चर्चा में क्यों?
हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने "लेबर मार्केट डायनेमिक्स इन मिलियन-प्लस सिटीज़" शीर्षक से अपनी रिपोर्ट जारी की है, जो आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 पर आधारित है। पहली बार इस रिपोर्ट में 2011 की जनगणना के अनुसार 10 लाख से अधिक आबादी वाले भारत के 46 शहरों के श्रम बाज़ार का विस्तृत आकलन प्रस्तुत किया गया है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:
नियमित वेतनभोगी रोजगार में महिलाओं की अधिक भागीदारी
भारत के दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्थायी एवं नियमित वेतनभोगी रोजगार प्राप्त हो रहा है।
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- इन शहरों में कार्यरत 65.1% महिलाएँ नियमित/वेतनभोगी नौकरियों में हैं।
- जबकि शहरी भारत में यह अनुपात 50.9% है।
- इसी प्रकार, मिलियन-प्लस शहरों में 56.4% पुरुष नियमित वेतनभोगी रोजगार में कार्यरत हैं।
- इन शहरों में कार्यरत 65.1% महिलाएँ नियमित/वेतनभोगी नौकरियों में हैं।
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बड़े शहरी केंद्र महिलाओं को औपचारिक (Formal) रोजगार के बेहतर अवसर प्रदान कर रहे हैं।
श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) अब भी कम:
बेहतर गुणवत्ता वाले रोजगार उपलब्ध होने के बावजूद महिलाओं की श्रम भागीदारी अभी भी सीमित है।
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श्रेणी |
मिलियन-प्लस शहर |
शहरी भारत |
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पुरुष WPR |
72.6% |
73.0% |
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महिला WPR |
25.5% |
25.9% |
अर्थात, बड़े शहरों में भी लगभग प्रत्येक चार महिलाओं में केवल एक महिला ही कार्यरत है।
श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) क्या है?
श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) कुल जनसंख्या में कार्यरत व्यक्तियों का प्रतिशत दर्शाता है।
सूत्र
WPR = (कार्यरत व्यक्तियों की संख्या ÷ कुल जनसंख्या) × 100
महत्व
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- अर्थव्यवस्था में रोजगार के स्तर को मापता है।
- श्रम बाज़ार के उपयोग (Labour Market Utilisation) का संकेत देता है।
- रोजगार में लैंगिक असमानताओं का आकलन करने में सहायक है।
- इसे राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा PLFS के माध्यम से मापा जाता है।
- अर्थव्यवस्था में रोजगार के स्तर को मापता है।
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WPR और LFPR में अंतर:
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श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) |
श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) |
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केवल कार्यरत व्यक्तियों को शामिल करता है। |
कार्यरत एवं रोजगार की तलाश कर रहे बेरोज़गार दोनों को शामिल करता है। |
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वास्तविक रोजगार को दर्शाता है। |
श्रम बाज़ार में भागीदारी को दर्शाता है। |
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हमेशा LFPR के बराबर या उससे कम होता है। |
हमेशा WPR के बराबर या उससे अधिक होता है। |
लैंगिक वेतन अंतर (Gender Pay Gap):
यद्यपि बड़े शहरों में वेतन अपेक्षाकृत अधिक है, फिर भी महिलाओं की आय पुरुषों की तुलना में काफी कम बनी हुई है।
नियमित वेतनभोगी रोजगार में औसत मासिक वेतन
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क्षेत्र |
पुरुष |
महिलाएँ |
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शहरी भारत |
₹27,984 |
₹21,664 |
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मिलियन-प्लस शहर |
₹30,707 |
₹23,707 |
महिलाएँ पुरुषों के वेतन का लगभग 77.2% ही अर्जित कर रही हैं, चाहे शहरी भारत हो या मिलियन-प्लस शहर।
लैंगिक वेतन समानता के करीब स्थिति:
कुछ शहरों में महिलाओं की आय पुरुषों के बराबर या उससे अधिक है।
