(Video) भारतीय कला एवं संस्कृति (Indian Art & Culture) : भारतीय मूर्ति और चित्रकला: कुल्लू शैली (Sculpture and Painting: Kullu Style)


(Video) भारतीय कला एवं संस्कृति (Indian Art & Culture) : भारतीय मूर्ति और चित्रकला: कुल्लू शैली (Sculpture and Painting: Kullu Style)


कुल्लू शैली

कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) एक सुम्य पहाड़ी स्टेशन एवं खूबसूरत पर्यटक स्थल है। यह प्रकृति प्रेमियों, नवविवाहित जोड़ों और साहासिक व्यक्तियों का पंसदीदा गंतव्य है। कुल्लू घाटी में खूबसूरत जंगली फूल खिलते हैं जो प्रकृति के मनोरम दृश्य को दिखाते हैं। यहाँ प्राचीन मंदिर, खूबसूरत घास के मैदान, घाटिरयाँ, टेªकिंग के लिए स्थान हैं जो पर्यटकों को खूब लुभाते हैं।

कुल्लू की चित्रकारी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। 18वीं सदी का उत्तरार्द्ध कुल्लू शैली के लिए शानदार अवधि है।

कुल्लू शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय जे-सी- फ्रैंच को जाता है, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिमालयन आर्ट’ में इसका उल्लेख किया है। जगत सिंह के शासनकाल से ही इस कला के बीज पनपने शुरू हो गये थे। राजा मान सिंह एवं प्रीतम सिंह ने इस कला को काफी प्रोत्साहन दिया। सुल्तानपुर के महलों की चित्रकारी, मधु मालती नामक चित्र ग्रंथ कुल्लू के कुछ राजाओं के चित्र इस कला के उत्तम नमूने हैं। भगवान दास यहाँ का दरबारी चित्रकार था, उसकी कुछ चित्र रचनाएँ प्राप्त हुई हैं। स्त्रियों की कमर तक लम्बी चोली, स्त्रियों की सपाट छाती, स्त्रियों के अंडाकार सिर, लम्बे पतले हाथ, गद्दी औरतों के समान वेशभूषा, तिब्बती टोपी का पहवाना आदि इस कला की विशेषताएँ हैं।

चित्रकला की अन्य क्षेत्रीय शैलियाँ

  • दक्कन शैलीः इस शैली को बीजापुर के अली आदिल शाह और उनके उत्तराधिकारी इब्राहीम शाह का संरक्षण मिला। रागमाला के चित्रें का चित्रंकन इस शैली में विशेष रूप से किया गया है। इसके प्रारम्भिक चित्रें पर फारसी चित्रकला का प्रभाव एवं वेशभूषा पर उत्तर भारतीय शैली का प्रभाव परिलक्षित होता है।
  • सिक्ख शैलीः इस शैली का विकास लाहौर में महाराजा रणजीत के शासनकाल में हुआ। इस शैली के विषय पौराणिक महाकाव्यों से लिए गए हैं, जबकि इसका स्वरूप पूर्णतः भारतीय है। इस शैली में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से संबंधित रागमाला के चित्रें की प्रधानता है।
  • गढ़वाल शैलीः इस शैली का प्रसार मध्यकालीन गढ़वाल राज्य में हुआ। गढ़वाल राज्य के नरेश पृथ्वीपाल शाह के राजदरबार में रहने वाले दो चित्रकारों शामनाथ तथा हरनदास ने इस शैली का प्रवर्तन किया। इस शैली में प्राकृतिक दृश्यों, पशु-पक्षियों आदि का मनोहारी चित्रंकन किया गया है।
  • गुर्जर या गुजराती शैलीः यद्यपि इस शैली का केन्द्र गुजरात था तथापि इसका प्रसार मारवाड़, जौनपुर, अवध, पंजाब और बंगाल तक हुआ था। प्रकारान्तर से यह शैली अजंता, एलोरा और बाघ के भित्ति चित्रें की ही लघु चित्रें के रूप में प्रस्तुति थी। इसका विषय जैन धर्म से संबंधित है। चंपावती-विरहा, गीत, गोविन्द, लौर-चंदा आदि इस शैली के विशिष्ट नमूने हैं।