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Blog / 06 Apr 2026

टार बॉल्स प्रबंधन (मसौदा) नियम, 2026: भारत का नया तटीय प्रदूषण ढाँचा

टार बॉल्स प्रबंधन (मसौदा) नियम, 2026: भारत का नया तटीय प्रदूषण ढाँचा

सन्दर्भ:

हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने 'टार बॉल्स प्रबंधन (मसौदा) नियम, 2026' (Draft Tar Balls Management Rules, 2026) जारी किए हैं। यह भारत के विशाल समुद्र तट को तेल रिसाव और 'टार बॉल्स' (Tar Balls) के बढ़ते खतरों से बचाने के लिए बनाया गया पहला समर्पित राष्ट्रीय ढांचा है।

'टार बॉल्स' के बारे में:

      • टार बॉल्स कच्चे तेल (Crude Oil) के चिपचिपे, गहरे रंग के छोटे-छोटे गोले होते हैं, जो समुद्र के पानी में तेल के अपक्षय’ (Weathering) की प्रक्रिया के कारण बनते हैं। जब समुद्र में तेल का रिसाव होता है, तो लहरों और हवा के प्रभाव से तेल के हल्के घटक वाष्पित हो जाते हैं, जबकि भारी हाइड्रोकार्बन, रेत और समुद्री मलबे के साथ मिलकर ठोस, सख्त गेंदों का रूप ले लेते हैं।
      • इनके प्रमुख स्रोतों में तेल रिसाव (Oil Spills), समुद्र के नीचे प्राकृतिक रिसाव, जहाजों द्वारा अवैध कचरा निष्कासन तथा तेल पाइपलाइनों का टूटना शामिल है। भारत के पश्चिमी तट, विशेषकर गुजरात से गोवा तक, पर ये मुख्य रूप से अप्रैल से सितंबर के बीच, विशेषकर मानसून के दौरान, बड़ी मात्रा में तटों पर आकर जमा हो जाते हैं।

Tar Balls Management Rules 2026

नियमों के मुख्य प्रावधान:

नया मसौदा प्रदूषण फैलाने वालों की जवाबदेही तय करने और एक एकीकृत प्रबंधन प्रणाली बनाने पर जोर देता है:

      • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle): यदि किसी तेल सुविधा या जहाज की लापरवाही से रिसाव होता है, तो पर्यावरण मुआवजे की पूरी जिम्मेदारी मालिक की होगी।
      • राष्ट्रीय आपदा समन्वय: भारतीय तटरक्षक बल (ICG) 'राष्ट्रीय तेल रिसाव आपदा आकस्मिक योजना' (NOSDCP) के कार्यान्वयन और निगरानी के लिए जिम्मेदार होगा।
      • राज्य और जिला स्तर की भूमिका: राज्य सरकारों को टार बॉल प्रदूषण को 'राज्य आपदा' घोषित करना होगा। जिला प्रशासन तटों से इनकी सफाई और परिवहन का जिम्मा संभालेगा।
      • औद्योगिक उपयोग: नियमों के अनुसार, जिन टार बॉल्स का कैलोरी मान (Calorific Value) 1,500 kcal से अधिक है, उनका उपयोग सीमेंट उद्योग में ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
      • तकनीकी निगरानी: तेल के प्लूम (Plumes) का पता लगाने के लिए 'ऑटोमेटेड अंडरवाटर व्हीकल्स' (AUVs) जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाएगा।

पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभाव:

      • टार बॉल्स समुद्री पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं। ये समुद्री जीवों के लिए घातक होते हैं, क्योंकि कछुए और मछलियां इन्हें भोजन समझकर निगल लेते हैं, जिससे उनकी मृत्यु हो सकती है। साथ ही, ये मैंग्रोव और कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) के छिद्रों को बंद कर उनकी संरचना और जीवन-प्रणाली को नष्ट कर देते हैं।
      • आर्थिक दृष्टि से भी इनका प्रभाव अत्यंत नकारात्मक है, विशेषकर भारत के तटीय राज्यों जैसे गोवा और महाराष्ट्र में, जहां पर्यटन उद्योग प्रभावित होता है। रिपोर्टों के अनुसार, केवल मुंबई को ही प्रतिवर्ष लगभग ₹50 करोड़ का आर्थिक नुकसान होता है। इसके अतिरिक्त, टार बॉल्स में मौजूद पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs)’ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं और कैंसरकारी (carcinogenic) प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं।

वैधानिक ढांचा:

      • भारत में समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न कानूनी प्रावधान लागू किए गए हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 प्रदूषण नियंत्रण के लिए व्यापक शक्तियां प्रदान करता है और सरकार को आवश्यक कदम उठाने का अधिकार देता है। इसके अतिरिक्त, तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण हेतु नियम निर्धारित करती है, जिससे अनियंत्रित विकास को रोका जा सके।
      • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत समुद्र का कानून (UNCLOS) का हस्ताक्षरकर्ता है, जो समुद्री पर्यावरण की रक्षा और संसाधनों के सतत उपयोग के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है।

निष्कर्ष:

भारत का 11,098.81 किलोमीटर लंबा समुद्र तट न केवल जैव विविधता बल्कि लाखों लोगों की आजीविका का केंद्र है। टार बॉल्स नियम, 2026 एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसकी सफलता 'प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों' और 'तटरक्षक बल' के बीच बेहतर समन्वय और उपग्रह आधारित निगरानी प्रणालियों के मजबूत होने पर निर्भर करेगी।