(Video) भारतीय कला एवं संस्कृति (Indian Art & Culture) : भारतीय मूर्ति और चित्रकला: राजपूत कालीन मूर्तिकला और स्थापत्य (Sculpture and Painting: Rajpoot Sculpture and Architecture)


(Video) भारतीय कला एवं संस्कृति (Indian Art & Culture) : भारतीय मूर्ति और चित्रकला: राजपूत कालीन मूर्तिकला और स्थापत्य (Sculpture and Painting: Rajpoot Sculpture and Architecture)


परिचय

मूर्तिकला विशेषांक में आज हम एक बेहतरीन काल एवं राजवंश से जुड़ी मूर्तिकला की जानकारी आपके समक्ष प्रस्तुत हुये हैं। इस काल में भव्य मन्दिरों एवं उसमें स्थापित उससे भी भव्य एवं परालौकिक यानी क्पअपदम मूर्तियाँ देखने को मिलती है ये मूर्तियाँ इन वंशों के राजाओं एवं वहाँ की प्रजा से जुड़ी भक्ति को प्रदर्शित करती है। इस काल का एक बहुत ऐतिहासिक महत्त्व रहा है और उस महत्त्व परिलक्षित करती वहाँ की मूर्तियाँ एवं वहाँ की संस्कृति आज भी अद्भुत रूप में अपने आप को स्थापित किये हुये हैं इसी परिप्रेक्ष्य में हम आज अपने Art & Culture की मूर्तिकला के Series में राजपूत काल के मूर्तिकला के बारे में जानने का प्रयास करेंगे-

राजपूत कालीन मूर्तिकला

राजपूत शासक बड़े उत्साही निर्माता थे। राजपूत शासकों ने भव्य मंदिरों और दुर्गों के साथ-साथ मूर्तिकला को भी संरक्षण प्रदान किया। दरअसल इस काल में मूर्तिकला के क्षेत्र में कोई नवीनता नहीं आयी वरन् इस काल में गुप्तकालीन मूर्तिकला की विशेषताओं को ही पुनः दोहराया गया। इस काल में बौद्ध, जैन, हिन्दू आदि धर्मों से संबंधित अनेक मूर्तियों का निर्माण हुआ। इस काल की मूर्तिकला की पराकाष्ठा खजुराहों के मंदिरों की दीवारों पर निर्मित की दीवारों पर निर्मित मूर्तियों में देखा जा सकता है। खजुराहों के मंदिर अपनी वास्तुकला के साथ-साथ तक्षण कला के लिए भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

यहाँ के मंदिरों की भीतरी और बाहरी दिवारों के बहुसंख्यक मूर्तियों से सजाया गया है। इनमें देवी-देवताओं सहित द्वारपालों, गणों, अप्सराओं, पशु-पक्षियों आदि की बहुसंख्यक मूर्तियाँ हैं। अप्सराओं अथवा सुंदर स्त्रियों की मूर्तियों ने इस युग की मूर्तिकला को अमर बना दिया है। पैर से काँटा निकालती हुई नायिका, अलस नायिका सहित बहुसंख्यक मैथुन भाव में अंकित आकृतियाँ जिन पर तत्कालीन तांत्रिक विचारधारा का प्रभाव परिलक्षित होता है, अत्यंत कलापूर्ण एवं आकर्षक हैं।

कहा जा सकता है कि प्रकृति और मानव जीवन की एैहिक सौन्दर्य राशि को यहाँ के मंदिरों में शाश्वत रूप प्रदान कर दिया गया है। शिल्प श्रृंगार का इतना प्रचुर तथा व्यापक आयाम भारत के अन्य किसी कला केन्द्र में शायद ही देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त इस काल में चोल शासकों के संरक्षण में निर्मित नटराज की मूर्ति धातु शिल्प कला का शानदार नमूना है। इसकी शानदार कल्पना, इसकी प्रतीकात्मकता, इसकी कलात्मक श्रेष्ठता और इसका आकर्षण दुनिया भर के कलाप्रेमियों को प्रभावित करता है। राजपूत कालीन मूर्ति निर्माण में धातु तथा पत्थर का प्रयोग किया गया। काले, भूरे रंग के पाषाणों का मूर्तियों के निर्माण में प्रयोग किया गया। धातुओं से निर्मित मूर्तियाँ भी मिलती हैं।

इस काल में निर्मित मूर्तियों की निम्न विशेषताएँ हैः

  • इस काल की अधिकांश मूर्तियाँ चूने पत्थर से निर्मित हैं।

  • बंगाल के पाल वंशीय शासकों ने मूर्तियों के निर्माण में काले पत्थर का प्रयोग किया।

  • राजपूत कालीन मूर्तियाँ सुन्दर, सजीव और पूर्ण आकार की हैं। ये मूर्तियाँ भावपूर्ण दृष्टिगोचर होती हैं।

