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Blog / 31 Oct 2026

UNEP ने गंगा डॉल्फिन संरक्षण और रोजगार सृजन कार्यक्रम के लिए भारत को सम्मानित किया

संदर्भ:

हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने अपनी रिपोर्ट नेचर्ज़ कमबैक– स्केलिंग इकोसिस्टम रेस्टोरेशन फॉर पीपल एंड प्लैनेट (Nature’s Comeback – Scaling Ecosystem Restoration for People and Planet) में भारत के गंगा नदी डॉल्फिन संरक्षण कार्यक्रम को मान्यता दी है। इस पहल को जैव विविधता संरक्षण, मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और हरित रोजगार सृजन में योगदान के लिए संयुक्त राष्ट्र के 35 विश्व पुनर्स्थापन फ्लैगशिप (UN World Restoration Flagships) में शामिल किया गया है।

गंगा नदी डॉल्फिन के बारे में:

गंगा नदी डॉल्फिन (Platanista gangetica), जिसे लोकप्रिय रूप से 'सुसु' (Susu) कहा जाता है, मीठे पानी में रहने वाला एक जलीय स्तनधारी जीव है। यह मुख्य रूप से भारत, नेपाल और बांग्लादेश की गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना तथा कर्णफुली-सांगू नदी प्रणालियों में पाई जाती है।

      • इसे वर्ष 2009 में भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव (National Aquatic Animal) घोषित किया गया था।
      • इसे IUCN की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में रखा गया है।
      • इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल किया गया है।
      • इसे CITES के परिशिष्ट-I (Appendix I) में शामिल किया गया है।
      • यह कार्यात्मक रूप से दृष्टिहीन होती है और दिशा निर्धारित करने तथा शिकार का पता लगाने के लिए प्रतिध्वनि निर्धारण (Echolocation) तकनीक का उपयोग करती है।
      • डॉल्फिन एक संकेतक प्रजाति (Indicator Species) के रूप में कार्य करती है, जो नदी पारिस्थितिकी तंत्र के पर्यावरणीय स्वास्थ्य को दर्शाती है।

UNEP ने गंगा डॉल्फिन संरक्षण और रोजगार सृजन कार्यक्रम के लिए भारत को सम्मानित किया

भारत के गंगा डॉल्फिन संरक्षण कार्यक्रम के बारे में:

भारत ने इस संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण के लिए कई पहलें शुरू की हैं।

      • व्यापक कार्ययोजना (2022–2047): यह आवास संरक्षण, आबादी की निगरानी, वैज्ञानिक अनुसंधान और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से डॉल्फिन संरक्षण के लिए एक दीर्घकालिक रूपरेखा प्रदान करती है।
      • प्रोजेक्ट डॉल्फिन (2020): इसे नदी और समुद्री डॉल्फिन के संरक्षण को मजबूत करने के लिए शुरू किया गया था। इसके तहत आवास का क्षरण, मछली पकड़ने से होने वाली मृत्यु तथा अन्य खतरों जैसी चुनौतियों का समाधान किया जाता है।
      • सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदाय, मछुआरे और संरक्षण स्वयंसेवक निगरानी, बचाव अभियान तथा जागरूकता कार्यक्रमों में योगदान देते हैं। इस प्रकार की भागीदारी संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों में रोजगार के अवसर पैदा कर सकती है और टिकाऊ आजीविका को बढ़ावा दे सकती है।
      • आवास बहाली: इसके तहत नदी के जल की गुणवत्ता में सुधार, पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flows) बनाए रखने तथा प्रदूषण और आवास विखंडन (Habitat Fragmentation) से उत्पन्न खतरों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है। बिहार स्थित विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य इसका एक महत्त्वपूर्ण संरक्षित आवास है।

भारत के लिए महत्त्व:

इस मान्यता का महत्त्व तीन प्रमुख आयामों में देखा जा सकता है:

      • पारिस्थितिक: मीठे पानी की जैव विविधता के संरक्षण और नदी पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली को मजबूती प्रदान करता है।
      • आर्थिक: हरित रोजगार, इको-टूरिज्म और टिकाऊ आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देता है।
      • सामाजिक: समुदाय आधारित संरक्षण को प्रोत्साहित करता है और नदी संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाता है।

UNEP रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

यह रिपोर्ट UNEP, खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और जैव विविधता अभिसमय (CBD) के सचिवालय द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित की गई है। इसमें पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली का पहला व्यापक वैश्विक आकलन प्रस्तुत किया गया है।

प्रमुख निष्कर्षों में शामिल हैं:

      • 149 देशों में लगभग 25.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि को पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के अंतर्गत लाया गया है।
      • इन गतिविधियों से 10 लाख से अधिक हरित रोजगार सृजित हुए हैं।
      • एशिया में दर्ज पारिस्थितिकी तंत्र बहाली का क्षेत्रफल 19.22 करोड़ हेक्टेयर है।
      • मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के अंतर्गत केवल 1.1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है, जो इस क्षेत्र पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता को दर्शाता है।
      • रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैश्विक प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के 15% हिस्से को बहाल करने से औद्योगिक क्रांति के बाद से हुए CO₂ समतुल्य उत्सर्जन के 30% हिस्से को संभावित रूप से अवशोषित किया जा सकता है तथा 60% प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे को टाला जा सकता है।

निष्कर्ष:

UNEP द्वारा मिली यह मान्यता जैव विविधता संरक्षण को सतत विकास के साथ जोड़ने के भारत के प्रयासों को दर्शाती है। गंगा डॉल्फिन संरक्षण कार्यक्रम यह प्रदर्शित करता है कि पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के माध्यम से संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा करने के साथ-साथ रोजगार और सामुदायिक आजीविका को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। आगे बढ़ते हुए, भारत को दीर्घकालिक पारिस्थितिक सुरक्षा सुनिश्चित करने और पारिस्थितिकी तंत्र बहाली पर संयुक्त राष्ट्र दशक (2021–2030) के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन दृष्टिकोण (Integrated River Basin Management Approach) अपनाना चाहिए।

 

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