संदर्भ:
हाल ही में टाइफून डॉल्फिन (Typhoon Dolphin) 9 अगस्त 2026 को चीन के पूर्वी तट पर पहुंचा। यह 2026 में चीन में स्थल-प्रवेश करने वाला सबसे शक्तिशाली उष्णकटिबंधीय चक्रवात था। इसके कारण अत्यधिक भारी वर्षा, तेज़ हवाएँ, बाढ़ और परिवहन व्यवस्था में व्यापक व्यवधान उत्पन्न हुआ। 10 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया।
टाइफून क्या है?
-
-
- टाइफून पश्चिमी उत्तर प्रशांत महासागर में विकसित होने वाला एक परिपक्व उष्णकटिबंधीय चक्रवात है, जिसमें अधिकतम निरंतर पवन गति कम-से-कम 74 मील प्रति घंटा (119 किमी प्रति घंटा) या उससे अधिक होती है।
- यह एक विशाल, घूर्णनशील तूफानी तंत्र होता है, जिसमें निम्न वायुदाब, तेज़ हवाएँ और शक्तिशाली गर्जन-तूफान पाए जाते हैं।
- टाइफून मुख्यतः गर्म समुद्री जल, वायुमंडलीय नमी और कोरिऑलिस बल से ऊर्जा प्राप्त करते हैं।
- एक परिपक्व टाइफून की विशिष्ट संरचना में एक अपेक्षाकृत शांत केंद्रीय भाग होता है, जिसे ‘नेत्र’ (Eye) कहा जाता है। इसके चारों ओर ‘नेत्र-दीवार’ (Eyewall) होती है, जहाँ सबसे तेज़ हवाएँ और सबसे अधिक वर्षा होती है।
- टाइफून पश्चिमी उत्तर प्रशांत महासागर में विकसित होने वाला एक परिपक्व उष्णकटिबंधीय चक्रवात है, जिसमें अधिकतम निरंतर पवन गति कम-से-कम 74 मील प्रति घंटा (119 किमी प्रति घंटा) या उससे अधिक होती है।
-
टाइफून और अन्य उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के नाम:
उष्णकटिबंधीय चक्रवात मूलतः एक ही प्रकार की वायुमंडलीय घटना के क्षेत्रीय रूप हैं। अलग-अलग महासागरीय क्षेत्रों में इनके नाम अलग-अलग होते हैं।
|
क्षेत्र |
क्षेत्रीय नाम |
|
उत्तर-पश्चिमी प्रशांत महासागर एवं दक्षिण चीन सागर |
टाइफून |
|
हिंद महासागर एवं दक्षिणी प्रशांत महासागर |
चक्रवात |
|
उत्तरी अटलांटिक एवं उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर |
हरिकेन |
|
पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया |
विली-विली |
अर्थात् टाइफून, हरिकेन और चक्रवात मूलतः एक ही प्रकार के उष्णकटिबंधीय चक्रवात हैं लेकिन उनके क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग नाम प्रचलित हैं।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अंतर्गत क्षेत्रीय मौसम विज्ञान संस्थाएँ उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के नामकरण की व्यवस्था संचालित करती हैं।
अनुकूल परिस्थितियाँ:
टाइफून एक प्रकार के ऊष्मा इंजन की तरह कार्य करते हैं। वे गर्म समुद्री जल से ऊर्जा प्राप्त करते हैं तथा जलवाष्प के संघनन से मुक्त होने वाली गुप्त ऊष्मा के माध्यम से अपनी शक्ति बनाए रखते हैं। इनके निर्माण के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक होती हैं:
-
-
- गर्म समुद्री सतह: सामान्यतः समुद्र की सतह का तापमान लगभग 26.5–27°C से अधिक होना चाहिए तथा समुद्र में पर्याप्त ऊष्मा-सामग्री उपलब्ध होनी चाहिए।
- कोरिऑलिस बल: यह चक्रवात को घूर्णन प्रदान करता है। इसी कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात सामान्यतः भूमध्य रेखा के लगभग 5° के भीतर नहीं बनते।
- कम ऊर्ध्वाधर पवन-कतरन: इससे तूफान की संरचना बाधित होने से बचती है।
- पूर्व-विद्यमान निम्न-दाबीय विक्षोभ: यह प्रारंभिक परिसंचरण उपलब्ध कराता है।
- ऊपरी वायुमंडल में अपसरण: यह ऊपरी स्तरों से वायु को बाहर निकालता है और सतह पर बने निम्न-दाब तंत्र को बनाए रखने में सहायता करता है।
- गर्म समुद्री सतह: सामान्यतः समुद्र की सतह का तापमान लगभग 26.5–27°C से अधिक होना चाहिए तथा समुद्र में पर्याप्त ऊष्मा-सामग्री उपलब्ध होनी चाहिए।
