संदर्भ:
22 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 को चुनौती देने वाली याचिका तथा वंदे मातरम् के गायन से संबंधित सरकारी निर्देशों पर सुनवाई की।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ:
-
-
- न्यायालय ने संकेत दिया कि लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार राष्ट्रीय गीत के दायरे और इसकी कितनी पंक्तियाँ गाई जाएँ, यह निर्धारित कर सकती है, लेकिन वह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं कर सकती और वास्तविक अंतःकरण संबंधी आपत्ति रखने वाले व्यक्ति को एक या अधिक पदों को गाने से इनकार करने पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
- भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा।
- न्यायालय ने ऐतिहासिक बिजोए इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले का भी संदर्भ दिया। इस मामले में यहोवा के साक्षी (Jehovah's Witnesses) धर्म से संबंधित तीन स्कूली बच्चों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन राष्ट्रगान बजाए जाने के दौरान वे सम्मानपूर्वक खड़े रहे।
- सर्वोच्च न्यायालय ने उनके अधिकारों की रक्षा करते हुए अंतःकरण की स्वतंत्रता और धार्मिक विश्वास को मान्यता दी थी। वर्तमान मामला वंदे मातरम् के संदर्भ में इसी सिद्धांत की प्रासंगिकता की जांच करता है।
- न्यायालय ने संकेत दिया कि लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार राष्ट्रीय गीत के दायरे और इसकी कितनी पंक्तियाँ गाई जाएँ, यह निर्धारित कर सकती है, लेकिन वह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं कर सकती और वास्तविक अंतःकरण संबंधी आपत्ति रखने वाले व्यक्ति को एक या अधिक पदों को गाने से इनकार करने पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
-
पृष्ठभूमि:
-
-
- यह याचिका कर्नाटक संगीत के गायक और लेखक टी. एम. कृष्णा द्वारा दायर की गई है। उन्होंने 2026 के संशोधन और गृह मंत्रालय द्वारा जारी प्रशासनिक निर्देशों को चुनौती दी है।
- याचिकाकर्ता का तर्क है कि संशोधित कानून और कार्यकारी निर्देश प्रभावी रूप से सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह पदों को बजाने और सामूहिक रूप से गाने को अनिवार्य बनाते हैं।
- याचिका के अनुसार, इसका पालन न करने पर तीन वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान हो सकता है।
- यह याचिका कर्नाटक संगीत के गायक और लेखक टी. एम. कृष्णा द्वारा दायर की गई है। उन्होंने 2026 के संशोधन और गृह मंत्रालय द्वारा जारी प्रशासनिक निर्देशों को चुनौती दी है।
-
संवैधानिक मुद्दे:
-
-
- अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी विशेष भावना को व्यक्त न करने की स्वतंत्रता भी शामिल हो सकती है। इसलिए किसी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से कोई गीत गाने के लिए बाध्य करना व्यक्तिगत स्वायत्तता और बलपूर्वक अभिव्यक्ति (Compelled Expression) से जुड़े प्रश्न उठाता है।
- अनुच्छेद 25 और 26: धार्मिक स्वतंत्रता: अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों के कुछ अधिकारों की रक्षा करता है। न्यायालय ने संकेत दिया कि राष्ट्रीय प्रोटोकॉल इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों को खत्म नहीं कर सकते।
- धर्मनिरपेक्षता: याचिकाकर्ता का तर्क है कि गीत के धार्मिक भाव वाले अंशों के अनिवार्य गायन से संविधान के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर प्रभाव पड़ सकता है। हालाँकि, न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि किसी राष्ट्रीय प्रतीक में धार्मिक संदर्भ होना अपने आप में यह निर्धारित नहीं करता कि संवैधानिक व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष है या नहीं।
- अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी विशेष भावना को व्यक्त न करने की स्वतंत्रता भी शामिल हो सकती है। इसलिए किसी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से कोई गीत गाने के लिए बाध्य करना व्यक्तिगत स्वायत्तता और बलपूर्वक अभिव्यक्ति (Compelled Expression) से जुड़े प्रश्न उठाता है।
-
राष्ट्रीय गीत बनाम राष्ट्रगान:
-
-
- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है, जबकि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान है।
- अनुच्छेद 51A(a) नागरिकों के लिए संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना मौलिक कर्तव्य के रूप में स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है। इसमें राष्ट्रीय गीत का विशेष रूप से उल्लेख नहीं है।
- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है, जबकि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान है।
-
प्रमुख मुद्दा:
इस मामले में मुख्य अंतर है-
-
-
- जानबूझकर किसी राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान या उसमें व्यवधान डालना; और
- वास्तविक अंतःकरण संबंधी या धार्मिक आपत्ति के कारण शांतिपूर्वक भाग लेने से इनकार करना।
- न्यायालय ने संकेत दिया कि दूसरे प्रकार के आचरण को स्वतः आपराधिक अभियोजन का आधार नहीं बनाया जा सकता।
- जानबूझकर किसी राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान या उसमें व्यवधान डालना; और
-
महत्व:
-
-
- अंतःकरण की स्वतंत्रता की रक्षा।
- आपराधिक दंड के उपयोग की सीमाओं को रेखांकित करता है।
- संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करता है।
- मौलिक अधिकारों के संदर्भ में कार्यपालिका की कार्रवाई की जांच करता है।
- राष्ट्रीय पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संबंध को स्पष्ट करने में सहायक।
- अंतःकरण की स्वतंत्रता की रक्षा।
-
निष्कर्ष:
यह मामला दर्शाता है कि राष्ट्रीय सम्मान और संवैधानिक स्वतंत्रता आवश्यक रूप से एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की व्यवस्था भी मौलिक अधिकारों के ढाँचे के भीतर होनी चाहिए, विशेष रूप से अंतःकरण की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में।
