होम > Blog

Blog / 25 Jul 2026

वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDAs) के लिए फ्रेमवर्क

संदर्भ:

हाल ही में, वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने भारत में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDAs) के लिए एक खास कानूनी फ्रेमवर्क बनाने की सिफारिश की है। समिति ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि लगभग 12 करोड़ भारतीय इस इकोसिस्टम से जुड़े हैं। इसलिए, निवेशकों के हितों की रक्षा और बाजार में अनुशासन बनाए रखने के लिए "मौजूदा रेगुलेटरी कमी" को दूर करना बहुत ज़रूरी है।

वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDAs) की प्रकृति और मौजूदा स्थिति:

      • वर्चुअल डिजिटल एसेट्स में क्रिप्टोकरेंसी, नॉन-फंजिबल टोकन (NFTs) और कोड-आधारित डिजिटल टोकन शामिल हैं। ये शेयर या बॉन्ड जैसी पारंपरिक एसेट्स से बिल्कुल अलग हैं, जो कॉर्पोरेट इक्विटी या कर्ज पर कानूनी अधिकार दिखाते हैं। इसके बजाय, VDAs डिसेंट्रलाइज्ड लेजर टेक्नोलॉजी पर आधारित होते हैं और इनका कोई भौतिक आधार (फिजिकल बैकिंग) नहीं होता है।
      • फिलहाल, VDAs के प्रति भारत का नजरिया कानूनी मान्यता के बिना केवल वित्तीय निगरानी तक सीमित है:
        • टैक्सेशन: इनकम टैक्स एक्ट की धारा 2(47A) के तहत परिभाषित, VDA ट्रांज़ैक्शन से होने वाले मुनाफे पर 30% टैक्स और 1% टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) लगता है। हालांकि, टैक्स लगाने का मतलब यह नहीं है कि इन्हें कानूनी मान्यता या लीगल टेंडर का दर्जा मिल गया है।
        • एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग: VDA प्लेटफॉर्म्स को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत रिपोर्टिंग संस्थाओं के तौर पर रजिस्टर करना होगा और फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (FIU-IND) के नियमों का पालन करना होगा।

Virtual digital assets and India's stand on it– Explained, pointwise  -ForumIAS Blog

एक अलग फ्रेमवर्क की ज़रूरत:

समिति ने VDAs को प्रस्तावित सिक्योरिटीज मार्केट कोड (SMC) में शामिल न करने की सलाह दी। पारंपरिक सिक्योरिटीज कानूनों में एक पहचान योग्य जारीकर्ता (इश्यूअर) और सेंट्रलाइज्ड क्लियरिंग की व्यवस्था होती है। चूंकि VDAs बिना किसी सीमा वाले, डिसेंट्रलाइज्ड प्रोटोकॉल पर काम करते हैं, इसलिए उन्हें मौजूदा कानूनों में जबरन शामिल करने से अस्पष्टता पैदा होती है। एक अलग फ्रेमवर्क रेगुलेटरी निश्चितता देता है और डिसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस से जुड़े खास स्ट्रक्चरल जोखिमों को ध्यान में रखता है।

स्ट्रक्चरल समाधान:

        • तत्काल जोखिमों को कम करने के लिए, समिति ने एक तय रेगुलेटर के तहत काम करने वाले मान्यता प्राप्त सेल्फ-रेगुलेटरी ऑर्गनाइजेशन्स (SROs) के माध्यम से एक अंतरिम व्यवस्था का प्रस्ताव दिया। SROs इंडस्ट्री के हिसाब से लचीले और खास मानक लागू कर सकते हैं:
        • गवर्नेंस: कम से कम पारदर्शिता, ट्रांज़ैक्शन की जानकारी देने और सख्त आचार संहिता को अनिवार्य बनाना।
        • निवेशक सुरक्षा: रिटेल विवादों को सुलझाने के लिए अनिवार्य शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना।

निष्कर्ष:

भारत की विकसित होती VDA रणनीति तकनीकी इनोवेशन और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की पारंपरिक रेगुलेटरी चुनौती को उजागर करती है। हालांकि टैक्स और AML जांच ने इस सेक्टर को बुनियादी निगरानी के दायरे में ला दिया है, लेकिन ये एक व्यापक उपभोक्ता सुरक्षा कानून की जगह नहीं ले सकते। आगे बढ़ते हुए, भारत को लचीली और अंतरिम निगरानी के लिए SROs का इस्तेमाल करना चाहिए और साथ ही अंतरराष्ट्रीय फ्रेमवर्क में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उसकी घरेलू डिजिटल अर्थव्यवस्था वैश्विक वित्तीय अपराधों के खिलाफ मजबूत बनी रहे।

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj