(Video) भारतीय कला एवं संस्कृति (Indian Art & Culture) : भारतीय मूर्ति और चित्रकला: प्रागैतिहासिक चित्रकला (Sculpture and Painting: Prehistoric Paintings of India)


(Video) भारतीय कला एवं संस्कृति (Indian Art & Culture) : भारतीय मूर्ति और चित्रकला: प्रागैतिहासिक चित्रकला (Sculpture and Painting: Prehistoric Paintings of India)


परिचय

अपने Art & Culture Series के पिछले अंक में हमने चित्रकला से सम्बन्धित कुछ बारीकियों व इसके इतिहास पर प्रकाश डालने की कोशिश की थी। हमारे आज के इस अंक में हम चित्रकला से जुड़े कुछ प्रमुख स्थलों पर चर्चा करेंगे। साथ ही इन स्थानों की प्रमुख Paintings के बारे में भी जानेंगे-

प्राचीन भारतीय चित्रकला

यद्यपि अब प्राचीन भारतीय चित्रकला के अवशेष बहुत बुरी दशा में हैं, तथापि वे उसकी महानता प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त हैं। वे कुछ गुफा मंदिरों में पूर्णतः भित्ति चित्रें के रूप में हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अधिकांश मंदिर किस रूप में चित्रित किये जाते थे और मूर्ति की स्थापना का स्थान चमकीले रंगों से रंगा जाता था जैसा कि प्रायः हिंदू मंदिरों में आज भी होता है और यत्र-तत्र भित्ति चित्रें की विस्तृत योजना रहती थी। धार्मिक उद्देश्यों के लिए अर्पित कुछ कृत्रिम गुफाएँ चित्रकला की अत्यधिक विकसित शैलियों के उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि अजन्ता के भित्ति चित्र इनमें से एक हैं। मध्य प्रदेश के ग्वालियर के पास विन्ध्य श्रेणी पर स्थिति बाघ की गुफा के बरामदे की दीवारों पर चित्रित हाथियों के चित्र प्राचीन भारतीय चित्रकला की उत्कृष्टता की पराकाष्ठा प्रदर्शित करते हैं।

भारत में प्रागैतिहासिक काल की चित्रकला की खोज सर्वप्रथम अंग्रेजों ने की जो यहाँ शासन करने के उद्देश्य से आये थे। इसका श्रेय आर्चिबाल्ड कार्लाइल तथा जॉन कॉकबर्न को दिया जा सकता है। विजयगढ़ दुर्ग के पास घोड़मंगर नामक शिलाश्रय में गैंडे के शिकार का चित्र मिला। यह चित्र एक बड़े पत्थर के भीतरी भाग में अंकित है जो शिलाश्रय के पथरीले किनारे का खण्डित अंश प्रतीत होता है। इसमें गैंडे को छः मनुष्य भाले से मारते हुए चित्रित किए गए हैं। इलाहाबाद जिले के खैरागढ़ के दक्षिणी भाग में भी चित्रित गुफायें मिली हैं। 1911 के मिर्जापुर गजेटियर में सोन नदी घाटी की चित्रित गुफाओं को सबसे प्राचीन मानव निवास स्थान बताया गया है।

‘भीमबेटका’ की गुफाओं से बड़ी मात्रा में पुरातात्विक अवशेष मिले हैं। यहाँ स्थिति 600 से अधिक गुफाओं में से 475 में शिलाचित्र प्राप्त हुए हैं। अधिकतर गुफायें मध्यपाषाण काल की हैं। यहाँ के अधिकतर चित्र लाल तथा सफेद रंग के हैं। कुछ हरे और पीले रंगों में भी हैं। इनमें गेंडा, चीता, जंगली सूअर, गाय, बैल, नीलगाय, भैंस, भालू, बन्दर, सांभर, हिरन आदि पशुओं का कलात्मक अंकन किया गया है। एक चित्र में किसी जुलूस का चित्रण है, जिसमें अश्वारोही मनुष्य दिखाये गए हैं। भीमबेटका के शिलाचित्र शैली तथा विषय की दृष्टि से तत्कालीन मानव जीवन की सुन्दर झांकी प्रस्तुत करते हैं। इनके मुख्य विषय हैं- वन्य जीवों का आखेट, परस्पर युद्ध करते हुए मनुष्य या उनके धार्मिक अनुष्ठान और पूजा आकृतियां।

मिर्जापुर क्षेत्रः इसके अंतर्गत लेखनिया, कोहबर, पभोसा, विंढम, लोहरी, रौंप, कण्डाकोट, सोरहोघाट, विजयगढ़, चुनार आदि क्षेत्र आते हैं। ये सभी सोन नदी घाटी में हैं। लेखनिया दरी के एक चित्र में कुछ घुड़सवार पालतू हथिनी की सहायता से जंगली हाथी को पकड़ते हुए प्रदर्शित किए गए हैं। एक अन्य चित्र घायल सूअर का है जो मुंह खोले अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए दिखाया गया है।

बाँदा क्षेत्रः यहाँ सरतह, मलवा, करियाकुंड, अमावां, बरगढ़ आदि से चित्रकला के उदाहरण प्राप्त होते हैं। मानिकपुर के शिलाश्रय में तीर-कमानधारी घुड़सवार तथा पहियारहित छकड़ा गाड़ी में बैठे शक्ति का दृश्य चित्रित किया गया है।

रायगढ़ क्षेत्रः इसके अंतर्गत सिंघनपुर, कबरा पहाड़, नवागढ़, बोतालदा एवं खरसिया आते हैं। सिंघनपुर के चित्र सबसे अच्छे हैं। इनमें भैंसा, सूअर, सूंढ़ उठाये हुए हाथी, भैंसे आदि पशु चित्रित हैं। भैंसे पर कुछ व्यक्ति बरछे से आक्रमण करते हुए दिखाये गए हैं। यहाँ क्षेपांकन पद्धति के चित्र भी मिले हैं।

पँचमढ़ी क्षेत्रः यह स्थल महादेव पर्वत श्रेणी में स्थित है। सबसे अधिक संख्या में शिलाचित्र यहीं से मिलते हैं। यहाँ पर शिकार के अतिरिक्त दैनिक जीवन से संबंधित चित्रकारियाँ भी अंकित हैं। गाय चराते हुए तथा मधु एकत्रित करते हुए व्यक्ति चित्रित किए गए हैं। स्त्री-पुरूष झुण्ड बनाकर नाचते हुए, दिखाये गए हैं।

होशंगाबाद क्षेत्रः यह पँचमढ़ी से लगभग 45 मील की दूरी पर नर्मदा नदी के रमणीक तट पर स्थित है। इसी के समीप स्थित आदमगढ़ की पहाड़ी के अनेक शिलाश्रयों में आदिम प्रकृति के चित्र अंकित हैं, जिनमें हल्के पीले रंग में बनाया गया विशाल हाथी का चित्र सबसे पुराना है।

क्षेपांकन विधि

इसमें किसी माध्यम को मध्य में रखकर उसका रूप वास्तविक आकार के बाहरी भाग में रंग भरकर उभार दिया जाता है तथा वह बिना रंग के ही पूर्ण लगने लगती है। कोहबर तथा सोरहोघाट (मिर्जापुर क्षेत्र) के शिलाश्रयों में इस विधि के चित्रंकन प्राप्त हुए हैं।