संदर्भ:
हाल ही में लोकसभा ने अधिकरण सुधार विधेयक, 2026 पारित किया। इस विधेयक में अधिकरणों में नियुक्तियों, प्रशासन और कार्य-प्रदर्शन की निगरानी के लिए राष्ट्रीय अधिकरण आयोग (एनटीसी) के गठन का प्रस्ताव किया गया है। यह विधेयक अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 को निरस्त करने का प्रयास करता है।
प्रमुख प्रावधान:
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- इस विधेयक के अंतर्गत पाँच सदस्यों वाला राष्ट्रीय अधिकरण आयोग गठित किया जाएगा, जिसमें एक अध्यक्ष, दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य होंगे। अध्यक्ष के पद पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अथवा किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की जाएगी।
- आयोग अधिकरणों के सदस्यों के चयन और नियुक्ति की देखरेख करेगा, उनके कार्य-प्रदर्शन की समीक्षा करेगा, शिकायतों की निगरानी करेगा तथा राष्ट्रीय अधिकरण आँकड़ा ग्रिड का रखरखाव करेगा।
- विधेयक में अधिकरण के सदस्यों के लिए पाँच वर्ष का कार्यकाल अथवा 70 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, का प्रावधान किया गया है। साथ ही, अधिकरण सदस्यों की योग्यताओं, वेतन, भत्तों, त्यागपत्र और पद से हटाने से संबंधित नियमों में एकरूपता लाने का प्रयास किया गया है।
- इस विधेयक के अंतर्गत पाँच सदस्यों वाला राष्ट्रीय अधिकरण आयोग गठित किया जाएगा, जिसमें एक अध्यक्ष, दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य होंगे। अध्यक्ष के पद पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अथवा किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की जाएगी।
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अधिकरणों के बारे में:
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- अधिकरण विशेष न्यायिक या अर्ध-न्यायिक संस्थाएँ हैं, जो विशिष्ट प्रकार के विवादों का शीघ्र और विशेषज्ञतापूर्ण निपटारा करती हैं। इन्हें सामान्य न्यायालयों का बोझ कम करने और विशेष मामलों में प्रभावी न्याय देने के लिए स्थापित किया जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 323-क और 323-ख में अधिकरणों का प्रावधान है। उदाहरण के लिए, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) आदि।
- इनकी स्थापना विशेष प्रकार के विवादों का निपटारा करने और नियमित न्यायालयों के कार्यभार को कम करने के लिए की जाती है। हालांकि, इनके निर्णय सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन रहते हैं, जो संविधान की मूल संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- अधिकरण विशेष न्यायिक या अर्ध-न्यायिक संस्थाएँ हैं, जो विशिष्ट प्रकार के विवादों का शीघ्र और विशेषज्ञतापूर्ण निपटारा करती हैं। इन्हें सामान्य न्यायालयों का बोझ कम करने और विशेष मामलों में प्रभावी न्याय देने के लिए स्थापित किया जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 323-क और 323-ख में अधिकरणों का प्रावधान है। उदाहरण के लिए, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) आदि।
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प्रमुख निर्णय:
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- एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय तथा अनुच्छेद 226 और 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों द्वारा न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। अधिकरण संवैधानिक न्यायालयों के कार्य में सहायता कर सकते हैं, लेकिन उनका स्थान नहीं ले सकते।
- भारत संघ बनाम आर. गांधी (2010) तथा रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक (2019) मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकरणों में नियुक्तियों के संबंध में स्वतंत्रता, पर्याप्त कार्यकाल और न्यायिक प्रधानता की आवश्यकता पर बल दिया।
- मद्रास बार एसोसिएशन से संबंधित मामलों ने इन सिद्धांतों को और मजबूत किया। सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकरणों में नियुक्तियों, कार्यकाल और सेवा-शर्तों से संबंधित उन प्रावधानों को निरस्त किया जो शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थे। वर्ष 2025 के निर्णय में भी एक स्वतंत्र राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की आवश्यकता पर बल दिया गया।
- एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय तथा अनुच्छेद 226 और 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों द्वारा न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। अधिकरण संवैधानिक न्यायालयों के कार्य में सहायता कर सकते हैं, लेकिन उनका स्थान नहीं ले सकते।
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विधेयक का महत्व:
प्रस्तावित राष्ट्रीय अधिकरण आयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है:
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- नियुक्तियों में एकरूपता और पारदर्शिता लाना;
- कार्यपालिका के प्रभाव को कम करना;
- अधिकरणों में रिक्तियों और प्रशासनिक विखंडन की समस्या का समाधान करना;
- कार्य-प्रदर्शन की निगरानी में सुधार करना;
- विशिष्ट विषयों से संबंधित तथा त्वरित न्याय-निर्णयन को मजबूत करना;
- आँकड़ों पर आधारित निगरानी के माध्यम से जवाबदेही में वृद्धि करना।
- नियुक्तियों में एकरूपता और पारदर्शिता लाना;
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निष्कर्ष:
अधिकरण सुधार विधेयक, 2026 भारत की अधिकरण व्यवस्था को सुव्यवस्थित और तर्कसंगत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इसकी संवैधानिक वैधता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि राष्ट्रीय अधिकरण आयोग न्यायिक स्वतंत्रता, शक्तियों के पृथक्करण और न्याय तक पहुँच को मजबूत करता है या केवल प्रशासनिक नियंत्रण को केंद्रीकृत करने का माध्यम बनकर रह जाता है।

