानून को नौवीं अनुसूची में डाल दिया गया तो वह कानून संवैधानिक माना जाने लगता है.

शुरुआत में, पहले संविधान संशोधन के जरिए नौवीं अनुसूची में कुल 13 कानून शामिल किए गए थे. उसके बाद, संविधान में कई संशोधन हुए और अब तक कुल कानूनों की संख्या 284 हो गई. शुरुआत में, नवीं अनुसूची लाने का मकसद भारत में भूमि सुधार कानूनों को लागू करवाना था. लेकिन जब भारत में भूमि सुधार शुरू हुए तो इससे जुड़े कानूनों को मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के अदालतों में चुनौती दी गई और बिहार में एक अदालत ने इसे अवैध घोषित कर दिया. ऐसे में, सरकार के सामने बड़ी मुश्किल पैदा हो गई और सरकार ने भूमि सुधार कानूनों को लागू करवाने के लिए पहला संविधान संशोधन करने का फैसला लिया. इस तरह संविधान संशोधन के जरिए नौवीं अनुसूची बनाई गई. 8 मई 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने संसद में प्रथम संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था. उसके बाद 18 जून 1951 को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह विधेयक पूरी तरह कानून बन गया.

अप्रैल 1973 में, नौवीं अनुसूची को लेकर अदालत का एक काफी ऐतिहासिक फैसला आया. दरअसल 24 अप्रैल 1973 को सर्वोच्च न्यायालय के केशवानन्द भारती मामले में आए फैसले के बाद यह साफ हो गया कि नवीं अनुसूची में शामिल कानूनों की भी न्यायिक समीक्षा हो सकती है. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नौवीं अनुसूची के तहत कोई भी कानून अगर मौलिक अधिकारों या संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है. न्यायपालिका ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी कानून को बनाने और इसकी वैधानिकता तय करने की शक्ति केवल विधायिका या कार्यपालिका पर नहीं छोड़ी जा सकती. अगर संसद कानून बनाता है तो उस कानून की व्याख्या करने और उसकी समीक्षा करने की शक्ति न्यायालय के ही पास रहेगी. लेकिन किसी भी कानून की समीक्षा तभी की जा सकती है जब वह कानून मूल अधिकारों या फिर संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होता हो.

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