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DNS / 11 Dec 2019

(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) पाइका विद्रोह - आजादी की पहली लड़ाई (Paika Rebellion : The First War of Independence)


                    (डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) पाइका विद्रोह - आजादी की पहली लड़ाई (Paika Rebellion : The First War of Independence)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) पाइका विद्रोह - आजादी की पहली लड़ाई (Paika Rebellion : The First War of Independence)


बीते दिनों पाइका विद्रोह के दो सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ओडिशा में पाइका विद्रोह स्मारक की आधारशिला रखी। केंद्र सरकार 1857 का स्वाधीनता संग्राम जिसे सामान्य तौर पर भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, उसे पाठ्यपुस्तकों में बदलने की तैयारी की जा रही है। अब 1857 की क्रांति से पहले हुआ 1817 का पाइका विद्रोह पहला संग्राम माना जाएगा। इस सन्दर्भ में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा है कि 1817 के पाइका विद्रोह को अगले सत्र से इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रुप में स्थान मिलेगा.

DNS में आज हम जानेंगे कि पाइक विद्रोह क्या है। साथ ही समझेंगे इससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में...

पाइका विद्रोह की कहानी 19वीं सदी की कहानी है। दरअसल 1803 में जब ईस्टइंडिया कंपनी ने मराठाओं को हराया कर ओडिशा पर कब्जा किया तो इसी दौरान अंग्रेजों ने खोरदा के तत्कालीन राजा मुकुंददेव-2 से प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर का प्रबंधन छीन लिया। इस दौरान राजा मुकुंददेव-2 नाबालिग थे। ऐसे में राज्य का पूरा कामकाज देखने की ज़िम्मेदारी जयी राजगुरु पर था। अंग्रेज़ों की इस हरक़त के बाद उन्होंने ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी। हालांकि उनके इस क़दम के बाद अंग्रेजों ने उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी। जयी राजगुरु को फांसी दिए जाने के बाद लोगों में काफी आक्रोश देखने को मिला। इसके अलावा पाइका विद्रोह के कई सामाजिक, राजानीतिक और आर्थिक कारण भी मौजूद थे। इनमें अंग्रेजों ने विजय के बाद पाइकों की वंशानुगत लगान-मुक्त जमीन हड़प ली और उन्हें उनकी भूमि से वंचित कर दिया। इसके अलावा जबरन वसूली और उत्पीड़न का दौर भी यहीं से शुरू हो गया था। इससे न केवल किसान बल्कि जमींदार तक भी प्रभावित होने लगे। यही नहीं कंपनी ने कौड़ी मुद्रा व्यवस्था तक खत्म कर दिया जो कि ओडिशा में प्रचलन में थी। ऐसे में टैक्स चांदी में चुकाना अनिवार्य हो गया था।

बक्शी जगबंधु विद्याधर नाम के एक शख़्स ने इस आक्रोश को आंदोलन में तब्दील कर दिया। 1817 में ओडिशा के खुर्दा में गुरिल्ला युद्ध के अंदाज में बक्शी के सैनिकों ने अंग्रेजों पर हमला किया जिसे इतिहास में पाइका विद्रोह का नाम दिया गया। घुमसुर जो कि वर्तमान में गंजम और कंधमाल जिले का हिस्सा है, वहां के आदिवासियों और अन्य वर्गों ने इस विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई। देखा जाए तो पाइका विद्रोह के विस्तार का सही अवसर तब आया, जब घुमसुर के 400 आदिवासियों ने ब्रिटिश राज के खिलाफ बगावत करते हुए खुर्दा में दाख़िल हुए। इस दौरान पाइका विद्रोहियों ने ब्रिटिश राज के प्रतीकों पर हमला करते हुए पुलिस थानों, प्रशासकीय कार्यालयों और राजकोष में आग लगा दी। इसके अलावा पाइका विद्रोहियों को कनिका, कुजंग, नयागढ़ और घुमसुर के राजाओं, जमींदारों, ग्राम प्रधानों और आम किसानों का भी सहयोग मिला।

हालाँकि बाद में अंग्रेज़ों ने इस विद्रोह पर क़ाबू पा लिया और इसके बाद दमन का व्यापक दौर चला। ब्रिटिश हुकुमत ने इसके लिए कई लोगों को जेल में डाला दिया और कई लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी। इसके बाद भी कई विद्रोहियों ने 1819 तक गुरिल्ला युद्ध लड़ा, लेकिन अंत में उन्हें पकड़ कर मार दिया गया। बक्शी जगबंधु को भी 1825 में गिरफ्तार कर लिया गया और कैद में रहते हुए ही 1829 में उनकी मृत्यु हो गई। ओडिशा में पाइका विद्रोह को बहुत उच्च दर्जा प्राप्त है और बच्चे अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में वीरता की कहानियां पढ़ते हुए बड़े होते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से इस विद्रोह को राष्ट्रीय स्तर पर वैसा महत्व नहीं मिला जैसा कि मिलना चाहिए था। बता दें कि पाइका ओडिशा के गजपति शासकों के किसानों का असंगठित सैन्य दल था। पाइका नाम से जाने जाने वाले ये असंगठित सैन्य दल युद्ध के वक़्त राजाओं को सैन्य सेवाएं मुहैया कराते थे और बाकी समय में खेती किया करते थे।

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj