संदर्भ:
हाल ही में, यूनाइटेड किंगडम (UK) ने भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना को अपने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के तहत एक योग्य कार्बन-प्राइसिंग तंत्र के रूप में मान्यता दी है। इस कदम से भारतीय निर्यातों पर प्रभावी CBAM देयता कम हो सकती है, क्योंकि भारत में पहले से चुकाई गई कार्बन कीमत का समायोजन प्राप्त किया जा सकेगा।
कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) क्या है?
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- भारत की CCTS एक घरेलू कार्बन-बाज़ार व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना तथा कार्बन उत्सर्जन को आर्थिक मूल्य प्रदान करना है। इसे ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (Energy Conservation Act, 2001) में संशोधन के माध्यम से सक्षम किया गया और विद्युत मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया।
- यह योजना मुख्य रूप से उत्सर्जन-तीव्रता (Emissions Intensity) के दृष्टिकोण पर आधारित है। जो संस्थाएँ निर्धारित उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्यों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, वे कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र अर्जित कर सकती हैं, जबकि निर्धारित लक्ष्यों को पूरा न करने वाली संस्थाओं को क्रेडिट खरीदने की आवश्यकता पड़ सकती है।
- भारत की CCTS एक घरेलू कार्बन-बाज़ार व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना तथा कार्बन उत्सर्जन को आर्थिक मूल्य प्रदान करना है। इसे ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (Energy Conservation Act, 2001) में संशोधन के माध्यम से सक्षम किया गया और विद्युत मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया।
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कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म क्या है?
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- कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) कुछ कार्बन-गहन आयातित वस्तुओं पर कार्बन से संबंधित लागत लागू करता है। इसका प्रमुख उद्देश्य कार्बन लीकेज (Carbon Leakage) को रोकना है। कार्बन लीकेज उस स्थिति को कहा जाता है जब उद्योग कमजोर जलवायु नियमों वाले देशों में अपना उत्पादन स्थानांतरित कर देते हैं।
- UK की योजना 2027 से CBAM लागू करने की है। इसके दायरे में लौह एवं इस्पात, एल्युमीनियम, उर्वरक, सीमेंट, सिरेमिक, काँच और हाइड्रोजन जैसे कार्बन-गहन उत्पाद शामिल होंगे।
- कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) कुछ कार्बन-गहन आयातित वस्तुओं पर कार्बन से संबंधित लागत लागू करता है। इसका प्रमुख उद्देश्य कार्बन लीकेज (Carbon Leakage) को रोकना है। कार्बन लीकेज उस स्थिति को कहा जाता है जब उद्योग कमजोर जलवायु नियमों वाले देशों में अपना उत्पादन स्थानांतरित कर देते हैं।
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भारत के लिए महत्व:
UK द्वारा भारत की CCTS को मान्यता देना भारतीय निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पात्र भारतीय वस्तुओं के UK आयातक भारत की CCTS के तहत पहले से चुकाई गई योग्य कार्बन कीमत के अनुरूप कार्बन-प्राइस राहत का दावा कर सकते हैं।
इससे:
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- भारतीय निर्यातों पर प्रभावी कार्बन लागत कम हो सकती है।
- कार्बन-गहन भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार हो सकता है।
- दोहरी कार्बन कराधान (Double Carbon Taxation) को रोकने में मदद मिल सकती है।
- भारत की उभरती हुई कार्बन-बाज़ार व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल सकती है।
- जलवायु नीति और कार्बन बाज़ारों के क्षेत्र में भारत-UK सहयोग मजबूत हो सकता है।
- भारतीय निर्यातों पर प्रभावी कार्बन लागत कम हो सकती है।
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हालाँकि, राहत की वास्तविक मात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित वस्तुओं पर वास्तव में कितनी प्रभावी कार्बन कीमत वहन की गई है तथा UK की आवश्यकताओं के अनुसार प्रमाण और सत्यापन उपलब्ध कराया गया है या नहीं।
आगे की राह:
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- भारत को CCTS तथा उसकी निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। साथ ही, औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी) को तेज करने और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
- भारत को विश्वसनीय कार्बन-प्राइसिंग तंत्रों की आपसी के लिए भी प्रयास करना चाहिए, प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ रचनात्मक संवाद जारी रखना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जलवायु-संबंधी व्यापार उपाय WTO के सिद्धांतों के अनुरूप रहें।
- भारत को CCTS तथा उसकी निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। साथ ही, औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी) को तेज करने और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
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निष्कर्ष:
UK द्वारा CCTS की मान्यता से भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और डीकार्बोनाइजेशन को बढ़ावा मिलेगा। भारत को इस अवसर का उपयोग विश्वसनीय व पारदर्शी कार्बन बाज़ार विकसित करने तथा जलवायु उपायों को व्यापार बाधा बनने से रोकने के लिए करना चाहिए।