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- प्रयागराज – 131.2%
- श्रीनगर – 124%
- लखनऊ – 117.1%
- पटना – 111.1%
- मेरठ – 105.9%
- वाराणसी – 102.4%
- प्रयागराज – 131.2%
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महानगरों में ग्रेटर मुंबई सबसे बेहतर प्रदर्शन करता है, जहाँ महिलाओं की आय पुरुषों की आय का 98.2% है।
मिलियन-प्लस शहरों में रोजगार का स्वरूप:
शहरी भारत की तुलना में:
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- नियमित वेतनभोगी रोजगार: 58.5% (मिलियन-प्लस शहर) बनाम 47.6% (शहरी भारत)
- स्वरोज़गार एवं आकस्मिक (Casual) रोजगार: 41.4% बनाम 52.4%
- नियमित वेतनभोगी रोजगार: 58.5% (मिलियन-प्लस शहर) बनाम 47.6% (शहरी भारत)
यह दर्शाता है कि बड़े शहरों में रोजगार अपेक्षाकृत अधिक औपचारिक (Formalised) है।
रिपोर्ट में उजागर प्रमुख चुनौतियाँ:
उच्च NEET जनसंख्या:
30–59 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में:
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- मिलियन-प्लस शहरों में 67% महिलाएँ NEET (रोज़गार, शिक्षा या प्रशिक्षण में नहीं) हैं।
- पूरे शहरी भारत में यह आँकड़ा 65% है।
- मिलियन-प्लस शहरों में 67% महिलाएँ NEET (रोज़गार, शिक्षा या प्रशिक्षण में नहीं) हैं।
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महिलाओं की कम श्रम भागीदारी के प्रमुख कारण:
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- बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी
- घरेलू कार्यों का भार
- लचीले रोजगार (Flexible Employment) की कमी
- सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएँ
- सुरक्षा एवं आवागमन (Mobility) संबंधी समस्याएँ
- बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी
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नीतिगत महत्व:
रिपोर्ट के निष्कर्ष निम्नलिखित क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
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- सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5 – लैंगिक समानता
- सतत विकास लक्ष्य (SDG) 8 – सम्मानजनक कार्य एवं आर्थिक विकास
- महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण
- शहरी रोजगार नीति निर्माण
- समावेशी आर्थिक विकास
- सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5 – लैंगिक समानता
महिलाओं की श्रम भागीदारी में वृद्धि भारत की GDP तथा जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकती है।
आगे की राह:
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- किफायती एवं गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल (Childcare) सुविधाओं का विस्तार।
- लचीले एवं दूरस्थ (Remote) कार्य अवसरों को बढ़ावा देना।
- कार्यस्थलों की सुरक्षा एवं सार्वजनिक परिवहन में सुधार।
- महिलाओं के लिए कौशल विकास एवं डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों को सुदृढ़ करना।
- समान वेतन एवं भेदभाव-रोधी कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन।
- लक्षित प्रोत्साहनों (Targeted Incentives) के माध्यम से औपचारिक रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना।
- किफायती एवं गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल (Childcare) सुविधाओं का विस्तार।
निष्कर्ष:
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की नवीनतम रिपोर्ट भारत के बड़े शहरों में महिलाओं के रोजगार की एक मिश्रित तस्वीर प्रस्तुत करती है। एक ओर, मिलियन-प्लस शहर महिलाओं को अधिक औपचारिक एवं नियमित वेतनभोगी रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं की श्रम भागीदारी अब भी कम है तथा वेतन असमानता बनी हुई है। यदि बिना वेतन वाले देखभाल कार्य, सुरक्षा संबंधी चुनौतियों तथा अवसरों की असमानता जैसी संरचनात्मक बाधाओं को दूर किया जाए, तो भारत समावेशी शहरी विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ अपनी पूर्ण आर्थिक क्षमता का भी प्रभावी उपयोग कर सकेगा।

