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Blog / 05 Jun 2026

भारत का 100वाँ रामसर स्थल बना सूरहा ताल

संदर्भ:

विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2026) के अवसर पर उत्तर प्रदेश के बलिया जिले स्थित जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार (सूरहा ताल) को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि (Wetland of International Importance) के रूप में रामसर सूची में शामिल किया गया है। इसके साथ ही भारत में रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर 100 (विश्व का 2595वां रामसर स्थल) हो गई है। यह उपलब्धि भारत की आर्द्रभूमि संरक्षण नीति तथा जैव विविधता संरक्षण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार (सूरहा ताल) के बारे में:

    • जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार (सूरहा ताल) उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित एक प्राकृतिक ऑक्सबो झील (Oxbow Lake) है। यह गंगा नदी के मैदानी क्षेत्र में स्थित है तथा लगभग 34.32 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। यह वर्षा-आधारित झील है, जो कथर नालानामक जलमार्ग के माध्यम से गंगा नदी से जुड़ी हुई है। मानसून के दौरान इसका विस्तार काफी बढ़ जाता है तथा कभी-कभी गंगा और सरयू में बाढ़ आने पर जल का प्रवाह उल्टी दिशा में होकर झील में प्रवेश करता है।
    • सूरहा ताल एक प्राकृतिक बारहमासी घुमावदार झील (जिसे मिएंडर झील भी कहा जाता है) है, जो मध्य एशियाई फ्लाईवे के साथ यात्रा करने वाली पक्षी प्रजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण शीतकालीन आश्रय स्थल के रूप में कार्य करती है।
    • इसे वर्ष 1991 में पक्षी विहार घोषित किया गया था। इसके अतिरिक्त यह क्षेत्र अनेक प्रकार की मछलियों, जलीय वनस्पतियों तथा अन्य आर्द्रभूमि-आश्रित जीवों का भी महत्वपूर्ण निवास स्थान है। यह आर्द्रभूमि स्थानीय समुदायों की आजीविका, मत्स्य पालन तथा जल संसाधनों की उपलब्धता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
    • यहाँ 221 पौधों की प्रजातियाँ, 66 मछली प्रजातियाँ, सात सरीसृप प्रजातियाँ और तीन उभयचर प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिसमें मछलियों में संकटग्रस्त वॉलैगो अट्टू और बैगेरियस बैगेरियस और विविध जलपक्षी प्रजातियों में संकटग्रस्त कॉमन पोचार्ड (अयथ्या फेरिना) और इंडियन रिवर टर्न (स्टर्ना ऑरेंटिया) शामिल हैं।

Surha Taal Becomes India's 100th Ramsar Site

आर्द्रभूमि के विषय में:

    • आर्द्रभूमि, ऐसी दलदली या जलमग्न क्षेत्र होता है जहाँ मिट्टी पूरे वर्ष या साल के कुछ महीनों में पूरी तरह से पानी से संतृप्त (saturated) रहती है
    • आर्द्रभूमि पृथ्वी की भूमि सतह का केवल लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा है, फिर भी यह सभी पौधों और जानवरों की प्रजातियों में से लगभग 40 प्रतिशत के लिए आवास और प्रजनन स्थल प्रदान करती है।
    • वे तटीय क्षेत्रों में रहने वाली वैश्विक आबादी के लगभग 60 प्रतिशत लोगों को तूफानों, चक्रवातों और सुनामी के प्रभाव को कम करके प्राकृतिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं।
    • आद्रभूमि प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करते हैं, अतिरिक्त वर्षा के पानी को अवशोषित करते हैं, जिससे बाढ़ का खतरा कम हो जाता है।
    • प्रभावी कार्बन सिंक के रूप में, आर्द्रभूमि मिट्टी और बायोमास दोनों में कार्बन संग्रहित करती हैं।
    • प्रदूषकों को छानने, पानी को शुद्ध करने और पानी की गुणवत्ता बनाए रखने की क्षमता के कारण इन्हें अक्सर 'परिदृश्य के गुर्दे' कहा जाता है।

रामसर स्थल क्या हैं?

    • रामसर स्थल वे आर्द्रभूमियाँ हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पारिस्थितिक, जैविक, जलवैज्ञानिक और सामाजिक महत्व के कारण रामसर सम्मेलन के अंतर्गत मान्यता प्रदान की जाती है। रामसर सम्मेलन 1971 में ईरान के रामसर नगर में अपनाई गई एक अंतर-सरकारी संधि है, जिसका उद्देश्य आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना है। भारत 1982 में इस सम्मेलन का सदस्य बना था।
    • वैश्विक स्तर पर, 1971 के रामसर कन्वेंशन के तहत लगभग 2,595 ऐसे नामित आर्द्रभूमि क्षेत्र हैं। एशिया में भारत में ऐसे आर्द्रभूमि क्षेत्रों की संख्या सबसे अधिक है और ब्रिटेन (176) और मैक्सिको (144) के बाद विश्व में तीसरे स्थान पर है।

प्रमुख चुनौतियाँ:

    • अतिक्रमण और कृषि विस्तार का दबाव।
    • अत्यधिक मत्स्य दोहन।
    • जलीय खरपतवारों का प्रसार।
    • प्रदूषण तथा अपशिष्ट का बढ़ता प्रभाव।
    • जलवायु परिवर्तन के कारण जल उपलब्धता में परिवर्तन।

इन चुनौतियों का समाधान प्रभावी प्रबंधन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी तथा वैज्ञानिक संरक्षण रणनीतियों के माध्यम से ही संभव है।

निष्कर्ष:

भारत का 100वाँ रामसर स्थल घोषित होना केवल एक सांकेतिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह देश में आर्द्रभूमि संरक्षण के बढ़ते महत्व को भी दर्शाता है। भविष्य में इस मान्यता को वास्तविक संरक्षण सफलता में बदलने के लिए सतत प्रबंधन, सामुदायिक सहभागिता तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देनी होगी तभी आर्द्रभूमियाँ जैव विविधता, जल सुरक्षा और जलवायु लचीलापन सुनिश्चित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगी।

 

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