संदर्भ:
हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान एक नए रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का विस्तार करता है, साथ ही डेनमार्क की संप्रभुता और ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार की पुनः पुष्टि करता है। यह समझौता 1951 के अमेरिका–डेनमार्क रक्षा समझौते को अद्यतन करता है।
समझौते के प्रमुख प्रावधान:
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- दो नए रक्षा क्षेत्र: समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में दो स्थानों पर नए रक्षा क्षेत्र स्थापित करने की अनुमति दी गई है:
- नरसार्सुआक (Narsarsuaq)- दक्षिणी ग्रीनलैंड में स्थित यह स्थान द्वितीय विश्व युद्ध के समय का एक पूर्व सैन्य अड्डा और हवाई अड्डा है।
- मेस्टर्सविग (Mestersvig)- पूर्वी ग्रीनलैंड में स्थित एक दूरस्थ क्षेत्र, जो वर्तमान में डेनमार्क के सैन्य अभियानों से जुड़ा हुआ है।
- इन रक्षा क्षेत्रों से संबंधित सटीक तौर-तरीकों और तकनीकी व्यवस्थाओं के लिए संबंधित पक्षों के बीच समझौते की आवश्यकता होगी।
- नरसार्सुआक (Narsarsuaq)- दक्षिणी ग्रीनलैंड में स्थित यह स्थान द्वितीय विश्व युद्ध के समय का एक पूर्व सैन्य अड्डा और हवाई अड्डा है।
- पिटुफिक स्पेस बेस का विस्तार: अमेरिका पहले से ही उत्तर-पश्चिमी ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस बेस (Pituffik Space Base) का संचालन करता है। नए समझौते के तहत वाशिंगटन को वहाँ अपनी गतिविधियों को आधुनिक बनाने और विस्तार करने की अनुमति मिलेगी।
- संप्रभुता का कोई हस्तांतरण नहीं: महत्वपूर्ण रूप से, इस समझौते के तहत ग्रीनलैंड का कोई क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका को हस्तांतरित नहीं किया गया है। यह समझौता डेनमार्क की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की पुनः पुष्टि करता है तथा ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है। इसलिए यह समझौता क्षेत्रीय अधिग्रहण के बजाय रक्षा एवं सैन्य सहयोग के विस्तार का प्रतिनिधित्व करता है।
- गैर- नाटो सैन्य उपस्थिति पर प्रतिबंध: यह समझौता नाटो से बाहर के देशों को ग्रीनलैंड में मानवयुक्त या मानव रहित सैन्य प्रतिष्ठान स्थापित करने अथवा स्थायी सैन्य उपस्थिति बनाए रखने से रोकता है। इससे ग्रीनलैंड का व्यापक नाटो सुरक्षा ढाँचे के साथ एकीकरण मजबूत होता है।
- दो नए रक्षा क्षेत्र: समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में दो स्थानों पर नए रक्षा क्षेत्र स्थापित करने की अनुमति दी गई है:
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ग्रीनलैंड: भौगोलिक स्थिति एवं प्रमुख तथ्य
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- ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा गैर-महाद्वीपीय द्वीप है, जो आर्कटिक और अटलांटिक महासागरों के बीच स्थित है। इसका क्षेत्रफल लगभग 21.6 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसमें लगभग 80% भाग ग्रीनलैंड आइस शीट से ढका हुआ है। यह अंटार्कटिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी हिमचादर है।
- बर्फ से मुक्त तटीय क्षेत्र में ऊबड़-खाबड़ पर्वत, गहरी फियोर्ड और चट्टानी भू-भाग पाए जाते हैं। गुन्नब्योर्न फ्येल्ड (3,694 मीटर) ग्रीनलैंड की सबसे ऊँची चोटी है।
- ग्रीनलैंड की जलवायु ध्रुवीय/उप-आर्कटिक है, जहाँ मध्यरात्रि का सूर्य (Midnight Sun) और ध्रुवीय रात्रि (Polar Night) जैसी घटनाएँ देखी जाती हैं।
- राजधानी: नूक (Nuuk)
- जनसंख्या: लगभग 56,000–57,000
- राजनीतिक स्थिति: डेनमार्क के साम्राज्य (Kingdom of Denmark) के अंतर्गत स्वशासित क्षेत्र; डेनमार्क के पास रक्षा और विदेश नीति सहित कुछ प्रमुख जिम्मेदारियाँ हैं।
- राजधानी: नूक (Nuuk)
- ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा गैर-महाद्वीपीय द्वीप है, जो आर्कटिक और अटलांटिक महासागरों के बीच स्थित है। इसका क्षेत्रफल लगभग 21.6 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसमें लगभग 80% भाग ग्रीनलैंड आइस शीट से ढका हुआ है। यह अंटार्कटिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी हिमचादर है।
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ग्रीनलैंड रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्यों है?
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- भू-रणनीतिक स्थिति: ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है, जिससे यह आर्कटिक निगरानी, मिसाइल चेतावनी, वायु रक्षा और उत्तरी अटलांटिक के समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है।
- आर्कटिक में प्रतिस्पर्धा: समुद्री बर्फ के पिघलने से आर्कटिक समुद्री मार्गों और संसाधनों तक पहुँच बढ़ रही है। इससे अमेरिका, रूस, चीन और नाटो के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है।
- प्राकृतिक संसाधन: ग्रीनलैंड में दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earth Elements) और अन्य खनिजों की महत्वपूर्ण संभावनाएँ हैं। इससे इसका आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व बढ़ गया है।
- जलवायु परिवर्तन: आर्कटिक का तेजी से गर्म होना समुद्री परिवहन, संसाधनों तक पहुँच और सुरक्षा संबंधी रणनीतियों को बदल रहा है। इसके साथ ही यह गंभीर पर्यावरणीय चिंताओं को भी जन्म दे रहा है।
- भू-रणनीतिक स्थिति: ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है, जिससे यह आर्कटिक निगरानी, मिसाइल चेतावनी, वायु रक्षा और उत्तरी अटलांटिक के समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है।
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भारत के लिए निहितार्थ:
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- यह घटनाक्रम भारत की आर्कटिक नीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत की आर्कटिक नीति जलवायु परिवर्तन, वैज्ञानिक अनुसंधान, संसाधनों के सतत उपयोग और आर्कटिक शासन में अधिक भागीदारी पर केंद्रित है।
- आर्कटिक क्षेत्र का बढ़ता सैन्यीकरण आर्कटिक में सुरक्षा और शांतिपूर्ण वैज्ञानिक सहयोग के बीच संतुलन को जटिल बना सकता है।
- यह घटनाक्रम भारत की आर्कटिक नीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत की आर्कटिक नीति जलवायु परिवर्तन, वैज्ञानिक अनुसंधान, संसाधनों के सतत उपयोग और आर्कटिक शासन में अधिक भागीदारी पर केंद्रित है।
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निष्कर्ष:
अमेरिका–डेनमार्क–ग्रीनलैंड रक्षा समझौता आर्कटिक के बढ़ते रणनीतिक महत्व को दर्शाता है। आर्कटिक अब केवल जलवायु और पर्यावरण का क्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि यह सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधनों, जलवायु परिवर्तन और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का भी महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र की उभरती रणनीतिक व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका प्रदान करती है।