-
टाइफून की संरचना:
एक परिपक्व टाइफून के तीन प्रमुख घटक होते हैं:
-
-
- नेत्र (Eye): यह चक्रवात का अपेक्षाकृत शांत केंद्रीय क्षेत्र होता है, जहाँ वायु नीचे की ओर उतरती है और वायुदाब कम होता है।
- नेत्र-दीवार (Eyewall): यह नेत्र के चारों ओर स्थित वलयाकार क्षेत्र होता है, जिसमें सबसे तेज़ हवाएँ और सबसे अधिक वर्षा होती है।
- सर्पिल वर्षा-पट्टियाँ (Spiral Rainbands): ये घुमावदार बादल-पट्टियाँ होती हैं, जो तीव्र और रुक-रुककर होने वाली वर्षा उत्पन्न करती हैं।
- नेत्र (Eye): यह चक्रवात का अपेक्षाकृत शांत केंद्रीय क्षेत्र होता है, जहाँ वायु नीचे की ओर उतरती है और वायुदाब कम होता है।
-
भारत और मानसून के लिए प्रासंगिकता:
-
-
- टाइफून भारत के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पश्चिमी प्रशांत महासागर में विकसित होने वाले शक्तिशाली उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्षेत्रीय वायुमंडलीय परिसंचरण और नमी के परिवहन को प्रभावित कर सकते हैं।
- इनका प्रभाव:
- दक्षिण चीन सागर,
- दक्षिण-पूर्व एशिया,
- बंगाल की खाड़ी,
- तथा भारतीय मानसून प्रणाली
- तक अप्रत्यक्ष रूप से पहुँच सकता है।
- दक्षिण चीन सागर,
- कुछ परिस्थितियों में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के अवशेष दक्षिण-पूर्व एशिया को पार करते हुए बंगाल की खाड़ी तक नमी पहुँचा सकते हैं। इससे भारत में मानसूनी वर्षा के वितरण और तीव्रता पर प्रभाव पड़ सकता है।
- हालाँकि, ऐसा प्रभाव वायुमंडलीय परिसंचरण, समुद्री तापमान और अन्य मौसमीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
- टाइफून भारत के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पश्चिमी प्रशांत महासागर में विकसित होने वाले शक्तिशाली उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्षेत्रीय वायुमंडलीय परिसंचरण और नमी के परिवहन को प्रभावित कर सकते हैं।
-
जलवायु परिवर्तन से संबंध:
-
-
- गर्म होते महासागर और वायुमंडल में बढ़ती नमी चरम वर्षा की तीव्रता को बढ़ा सकती है। गर्म समुद्री जल उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के लिए अधिक ऊर्जा और नमी उपलब्ध करा सकता है। हालाँकि, किसी एक चक्रवात को सीधे और पूरी तरह जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं माना जा सकता।
- टाइफून डॉल्फिन जैसी घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि भविष्य में समाज को केवल चक्रवात के खतरे से नहीं, बल्कि अत्यधिक वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और परिवहन व्यवधान जैसे परस्पर जुड़े बहु-आपदा जोखिमों से भी निपटने के लिए तैयार रहना होगा।
- गर्म होते महासागर और वायुमंडल में बढ़ती नमी चरम वर्षा की तीव्रता को बढ़ा सकती है। गर्म समुद्री जल उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के लिए अधिक ऊर्जा और नमी उपलब्ध करा सकता है। हालाँकि, किसी एक चक्रवात को सीधे और पूरी तरह जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं माना जा सकता।
-
निष्कर्ष:
टाइफून डॉल्फिन यह दर्शाता है कि एक उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्रमिक एवं परस्पर जुड़े हुए अनेक खतरे उत्पन्न कर सकता है-जैसे तेज़ हवाएँ, अत्यधिक वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और परिवहन व्यवस्था में व्यवधान। भारत के लिए यह घटना समेकित बहु-आपदा प्रबंधन, जलवायु-सहनीय शहरी नियोजन और प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

