(Video) भारतीय कला एवं संस्कृति (Indian Art & Culture) : भारतीय मूर्ति और चित्रकला: जहाँगीर कालीन चित्रकला (Sculpture and Painting: Jahangir Period Paintings)


(Video) भारतीय कला एवं संस्कृति (Indian Art & Culture) : भारतीय मूर्ति और चित्रकला: जहाँगीर कालीन चित्रकला (Sculpture and Painting: Jahangir Period Paintings)


चित्रकला की विभिन्न विधाओं पर चर्चा करने के बाद अपने Art & Culture series के आज के अंक में हम कुछ अन्य चित्रकलाओं के बारे में चर्चा करेंगे-

जहाँगीर के काल में मुगल चित्रकला अपनी पराकाष्ठा पर थी, क्योंकि जहाँगीर स्वयं चित्रकला का एक महान पारखी और संरक्षक था। इसके शासन काल में मुगल चित्रकला का काफी विकास हुआ। चित्रकला अब पुस्तकों को सजाने तक ही सीमित नहीं रही। व्यक्ति चित्र तथा जीवन और प्रकृति के विषयों पर बनाये गये चित्र अत्यधिक लोकप्रिय हुए। नादिर, बिशनदास, मनोहर, गोवर्धन, मंसूर और फारूख बेग इस दौर के उच्च कोटि के चित्रकार थे।

अकबर के विपरीत जहाँगीर ने धार्मिक और दरबारी चित्रें के स्थान पर पशु-पक्षियों के चित्रें पर विशेष ध्यान दिया। इस काल में धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर तथा बादशाह एवं शाही घराने के सदस्यों के अलावा फकीरों, साधु-संतों, नर्तकियों, सैनिकों, प्रेमियों, सुलेखकों के चित्र बनाये गये, जिससे इस काल के चित्र ईरानी प्रभाव से मुक्त हो गये। इस काल के चित्रें में सहज मानवीय अभिव्यक्ति यानी क्रोध, करूणा और सौहार्द का चित्रण उत्कृष्टता से किया गया है।

इस काल में पशु-पक्षियों के चित्र अद्भुत हैं। इन चित्रें में हिमालयी महोख, नर मीरू और बाज के चित्र उल्लेखनीय हैं। समझा जाता है कि ये चित्र मंसूर ने बनाये थे। जहाँगीर चित्रकला का इतना बड़ा पारखी था कि वह कई चित्रकारों द्वारा मिलकर बनाये गये चित्रें को देखकर उनके चित्रकारों का नाम आसानी से बता देता था। जहाँगीर के समय के चित्रकला की प्रसंशा उसके दरबार में आये ब्रिटिश राजदूत टॉमस रो ने किया है।

जहाँगीर इस बात के लिए सदा व्यग्र रहता था कि उसके कार्यकलाप और महत्त्वपूर्ण घटनाओं का यथातथ्य ब्यौरा संस्मरण के रूप में संरक्षित किया जाए। जहाँगीर की ताजपोशी के और ‘होली’, ‘आबपाशी’ जैसे त्यौहारों तथा जन्म दिन पर तुलादान आदि अवसरों पर लगाए गए विशेष दरबारों या सभाओं के उल्लासपूर्ण चित्र बनाए गए।

उत्तरवर्ती शासनकाल में जहाँगीरी चित्रकारों ने जो भव्य लघु चित्र बनाए उसमें पादशाह का महत्त्व अत्यंत बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित किया गया है, मानो वे प्रतीकात्मक रूप से पादशाह के राजनीतिक स्तर में आई गिरावट की भरपाई कर रहे हों। कुछ चित्रें में उसे ईरान के शाह अब्बास का स्वागत करते हुए और उसे गले लगाते हुए दिखाया गया है जबकि यथार्थ में वह उससे कभी मिला ही नहीं था। अपने आश्रयदाता पादशाह को देवताओं का दुलारा, अन्य शासकों का आदर का पात्र और प्रजा के प्यार तथा भय का आलंबन दिखा कर एक सर्वशक्तिमान हस्ती के रूप में चित्रित करने का यह तरीका मुगल चित्रकला के विकास के एक नये स्वरूप का द्योतक है।




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