  • मूर्तियों के अंगों का अंकन सूक्ष्मता से किया गया है।

  • देवताओं की मूर्तियों में हाथों की संख्या अधिक है।

  • इस युग की मूर्तियाँ गुप्तकालीन मूर्तियों से साम्यता स्थापित करती हैं।

तक्षण कला के क्षेत्र में भी पालकालीन कलाकारों ने एक सर्वथा नवीन शैली का प्रदर्शन किया, जिसे ‘मगध वंग शैली’ कहा जाता है। इसमें चिकने काले रंग के कसौटी वाले पाषाण तथा धातुओं की सहायता से मूर्तियों का निर्माण किया गया है। बौद्ध, जैन तथा ब्राह्यण धर्म से संबंधित अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई गयीं। ये बिहार तथा बंगाल के विभिन्न क्षेत्रें से मिलती हैं।

मूर्तियाँ अधिकांशतः हाथ से बनाई जाती थीं। बुद्ध की स्वतंत्र मूर्तियाँ, उनके जीवन से संबंधित घटनाएं तथा परवर्ती बौद्ध सम्प्रदाय के के विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई गयी हैं। पाल मूर्तियों में मौलिकता का भी आशय है। मूर्तियों को आभूषणों से लाद दिया गया है जिससे कृत्रिमता का स्पष्ट आभास मिलता है। यहाँ तक कि विरागी बुद्ध की मूर्तियाँ भी आभूषणों से अलंकृत हैं, जिससे उनका भाव पक्ष आवृत्त हो गया है।

हिन्दू देवी-देवताओं विष्णु, शिव, गणेश, सूर्य तथा कई देवियों की मूर्तियां मिलती हैं। गया से प्राप्त शिव के कल्याणसुन्दर स्वरूप की एक मूर्ति में शिव-पार्वती विवाह के दृश्य का उत्कीर्णन मिलता है। दोनों के बीच ब्रह्या को दिखाया गया है। अर्द्धनारीश्वर स्वरूप की एक मूर्ति राजशाही संग्रहालय में है। तिपरा चौड़ा (बंगाल) की एक मूर्ति में सूर्य सात अश्वों द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर विराजमान हैं तथा उनके साथ अरूण, उषा, प्रत्युषा, दण्डी, पिंगल आदि को भी प्रदर्शित किया गया है। अंग-प्रत्यंगों में झुकाव के माध्यम से मूर्तियों को सजीव बनाने का प्रयास किया गया है।

वस्तुतः अलंकरण की अधिकता तथा अंग-प्रत्यंग का चपल आभंग इस शैली की विशेषता बन गयी है। देव मूर्तियों में मानवीय सौन्दर्य को आकर्षक ढंग से उभारने का प्रयत्न किया गया है। तंत्रयान के प्रभाव से पुरूष मूर्तियों के शरीर में नारी सुलभ कमनीयता को प्रदर्शित करने का प्रयास हुआ है। बोधिसत्व तथा दूसरे देवताओं की मूर्तियों में नारी सौन्दर्य तथा शक्ति का समावेश दिखाई देता है।

परवर्ती काल में धार्मिक असहिष्णुता की जो भावना व्याप्त हुई उसका प्रभाव इस काल में गढ़ी गयी बुद्ध मूर्तियों पर भी पड़ा। अनेक बुद्ध मूर्तियों को हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित करते हुए दिखाया गया है। अवलोकितेश्वर को गरूड़ासीन विष्णु के ऊपर सवारी करते हुए दिखाया गया है, जिससे द्वेष एवं कट्टरता की भावना उजागर होती है। इस दृष्टि से पाल कला में भारतीय संस्कृति में व्याप्त सहिष्णुता एवं समन्वयवादिता नहीं दिखाई देती है।

राष्ट्रकूट काल में वास्तु के साथ-साथ मूर्ति अथवा तक्षण कला की भी उन्नति हुई। ‘‘ऐलोरा तथा एलिफैण्टा’’ अपनी मूर्तिकारी के लिए सुप्रसिद्ध हैं। इस काल की शिव तथा विष्णु की मूर्तियाँ सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। ऐलोरा से शिव की तीनों शक्तियों-उत्पत्ति, स्थिति तथा विनाश से संबंधित मूर्तियाँ मिलती हैं। एलिफैण्टा की मूर्तियाँ मूर्तिशिल्प के चरमोत्कर्ष को सूचित करती है। शिव के विविध रूपों एवं लीलाओं से संबंधित मूर्तियाँ काफी अच्छी हैं।

उत्तरी द्वार के सामने जगप्रसिद्ध ‘त्रिमूर्ति’ है जो समस्त राष्ट्रकूट कला की सर्वोत्तम रचना है। यह 17 फीट 10 इंच ऊंची है। इसका केवल आवक्ष तक का भाग दिखाया गया है। बीच का मुख शिव के शांत, दायी ओर का मुख रौद्र तथा बायीं ओर का मुख (जो नारी मुख है) शक्ति रूप का प्रतीक है।

अगले अंक में मूर्तिकला से जुड़े कुछ अन्य रोचक जानकारियों को लेकर हम शीघ्र ही आपके समक्ष प्रस्तुत होंगे।