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Aarthik-mudde / 16 Feb 2019

(आर्थिक मुद्दे) समावेशी विकास और चुनौतियाँ (Inclusive Development and Challenges)


                    (आर्थिक मुद्दे) समावेशी विकास और चुनौतियाँ (Inclusive Development and Challenges)


(आर्थिक मुद्दे) समावेशी विकास और चुनौतियाँ (Inclusive Development and Challenges)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): डा. विजय वर्मा (अध्यापक - राजनीती विभाग, दिल्ली विश्विद्यालय), शिशिर सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार, हिन्दू बिज़नेस लाइन)

सन्दर्भ:

समावेशी विकास के ज़रिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास के दौरान समाज के सभी वर्ग के लोगों को इसके लाभ और समान अवसर की बात की जाती है।

भारत में सबसे पहला समावेशी विकास ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के मसौदे के साथ पेश किया गया था। इसके बाद 12वीं पंचवर्षीय योजना के मसौदे में समावेशी विकास पर और ज़ोर दिया गया। समावेशी विकास के लिए सरकार ने कई योजनाएं चलाई है - जिनमें दीन दयाल उपाध्याय अंत्योदय योजना, मनरेगा, समेकित बाल विकास योजना, और मिड डे मील जैसी योजनाएं शामिल हैं। साथ ही स्कूली शिक्षा और साक्षरता, सर्व शिक्षा अभियान, जेएनएनयूआरएम, त्वरित सिंचाई लाभ और राष्ट्रीय कृषि विकास जैसी योजनाएं भी समावेशी विकास के लिए चलाई जा रही हैं।

विश्व बैंक की ओर से जारी होने वाले इज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस इंडेक्स में साल 2018 में भारत 190 देशों में 77वें रैंक पर रहा। सरकार ने इस दिशा में बेहतर काम करते हुए पिछले चार सालों में 57 पायदान का इजाफ़ा किया है। व्यापारिक स्तर पर समावेशन के लिहाज़ से इसे अच्छी उपलब्धि मानी जा रही है।

अगर मानव संसाधन विकास में समावेशन की बात की जाय तो संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी UNDP द्वारा जारी किये जाने वाले मानव विकास सूचकांक यानी HDI में भारत कोई खास प्रगति नहीं कर पाया है। साल 2014 में भारत की रैंक 130 थी और साल 2018 में भी भारत इस मामले में 130वें पायदान पर ही बना हुआ है।

इसके अलावा पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में साल 2018 में भारत को 180 देशों में 177वाँ रैंक मिला जबकि 2014 में भारत 180 देशों में 155वें पायदान पर था। यानी पर्यावरण के मामले में भारत सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल रहा।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ओर से जारी किए गए करप्शन परसेप्शन इंडेक्स-2018 के मुताबिक़ भारत भ्रष्टाचार के मामले में 180 देशों की सूची में 78वें स्थान पर है। ग़ौरतलब है कि साल 2017 में भारत इस सूचकांक में 81वें पायदान पर था। भ्रष्टाचार समावेशी विकास की राह एक बड़ी समस्या है ऐसे में इस इंडेक्स में तीन स्थान का ये सुधार काफी सकारात्मक माना जा रहा है।

वित्तीय समावेशन की दिशा में भी सरकार द्वारा कई कदम उठाये गए हैं जिनमे मोबाइल बैंकिंग का विस्तार, बैंकिंग कॉरस्पॉन्डेट योजना, प्रधानमंत्री जन धन योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक और वरिष्‍ठ पेंशन बीमा जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं शामिल हैं।

महिलाओं के वित्तीय समावेशन के लिए सरकार ने स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया, सपोर्ट टू ट्रेनिंग एंड एम्प्लॉयमेंट प्रोग्राम फॉर वीमेन यानी STEP योजना और ट्रेड रिलेटेड एंटरप्रेन्योरशिप असिस्टैंस एंड डेवलपमेंट स्कीम फॉर वीमेन यानी ट्रीड जैसी योजनाए शामिल हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और महिला उद्यमिता मंच जैसे प्रयास भी सरकार की ओर से किये जा रहे हैं।

इसके अलावा दिव्यांगों के समावेशन के लिए सरकार ने निःशक्तता अधिनियम 1995, कल्याणार्थ राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999, सिपडा, सुगम्य भारत अभियान; यूडीआईडी कार्ड; छात्रवृत्ति योजना और स्वावलंब जैसी योजनाएं चलाई गईं हैं। इसके अलावा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 और दिव्यांगजन अधिकार नियम, 2017 जैसे कदम भी दिव्यांगों के समावेशी विकास के प्रयासों का हिस्सा हैं।

किसानों के वित्तीय समावेशन के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नीम कोटेड यूरिया और प्रधानमंत्री कृषि सिचाई जैसी ज़रूरी योजनाएं सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं। सरकार ने किसानों के वित्तीय समावेशन के लिए परम्परागत कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन जैसी कई अन्य योजनाएं भी चलाई हैं।

इन सबके बावजूद देश में मौजूद आर्थिक असमानता और बेरोज़गारी एक बड़ा मुद्दा है। एक विश्लेषण से पता चलता है कि 2013 से 2016 के दौरान गिन्नी गुणांक में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गिनी गुणांक के ज़रिये समाज में मौजूद आय व सम्पत्ति के असमान वितरण को मापा जाता है।

अगर कुछ आंकड़ों पर नज़र डालें तो भारत साल 2018 में वैश्विक भूख सूचकांक यानि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 119 देशों की सूची में 103वें नंबर पर आया था, तो वहीं स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भी भारत 195 देशों की सूची में 145वें पायदान पर है। इन सब आंकड़ों से देश के लोगों का औसत जीवन स्तर ज़ाहिर होता है।

इसके अलावा समाज के कई अन्य संवेदनशील वर्ग जैसे कि वरिष्ठ नागरिक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति, श्रमिक वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के लिए किये जा रहे तमाम प्रयासों के बावजूद काफी कुछ किये जाने की ज़रूरत है।

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