सन्दर्भ:
हाल ही में तेलंगाना सरकार ने 'तेलंगाना गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स (पंजीकरण और कल्याण) विधेयक, 2026' पेश किया है। राजस्थान के बाद ऐसा कानून लाने वाला तेलंगाना देश का दूसरा राज्य है। यह विधेयक तेजी से बढ़ती 'गिग इकोनॉमी' में श्रमिकों के अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
विधेयक के मुख्य प्रावधान:
'तेलंगाना गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स (पंजीकरण और कल्याण) विधेयक, 2026' में श्रमिकों की सुरक्षा और एग्रीगेटर्स की जवाबदेही तय करने के लिए कई विस्तृत प्रावधान किए गए हैं:
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- पंजीकरण और पहचान:
- अनिवार्य पंजीकरण: सभी गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए राज्य सरकार के साथ पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
- यूनिट आईडी: पंजीकरण के बाद प्रत्येक श्रमिक को एक यूनिक आईडी दी जाएगी, जो सभी प्लेटफॉर्म्स पर मान्य होगी और इसके जरिए वे सीधे सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे।
- एग्रीगेटर का दायित्व: एग्रीगेटर्स को कानून लागू होने के 60 दिनों के भीतर अपने मौजूदा श्रमिकों का डेटाबेस बोर्ड को सौंपना होगा।
- अनिवार्य पंजीकरण: सभी गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए राज्य सरकार के साथ पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
- सामाजिक सुरक्षा और कल्याण कोष:
- कल्याण शुल्क: एग्रीगेटर्स को प्रत्येक ट्रांजैक्शन (भुगतान) पर 1% से 2% के बीच शुल्क देना होगा।
- कोष का उपयोग: इस राशि का उपयोग श्रमिकों के लिए दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य लाभ, पेंशन, विवाह सहायता और मातृत्व लाभ जैसे कल्याणकारी कार्यों में किया जाएगा।
- फंडिंग के अन्य स्रोत: इस कोष में सरकारी अनुदान, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड और दान भी शामिल किए जा सकते हैं।
- कल्याण शुल्क: एग्रीगेटर्स को प्रत्येक ट्रांजैक्शन (भुगतान) पर 1% से 2% के बीच शुल्क देना होगा।
- कार्य शर्तें और पारदर्शिता:
- एल्गोरिदम पारदर्शिता: कंपनियों को यह स्पष्ट करना होगा कि उनका ऑटोमेटेड सिस्टम काम का आवंटन, रेटिंग और भुगतान कैसे तय करता है।
- अनुचित निष्कासन पर रोक: किसी भी श्रमिक को बिना उचित कारण और 7 दिनों के नोटिस के काम से नहीं हटाया जा सकता।
- सुरक्षित कार्य वातावरण: एग्रीगेटर्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्यस्थल सुरक्षित हो और किसी भी प्रकार का भेदभाव (जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर) न हो।
- एल्गोरिदम पारदर्शिता: कंपनियों को यह स्पष्ट करना होगा कि उनका ऑटोमेटेड सिस्टम काम का आवंटन, रेटिंग और भुगतान कैसे तय करता है।
- शिकायत निवारण तंत्र:
- आंतरिक समिति: जिन प्लेटफॉर्म्स पर 100 से अधिक श्रमिक हैं, उन्हें एक आंतरिक विवाद समाधान समिति बनानी होगी।
- त्रि-स्तरीय प्रणाली: जिला स्तर पर शिकायत अधिकारी से लेकर राज्य स्तर पर अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) तक की व्यवस्था की गई है।
- आंतरिक समिति: जिन प्लेटफॉर्म्स पर 100 से अधिक श्रमिक हैं, उन्हें एक आंतरिक विवाद समाधान समिति बनानी होगी।
- उल्लंघन पर दंड:
- वित्तीय जुर्माना: नियमों के उल्लंघन पर ₹50,000 से ₹2 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- कठोर प्रावधान: कल्याण शुल्क न चुकाने पर 1 वर्ष तक की कैद या जुर्माना, अथवा दोनों का प्रावधान है।
- वित्तीय जुर्माना: नियमों के उल्लंघन पर ₹50,000 से ₹2 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- पंजीकरण और पहचान:
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चुनौतियाँ:
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- नौकरी की असुरक्षा: गिग वर्कर्स के पास कोई स्थायी अनुबंध (Contract) नहीं होता। कंपनियों के पास 'हायर एंड फायर' की शक्ति होती है, जिससे उन्हें कभी भी बिना किसी पूर्व सूचना के प्लेटफॉर्म से हटाया जा सकता है।
- सामाजिक सुरक्षा का अभाव: इन्हें 'कर्मचारी' के बजाय 'स्वतंत्र ठेकेदार' माना जाता है। इस कारण इन्हें पीएफ (PF), पेंशन, ग्रेच्युटी, सवैतनिक अवकाश (Paid Leaves) और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं।
- आय की अनिश्चितता: इनकी कमाई पूरी तरह से ऑर्डर या टास्क की संख्या पर निर्भर करती है। ईंधन की बढ़ती कीमतों और कंपनियों द्वारा घटाए जा रहे कमीशन के कारण इनकी वास्तविक आय कम होती जा रही है।
- एल्गोरिदम का नियंत्रण: काम का आवंटन और रेटिंग पूरी तरह से 'अदृश्य' एल्गोरिदम द्वारा तय होती है। कम रेटिंग मिलने पर या कुछ समय लॉग-इन न रहने पर आईडी ब्लॉक होने का डर बना रहता है।
- कानूनी पहचान की कमी: वर्तमान श्रम कानूनों में गिग वर्कर्स की परिभाषा स्पष्ट नहीं है, जिससे वे अपनी शिकायतों के लिए लेबर कोर्ट या अन्य कानूनी मंचों का लाभ नहीं उठा पाते।
- नौकरी की असुरक्षा: गिग वर्कर्स के पास कोई स्थायी अनुबंध (Contract) नहीं होता। कंपनियों के पास 'हायर एंड फायर' की शक्ति होती है, जिससे उन्हें कभी भी बिना किसी पूर्व सूचना के प्लेटफॉर्म से हटाया जा सकता है।
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निष्कर्ष:
तेलंगाना का यह विधेयक गिग श्रमिकों के लिए 'सम्मानजनक कार्य' सुनिश्चित करने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। हालांकि, इसका प्रभावी कार्यान्वयन इस बात पर निर्भर करेगा कि कल्याण बोर्ड कितनी स्वायत्तता से काम करता है और एग्रीगेटर्स इस कानून का कितनी पारदर्शिता से पालन करते हैं। अन्य राज्यों के लिए भी यह एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे भारत की विशाल गिग वर्कफोर्स को शोषण से बचाया जा सके।

