संदर्भ:
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीन हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है। सिफारिश किए गए तीन न्यायाधीश हैं: न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल, गुजरात हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश; न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय, दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह, तेलंगाना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश है।
सुप्रीम कोर्ट की वर्तमान न्यायिक शक्ति:
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- वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में 38 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या के मुकाबले 34 कार्यरत न्यायाधीश हैं, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं। यदि तीनों सिफारिशों को मंजूरी मिल जाती है और संबंधित न्यायाधीश शपथ ग्रहण कर लेते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 37 हो जाएगी।
- इसलिए यह सिफारिश रिक्तियों को भरने और शीर्ष अदालत के कामकाज को मजबूत करने के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
- वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में 38 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या के मुकाबले 34 कार्यरत न्यायाधीश हैं, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं। यदि तीनों सिफारिशों को मंजूरी मिल जाती है और संबंधित न्यायाधीश शपथ ग्रहण कर लेते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 37 हो जाएगी।
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न्यायिक नियुक्तियों का संवैधानिक आधार:
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- उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की औपचारिक नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- अनुच्छेद 124(2): सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। इसके तहत राष्ट्रपति संविधान में निर्धारित परामर्श प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं।
- अनुच्छेद 217: हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। इसके तहत राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं।
- अनुच्छेद 124(2): सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। इसके तहत राष्ट्रपति संविधान में निर्धारित परामर्श प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं।
- हालाँकि, संविधान में “कॉलेजियम प्रणाली” शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है। वर्तमान कॉलेजियम व्यवस्था मुख्य रूप से न्यायिक व्याख्या के माध्यम से विकसित हुई है।
- उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की औपचारिक नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
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कॉलेजियम प्रणाली के बारे में:
कॉलेजियम प्रणाली भारत की उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए न्यायाधीशों के नेतृत्व वाली व्यवस्था है। संविधान में नियुक्ति की शक्ति राष्ट्रपति को दी गई है, लेकिन न्यायिक व्याख्याओं के माध्यम से नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका की प्रधानता (Judicial Primacy) स्थापित हुई है।
तीन जज मामलों के माध्यम से कॉलेजियम का विकास:
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- कॉलेजियम प्रणाली का विकास तीन महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों के माध्यम से हुआ:
- प्रथम जज मामला (1981): एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “परामर्श” का अर्थ अनिवार्य रूप से “सहमति” नहीं है। इससे न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका को अधिक महत्व मिला।
- द्वितीय जज मामला (1993): सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले के निर्णय को पलट दिया और नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता स्थापित की। मुख्य न्यायाधीश की राय को वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ परामर्श के माध्यम से संस्थागत महत्व दिया गया।
- तृतीय जज मामला (1998): राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम की व्यवस्था को और स्पष्ट किया। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। हाई कोर्ट के लिए सिफारिश संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से शुरू होती है।
- प्रथम जज मामला (1981): एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “परामर्श” का अर्थ अनिवार्य रूप से “सहमति” नहीं है। इससे न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका को अधिक महत्व मिला।
- कॉलेजियम व्यवस्था को बदलने के लिए 99वाँ संविधान संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) लाया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में NJAC को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया। न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) का हिस्सा माना।
- कॉलेजियम प्रणाली का विकास तीन महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों के माध्यम से हुआ:
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कॉलेजियम प्रणाली से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ:
कॉलेजियम प्रणाली को लेकर पारदर्शिता, जवाबदेही, चयन के मानदंड और न्यायपालिका में विविधता जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा होती रही है। वहीं, न्यायिक प्रधानता को न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए एक संस्थागत सुरक्षा उपाय के रूप में भी देखा जाता है।
आगे की राह:
कॉलेजियम प्रणाली में चयन के मानदंडों में अधिक पारदर्शिता, सिफारिशों के कारणों का समय पर प्रकाशन, संस्थागत जवाबदेही तथा न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है। साथ ही, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक भूमिका को बनाए रखना भी आवश्यक है।

