संदर्भ:
हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जानकारी दी है कि वर्ष 2029 तक 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर दी जाएगी।
समान नागरिक संहिता क्या है?
-
-
- समान नागरिक संहिता (UCC) से आशय ऐसे प्रस्तावित समान नागरिक कानूनों के एक समूह से है, जो धर्म की परवाह किए बिना सभी नागरिकों के व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेना और उत्तराधिकार को नियंत्रित करेगा।
- वर्तमान में, इनमें से कई विषय अलग-अलग धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों द्वारा नियंत्रित होते हैं, जैसे हिंदू व्यक्तिगत कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के अंतर्गत मुस्लिम व्यक्तिगत कानून।
- UCC का उद्देश्य कानून के समक्ष समानता, लैंगिक न्याय और नागरिक अधिकारों में एकरूपता स्थापित करना है, साथ ही स्वतंत्रता और बहुलवाद के संवैधानिक सिद्धांतों को बनाए रखना है।
- समान नागरिक संहिता (UCC) से आशय ऐसे प्रस्तावित समान नागरिक कानूनों के एक समूह से है, जो धर्म की परवाह किए बिना सभी नागरिकों के व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेना और उत्तराधिकार को नियंत्रित करेगा।
-
संवैधानिक ढाँचा:
-
-
- अनुच्छेद 44, जो भाग IV (राज्य के नीति-निदेशक तत्व – DPSP) के अंतर्गत आता है, राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 37 के अनुसार, नीति-निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (non-justiciable) नहीं हैं। अर्थात, इन्हें न्यायालयों द्वारा सीधे लागू नहीं कराया जा सकता, लेकिन ये शासन के लिए मौलिक हैं और नीतियाँ बनाते समय राज्य का मार्गदर्शन करते हैं।
- UCC के लिए समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन आवश्यक है। अनुच्छेद 14 और 15 समानता को बढ़ावा देते हैं और भेदभाव पर रोक लगाते हैं, जबकि अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता तथा धार्मिक मामलों के प्रबंधन के अधिकार की रक्षा करते हैं। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है।
- इस प्रकार, प्रमुख चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलता को कमजोर किए बिना लैंगिक न्याय और समानता सुनिश्चित की जाए।
- अनुच्छेद 44, जो भाग IV (राज्य के नीति-निदेशक तत्व – DPSP) के अंतर्गत आता है, राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
-
सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय:
-
-
- शाह बानो मामला (1985): सर्वोच्च न्यायालय ने CrPC की धारा 125 के तहत एक मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार को बरकरार रखा और राष्ट्रीय एकीकरण के संदर्भ में अनुच्छेद 44 की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
- सरला मुद्गल मामला (1995): न्यायालय ने कहा कि केवल दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम धर्म अपनाने से पहले से मौजूद हिंदू विवाह स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। न्यायालय ने UCC की आवश्यकता पर भी पुनः जोर दिया।
- जॉन वल्लामट्टोम मामला (2003): न्यायालय ने ईसाई वसीयतकर्ताओं को प्रभावित करने वाले एक भेदभावपूर्ण प्रावधान को निरस्त किया और व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया।
- शायरा बानो मामला (2017): सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित किया, जिससे लैंगिक न्यायसंगत व्यक्तिगत कानूनों पर बहस को बल मिला।
- शाह बानो मामला (1985): सर्वोच्च न्यायालय ने CrPC की धारा 125 के तहत एक मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार को बरकरार रखा और राष्ट्रीय एकीकरण के संदर्भ में अनुच्छेद 44 की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
-
वर्तमान स्थिति:
-
-
- भारत में पहले से ही समान आपराधिक कानून और कई समान वाणिज्यिक कानून मौजूद हैं, लेकिन व्यक्तिगत कानून अभी भी विभिन्न समुदायों में अलग-अलग हैं।
- गोवा में ऐतिहासिक रूप से पुर्तगाली सिविल कोड से विकसित एक सामान्य नागरिक कानून व्यवस्था लागू रही है। राज्य स्तर पर उत्तराखंड UCC कानून बनाने वाला पहला राज्य बन गया है।
- भारत में पहले से ही समान आपराधिक कानून और कई समान वाणिज्यिक कानून मौजूद हैं, लेकिन व्यक्तिगत कानून अभी भी विभिन्न समुदायों में अलग-अलग हैं।
-
UCC के पक्ष में तर्क:
-
-
- लैंगिक समानता और समान कानूनी अधिकारों को बढ़ावा देता है।
- कानून के समक्ष समानता को मजबूत करता है।
- भारत की जटिल व्यक्तिगत-कानून व्यवस्था को सरल बना सकता है।
- राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा दे सकता है।
- व्यक्तिगत कानूनों के भीतर मौजूद भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त कर सकता है।
- लैंगिक समानता और समान कानूनी अधिकारों को बढ़ावा देता है।
-
UCC के विरोध में तर्क:
-
-
- इसे अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।
- भारत में अत्यधिक धार्मिक, जनजातीय और क्षेत्रीय विविधता है।
- एकल कानून विभिन्न समुदायों की अलग-अलग परंपराओं और रीति-रिवाजों को पर्याप्त रूप से समायोजित नहीं कर सकता।
- पर्याप्त परामर्श के अभाव में यह सामाजिक तनाव पैदा कर सकता है।
- आलोचकों को आशंका है कि एकरूपता वास्तविक समानता के बजाय बहुसंख्यकवादी थोपने का रूप ले सकती है।
- इसे अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।
-
आगे की राह:
UCC को व्यापक परामर्श, संवैधानिक सिद्धांतों और सामाजिक सहमति के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इसका ध्यान भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त करने के साथ-साथ वैध सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने पर होना चाहिए। चरणबद्ध और समावेशी दृष्टिकोण, जिसमें विशेष रूप से लैंगिक न्याय और समानता पर जोर दिया जाए, इस सुधार को अधिक टिकाऊ और प्रभावी बना सकता है।

