थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में वृद्धि
संदर्भ:
भारत में थोक मूल्य सूचकांक (WPI)-आधारित मुद्रास्फीति मार्च 2026 में बढ़कर 3.88% हो गई, जो पिछले 3 वर्षों का उच्चतम स्तर है। फरवरी में यह 2.1% थी। यह वृद्धि ईंधन, विनिर्मित वस्तुओं और प्राथमिक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण हुई। यह उत्पादन लागत में वृद्धि और भू-राजनीतिक तनावों के कारण आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं को दर्शाता है।
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के बारे में:
WPI थोक स्तर पर कीमतों में औसत परिवर्तन को मापता है और घरेलू बाजारों में थोक बिक्री के पहले चरण की कीमतों को दर्शाता है। इसे आर्थिक सलाहकार कार्यालय (DPIIT, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय) द्वारा प्रकाशित किया जाता है। इसका आधार वर्ष 2011–12 है और इसमें 697 वस्तुओं की टोकरी शामिल है। इसकी संरचना में प्राथमिक वस्तुएँ (22.618%), ईंधन एवं ऊर्जा (13.152%), तथा विनिर्मित उत्पाद (64.230%) शामिल हैं, जो इसका सबसे बड़ा हिस्सा बनाते हैं।
मुद्रास्फीति के प्रमुख कारण:
WPI मुद्रास्फीति में वृद्धि के पीछे वैश्विक और घरेलू दोनों कारक हैं। कच्चे तेल और ऊर्जा की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसमें पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनावों के कारण आपूर्ति श्रृंखलाएँ बाधित होने से पेट्रोलियम कीमतें 50% से अधिक बढ़ गईं। औद्योगिक इनपुट लागत भी बढ़ी है, जैसे सल्फ्यूरिक एसिड (77.2%), कॉपर वायर (21.9%) और एल्युमिनियम पाउडर (15.8%)। विनिर्मित वस्तुओं, जिनका WPI में सबसे अधिक भार है, में 3.4% की वृद्धि हुई, और 22 में से 16 उप-समूहों में कीमतें बढ़ीं।
खाद्य मुद्रास्फीति की स्थिति:
कुल मुद्रास्फीति के बावजूद, खाद्य मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत स्थिर 1.85% रही। अनाज, दालों और गेहूं की कीमतों में गिरावट देखी गई, साथ ही आलू और प्याज की कीमतों में तेज कमी आई। हालांकि, सब्जियों की कीमतों में 1.5% की वृद्धि हुई, जो निम्न-आय वर्ग के परिवारों को प्रभावित कर सकती है।
अर्थव्यवस्था और निवेशकों पर प्रभाव:
इनपुट लागत बढ़ने से कॉर्पोरेट कंपनियों के लाभ मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है, विशेषकर धातु और ऊर्जा-गहन क्षेत्रों में। यदि थोक मुद्रास्फीति उपभोक्ता मुद्रास्फीति (CPI) को प्रभावित करती है, तो भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को ऊँची ब्याज दरें बनाए रखनी पड़ सकती हैं। मुद्रास्फीति का दबाव निवेशकों के भरोसे को कम कर सकता है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) को प्रभावित कर सकता है।
WPI बनाम PPI:
WPI केवल वस्तुओं की थोक कीमतों को मापता है और सेवाओं को शामिल नहीं करता, जबकि PPI (उत्पादक मूल्य सूचकांक) वस्तुओं और सेवाओं दोनों को शामिल करता है और दोहरी गणना से बचाता है। CPI उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान की गई खुदरा कीमतों को मापता है। वैश्विक स्तर पर कई अर्थव्यवस्थाएँ अधिक सटीक मुद्रास्फीति मापन के लिए PPI को प्राथमिकता देती हैं।
WPI से PPI की ओर बदलाव क्यों?
WPI सेवा क्षेत्र को शामिल नहीं करता, जो भारत के GDP में 55% से अधिक योगदान देता है। यह करों और सब्सिडी को भी शामिल नहीं करता और दोहरी गणना की समस्या से ग्रस्त है। PPI अधिक व्यापक है और विकसित अर्थव्यवस्थाओं, जैसे अमेरिका, में उपयोग किए जाने वाले वैश्विक मानकों के अनुरूप है।
निष्कर्ष:
WPI में वृद्धि अर्थव्यवस्था में लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति को दर्शाती है। वैश्विक झटकों के बीच नीति-निर्माताओं के सामने मुद्रास्फीति नियंत्रण और विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। PPI की ओर संक्रमण मुद्रास्फीति के अधिक सटीक मापन और बेहतर आर्थिक नीति निर्माण में मदद कर सकता है।

