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Blog / 07 Oct 2026

फॉर्म 6 और एकतरफा निर्णयों को लेकर निर्वाचन आयोग पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को एक ऐसी याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना कुछ निर्णय एकतरफा रूप से लिए। याचिका में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान फॉर्म 6 से जुड़े बदलावों पर भी सवाल उठाया गया है। न्यायालय ने कहा कि यदि अभिलेखों से यह स्थापित होता है कि निर्धारित निर्णय-प्रक्रिया से बाहर जाकर निर्णय लिए गए थे, तो वह ऐसे निर्णयों को रद्द कर सकता है।

फॉर्म 6 क्या है?

      • फॉर्म 6 का उपयोग पात्र नागरिकों द्वारा मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करने हेतु किया जाता है। यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) के कानूनी ढाँचे के अंतर्गत संचालित होता है।
      • यह विवाद डिजिटल फॉर्म 6 में किए गए उन बदलावों के बाद उत्पन्न हुआ, जिनमें कथित तौर पर इस संबंध में अतिरिक्त जानकारी मांगी गई कि आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी के नाम पहले की मतदाता सूचियों में दर्ज थे या नहीं। यह विशेष रूप से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के संदर्भ में किया गया।

फॉर्म 6 और एकतरफा निर्णयों को लेकर निर्वाचन आयोग पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है?

      • SIR मतदाता सूचियों के सत्यापन और पुनरीक्षण के लिए किया जाने वाला एक गहन अभियान है। इसका उद्देश्य अपात्र, दोहरे, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान कर उन्हें हटाना तथा यह सुनिश्चित करना है कि पात्र नागरिक मतदाता सूची में बने रहें।
      • हालाँकि, अत्यधिक दस्तावेजी या प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ वास्तविक मतदाताओं के लिए बाधाएँ उत्पन्न कर सकती हैं, विशेष रूप से पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के लिए। इसलिए, मतदाता सूची के शुद्धीकरण को मतदाता समावेशन (Electoral Inclusion) के साथ संतुलित किया जाना आवश्यक है।

संवैधानिक और कानूनी पहलू:

      • यह विवाद संविधान के अनुच्छेद 324 से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है, जो निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान करता है। यह अनुच्छेद 326 से भी संबंधित है, जो वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनावों की व्यवस्था स्थापित करता है।
      • भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय है। इसकी संस्थागत वैधता सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया और वैधानिक ढाँचे के पालन पर निर्भर करती है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 में सदस्यों के बीच मतभेद होने की स्थिति में निर्धारित बहुमत प्रक्रिया के माध्यम से निर्णय लेने का प्रावधान किया गया है।
      • इसलिए, संस्थागत शक्तियों का एकतरफा प्रयोग शक्तियों के संतुलन (Checks and Balances), जवाबदेही और संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न कर सकता है।

RPA, 1950, निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 और ECI की शक्तियों के बीच संबंध:

      • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) मतदाता सूचियों से संबंधित वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है। इसकी धारा 28 के तहत केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के बाद अधिनियम को लागू करने के लिए नियम बनाती है। इसी अधिकार के तहत निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) बनाए गए थे, जिनमें फॉर्म 6 सहित विभिन्न प्रक्रियाओं और प्रपत्रों का प्रावधान किया गया है।
      • निर्वाचन आयोग अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करता है और मतदाता सूचियों से संबंधित महत्वपूर्ण कार्य करता है, लेकिन इन शक्तियों का प्रयोग संवैधानिक और वैधानिक ढाँचे के अंतर्गत ही किया जाना चाहिए। इसलिए, वर्तमान विवाद ECI की कार्यात्मक स्वायत्तता और कानूनी रूप से निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन के बीच संतुलन से संबंधित है।

निष्कर्ष:

यह विवाद निर्वाचन की शुचिता और मतदाता समावेशन के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को उजागर करता है। एक विश्वसनीय निर्वाचन प्रणाली के लिए स्वतंत्र निर्वाचन आयोग, सामूहिक संस्थागत कार्यप्रणाली, पारदर्शी प्रक्रियाएँ और गलत तरीके से मतदाताओं को बाहर किए जाने से सुरक्षा आवश्यक है। इसलिए, यह मामला विधि के शासन, संस्थागत जवाबदेही और लोकतांत्रिक वैधता के व्यापक संवैधानिक सिद्धांतों के लिए महत्वपूर्ण है।

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