संदर्भ:
केंद्र सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2025–26 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.4% अनुमानित किए जाने के एक दिन बाद, संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (यूएन डेसा) ने अपनी रिपोर्ट विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाएँ 2026 में चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की विकास दर 7.2% अनुमानित की है। यह आकलन वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितताओं, विशेषकर अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊँचे शुल्क (टैरिफ), के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती और लचीलेपन को दर्शाता है।
भारत की आर्थिक वृद्धि के प्रमुख कारण:
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- मज़बूत घरेलू माँग: निजी उपभोग लगातार सशक्त बना हुआ है। बढ़ती आय, रोज़गार की अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति तथा सेवा क्षेत्र के सुदृढ़ प्रदर्शन ने घरेलू माँग को ठोस आधार प्रदान किया है।
- सार्वजनिक निवेश को प्रोत्साहन: रिपोर्ट में वर्ष 2025 के दौरान सकल स्थायी पूंजी निर्माण में तीव्र वृद्धि को रेखांकित किया गया है, जिसका प्रमुख कारण सरकार द्वारा निम्नलिखित क्षेत्रों में बढ़ाया गया पूंजीगत व्यय है:
- भौतिक एवं डिजिटल अवसंरचना
- रक्षा क्षेत्र
- नवीकरणीय ऊर्जा
- भौतिक एवं डिजिटल अवसंरचना
- नीतिगत सहयोग उपाय: कर सुधार तथा मौद्रिक नीति में ढील से निकट अवधि में माँग और निवेश दोनों को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलने की प्रबल संभावना है।
- मज़बूत घरेलू माँग: निजी उपभोग लगातार सशक्त बना हुआ है। बढ़ती आय, रोज़गार की अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति तथा सेवा क्षेत्र के सुदृढ़ प्रदर्शन ने घरेलू माँग को ठोस आधार प्रदान किया है।
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बाहरी जोखिम और संतुलनकारी कारक:
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- अमेरिकी शुल्कों का प्रभाव: भारत के लगभग 18% निर्यात अमेरिका को होते हैं, जिसके कारण वहाँ लगाए गए शुल्क भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए एक संभावित नकारात्मक जोखिम उत्पन्न कर सकते हैं।
- निर्यात बाज़ारों में विविधता: यूरोप और पश्चिम एशिया से बनी मज़बूत माँग, वैश्विक व्यापार में दीर्घकालिक व्यवधानों के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
- क्षेत्रवार परिदृश्य: आपूर्ति पक्ष की दृष्टि से, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र अनुमानित अवधि के दौरान विकास के प्रमुख स्तंभ बने रहने की संभावना है, जिससे भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक संभावनाएँ और अधिक मज़बूत होंगी।
- अमेरिकी शुल्कों का प्रभाव: भारत के लगभग 18% निर्यात अमेरिका को होते हैं, जिसके कारण वहाँ लगाए गए शुल्क भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए एक संभावित नकारात्मक जोखिम उत्पन्न कर सकते हैं।
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वैश्विक तुलना:
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- जहाँ भारत अपने निवेश चक्र का निरंतर विस्तार कर रहा है, वहीं चीन में वर्ष 2025 की पहली तीन तिमाहियों के दौरान अचल संपत्ति क्षेत्र में जारी कमजोरी के कारण स्थायी परिसंपत्ति निवेश गिरावट देखी गई है।
- इसके विपरीत, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों में दीर्घकालिक आर्थिक विविधीकरण रणनीतियों के अनुरूप बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश गतिविधियाँ सतत रूप से जारी हैं।
- अमेरिका और यूरोपीय संघ में आर्थिक वृद्धि दर मध्यम बनी हुई है, जहाँ राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतिगत उपायों के माध्यम से शुल्क जैसे बाहरी झटकों के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
- जहाँ भारत अपने निवेश चक्र का निरंतर विस्तार कर रहा है, वहीं चीन में वर्ष 2025 की पहली तीन तिमाहियों के दौरान अचल संपत्ति क्षेत्र में जारी कमजोरी के कारण स्थायी परिसंपत्ति निवेश गिरावट देखी गई है।
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यूएन डेसा के बारे में:
संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक मामलों का विभाग (यूएन डेसा) संयुक्त राष्ट्र सचिवालय का एक प्रमुख अंग है, जो संयुक्त राष्ट्र के विकास स्तंभ को आगे बढ़ाने का कार्य करता है। इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में है। यह सतत विकास लक्ष्यों का संस्थागत केंद्र है और वैश्विक नीतिगत ढाँचों तथा राष्ट्रीय स्तर पर उनके क्रियान्वयन के बीच सेतु की भूमिका निभाता है।
स्थापना:
• स्थापना वर्ष 1948
• सतत विकास पर बेहतर समन्वय के लिए 1997 में वर्तमान स्वरूप में पुनर्गठित
मुख्य कार्य:
यूएन डेसा का कार्य मुख्य रूप से तीन व्यापक क्षेत्रों में फैला है:
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- विश्लेषण और विचार नेतृत्व
- संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक थिंक टैंक के रूप में कार्य
- सदस्य देशों के लिए आँकड़े, अनुमान और नीतिगत विकल्प उपलब्ध कराना
- संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक थिंक टैंक के रूप में कार्य
- अंतर-सरकारी सहयोग:
- निम्न संस्थाओं को सचिवालयीय सहयोग प्रदान करना:
- संयुक्त राष्ट्र महासभा
- आर्थिक और सामाजिक परिषद
- उच्च स्तरीय राजनीतिक मंच
- संयुक्त राष्ट्र महासभा
- निम्न संस्थाओं को सचिवालयीय सहयोग प्रदान करना:
- क्षमता निर्माण:
- देशों को 2030 सतत विकास एजेंडा के क्रियान्वयन में तकनीकी सहायता प्रदान करना
- देशों को 2030 सतत विकास एजेंडा के क्रियान्वयन में तकनीकी सहायता प्रदान करना
- विश्लेषण और विचार नेतृत्व
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निष्कर्ष:
यूएन डेसा का यह आकलन भारत की आर्थिक बुनियादों में निहित मज़बूती और लचीलेपन पर मज़बूत विश्वास व्यक्त करता है। मज़बूत घरेलू माँग, सतत सार्वजनिक निवेश तथा सहायक नीतिगत उपायों के परिणामस्वरूप, वैश्विक व्यापार तनावों के बावजूद भारत की विकास संभावनाएँ स्थिर और सशक्त बनी हुई हैं। यह दृष्टिकोण धीमी गति से बढ़ती वैश्विक अर्थव्यवस्था के परिदृश्य में भारत को वैश्विक आर्थिक वृद्धि के एक प्रमुख प्रेरक के रूप में स्थापित करता है।

