(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) अंतर्राष्ट्रीय परमाणु हथियार उन्मूलन दिवस - 26 सितम्बर (26 September - Elimination of Nuclear Weapons Day)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) अंतर्राष्ट्रीय परमाणु हथियार उन्मूलन दिवस - 26 सितम्बर (26 September - Elimination of Nuclear Weapons Day)


मुख्य बिंदु:

दुनिया में हर साल 26 सितंबर को परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है।इस संबंध में वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव पारित किया था और वर्ष 2014 से इस दिवस को मनाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

इस दिवस पर लोगों को तथा विश्व के नेताओं को यह अहसास कराया जाता है कि इन हथियारों से होने वाली हानि सामाजिक, आर्थिक एवं निजी जीवन को तबाह कर सकती है। और इसके भयावह स्थिति के परिणाम कई दशकों तक झेलने पड़ सकते हैं।

आपको याद दिला दें कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर एटम बम गिराया गया था जिसके कारण लगभग 60 लाख लोगों का भयानक नरसंहार हुआ था।

हाल ही में अमेरिका ने रूस के साथ 30 साल पुराना करार तोड़ दिया कारण परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रयासों को आघात पहुंचा है।

आज के डीएनएस में हम परमाणु हथियारों के अप्रसार से सम्बन्धित किए जा रहे विभिन्न प्रयासों को समझेंगे –

वर्तमान के जटिल परिवेश में परमाणु निस्त्रीकरण की प्रासंगिकता बढ़ चुकी है।विदित हो कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद गठित संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य ही मानवता के हित में इन परमाणु हथियारों के प्रसार पर रोक लगाना था।

वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण हासिल करना संयुक्त राष्ट्र के सबसे पुराने लक्ष्यों में से एक है।यह वर्ष 1946 के महासभा के पहले संकल्प का विषय था।गौरतलब है कि सामान्य और पूर्ण निरस्त्रीकरण पहली बार वर्ष 1959 में महासभा के एजेंडे पर आया,तब से परमाणु निरस्त्रीकरण संयुक्त राष्ट्र का सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी उद्देश्य रहा है।

वर्तमान में,आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन की एक रिपोर्ट यह बताती है कि विश्व में ,सबसे ज्यादा परमाणु हथियारों का जखीरा रूस के पास है,उसके बाद अमेरिका का नंबर आता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व में लगभग 15,000 हथियार मौजूद है।इस तरह के हथियार रखने वाले देश भली-भांति वित् पोषित है और अपने परमाणु हथियारों की लम्बी अवधी तक आधुनिकीकरण की योजना बना चुके हैं।इस आधार पर कहा जा सकता है कि परमाणु हथियारों को लेकर एक भय अभी भी है।

परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में परमाणु अप्रसार संधि यानि नॉन प्रोलिफेरेशन ट्रिटी जिसे एनपीटी के नाम से भी जाना जाता है का अत्यंत महत्व है।इसके उद्देश्यों की बात की जाए तो विश्व भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के साथ-साथ परमाणु परीक्षण पर अंकुश लगाना है।

गौरतलब है कि 1 जुलाई, 1968 से इस समझौते पर हस्ताक्षर होना शुरू हुआ। इस संधि के तहत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र उसे ही माना गया है, जिसने 1 जनवरी, 1967 से पहले परमाणु हथियारों का निर्माण और परीक्षण कर लिया हो। इस आधार पर ही भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दर्जा प्राप्त नहीं है।

इसके अलावा यह संधि शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोटों को भी सीमित करता है जो भारत को मान्य नहीं है।

वर्तमान में इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुके देशों की संख्या 190 है। जिसमें पांच के पास आण्विक हथियार हैं। ये देश -अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस और चीन।

इसके अतिरिक्त परमाणु अप्रसार की लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु वर्ष 1975 में NSG को स्थापित किया गया। इस समूह का कार्य परमाणु हथियार बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री की आपूर्ति और नियंत्रण करना है। यह समूह ऐसे परमाणु उपकरण, सामग्री और टेक्नोलॉजी के निर्यात पर रोक लगाता है जिसका प्रयोग परमाणु हथियार बनाने में होता है।भारत को अभी तक इसकी सदस्यता प्राप्त नहीं हुई है क्योंकि यह परमाणु अप्रसार संधि को नहीं मानता है।

इसी लक्ष्य की पूर्ती हेतु वर्ष 1985 में ऑस्ट्रेलिया समूह की स्थापना की गई थी। तत्कालीन परिस्थतियों में इराक-ईरान युद्ध के दौरान जब इराक ने रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया था,तब रासायनिक हथियारों के आयात-निर्यात और प्रयोग पर नियंत्रण हेतु इस समूह का गठन किया गया।गौरतलब है कि भारत ने इसकी सदस्यता 19 जनवरी 2018 को प्राप्त कर ली थी।

इस संबंध में वासेनार अरेंजमेंट भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह परंपरागत हथियारों के लिए,दोहरे उपयोग हेतु वस्तुओं और प्रोदौगिकी के आयात-निर्यात को नियंत्रित करता है।वर्तमान में भारत इसका सद्य है।

परमाणु अप्रसार के सम्बन्ध में अगर भारत के पक्ष की बात की जाए तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने आज़ादी के बाद ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु प्रसार का विरोध किया लेकिन भारत घरेलू स्तर पर शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए इसका समर्थन करता है।

साथ ही भारत अबतक परमाणु हथियारों को लेकर नो फर्स्ट यूज़ पॉलिसी का अनुसरण करता आया है। परन्तु हाल में भारत के रक्षा मंत्री ने एक बयान में कहा कि नो फर्स्ट यूज पॉलिसी पर पुनर्विचार किया जाएगा और यह पूरी तरीके से परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

गौरतलब है कि परमाणु अप्रसार की दिशा में संयुक्त राष्ट्र लगातार प्रयासरत है। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासभा में 50 से ज़्यादा देशों ने परमाणु हथियारों को नष्ट करने से जुड़ी संधि पर हस्ताक्षर किए। लेकिन परमाणु शक्ति संपन्न सभी 9 देशों ने इसका विरोध किया।

आपको बता दें कि 20 सितमबर को,सत्तर बरस में पहली बार संयुक्त राष्ट्र के 122 देशों ने उस वैश्विक संधि पर अपने हस्ताक्षर कर दी हैं,जिसमें परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित किये जाने का आग्रह किया गया है।परमाणु अप्रसार के लिए कानूनी तौर पर बाध्यकारी पहली परमाणु हथियार निषेद संधि को लेकर पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासभा में 50 से ज्यादा देशों ने परमाणु हथियारों को नष्ट करने से जुडी संधि पर हस्ताक्षर किए।लेकिन परमाणु शक्ति सम्पन्न सभी 9 देशों ने इसका विरोध किया।

कुल मिलकर ये कहा जा सकता है कि परमाणु हथियारों के ख़िलाफ़ मुहिम दशकों से चल रही है। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद ये हथियार नष्ट नहीं हुए। हालाँकि इस बीच कुछ ऐसे देश आए जिन्होनें अपने परमाणु हथियारों को नष्ट किया लेकिन इसके साथ-साथ परमाणु शक्तियों की सूची में और नाम भी जुड़ते गए।

एनपीटी जैसी कई बड़ी संधियां हुईं और कोशिशें आज भी जारी हैं।लेकिन सभी देशों का इस मुद्दे पर एकजुट नहीं होना इस लक्ष्य की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है इस लक्ष्य की सफलता हेतु सभी देशों को एकजुट और एकमत से कार्य करना होगा।