संदर्भ:
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल द्वारा दायर याचिका पर जवाब मांगा है। इस याचिका में दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) की व्याख्या, विशेष रूप से विलय (Merger) संबंधी अपवाद को चुनौती दी गई है।
याचिका क्यों महत्वपूर्ण है?
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- याचिका में दसवीं अनुसूची के उस प्रावधान पर सवाल उठाया गया है, जिसके अनुसार यदि किसी विधानमंडल दल (Legislature Party) के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय करने पर सहमत हो जाते हैं, तो उन्हें दल-बदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाता।
- कपिल सिब्बल का तर्क है कि यह प्रावधान अब एक कानूनी खामी (Loophole) बन गया है, जिसका उपयोग निर्वाचित प्रतिनिधि कृत्रिम (Engineered) विलय के माध्यम से जनता के चुनावी जनादेश को बदलने के लिए कर रहे हैं। उनके अनुसार, ऐसे विलय बिना जनता से नया जनादेश लिए ही बहुमत को अल्पमत या अल्पमत को बहुमत में बदल सकते हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।
- याचिका में दसवीं अनुसूची के उस प्रावधान पर सवाल उठाया गया है, जिसके अनुसार यदि किसी विधानमंडल दल (Legislature Party) के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय करने पर सहमत हो जाते हैं, तो उन्हें दल-बदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाता।
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पृष्ठभूमि:
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- यह मुद्दा 2022 में गोवा की राजनीतिक घटनाओं के बाद प्रमुखता से सामने आया, जब कांग्रेस के 10 में से 8 विधायक विलय संबंधी प्रावधान का लाभ लेकर भाजपा में शामिल हो गए।
- इसी प्रकार, 2026 में लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के शिंदे गुट की शिवसेना में विलय को मान्यता दी। दोनों मामले वर्तमान में न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं और दल-बदल विरोधी कानून की सीमा एवं व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाते हैं।
- यह मुद्दा 2022 में गोवा की राजनीतिक घटनाओं के बाद प्रमुखता से सामने आया, जब कांग्रेस के 10 में से 8 विधायक विलय संबंधी प्रावधान का लाभ लेकर भाजपा में शामिल हो गए।
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दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के बारे में:
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- 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।
- इसका उद्देश्य "आया राम, गया राम" की राजनीति पर रोक लगाना था।
- यह संसद तथा राज्य विधानमंडलों के सदस्यों पर लागू होती है।
- 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।
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किस स्थिति में सदस्य अयोग्य घोषित हो सकता है?
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- यदि वह स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ दे।
- यदि वह पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करे या मतदान से अनुपस्थित रहे तथा पूर्व अनुमति न ली हो।
- यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए।
- यदि कोई मनोनीत सदस्य अपनी सदस्यता ग्रहण करने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए।
- 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन (Split) पर मिलने वाली छूट समाप्त कर दी, लेकिन दो-तिहाई सदस्यों के विलय (Merger) वाले अपवाद को बरकरार रखा।
- यदि वह स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ दे।
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न्यायिक समीक्षा:
किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि स्पीकर या सभापति के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे, ताकि वे संविधान एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप हों।
चुनौतियाँ एवं आगे की राह:
विशेषज्ञों का मानना है कि:
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- विलय संबंधी प्रावधान का अक्सर दुरुपयोग कर अयोग्यता से बचा जाता है।
- इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है और लोकतंत्र में जनता का विश्वास कमजोर होता है।
- स्पीकर द्वारा निर्णय लेने में देरी तथा उनकी निष्पक्षता पर उठने वाले प्रश्न भी प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं।
- दल-बदल विरोधी कानून को अधिक प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित सुधार सुझाए गए हैं-
- विलय संबंधी प्रावधान को अधिक स्पष्ट बनाया जाए।
- अयोग्यता याचिकाओं के निपटारे के लिए समयबद्ध व्यवस्था निर्धारित की जाए।
- स्पीकर के स्थान पर स्वतंत्र निर्णयकारी प्राधिकरण (Independent Adjudicatory Authority) नियुक्त करने पर विचार किया जाए।
- इन सुधारों से जनता के चुनावी जनादेश की रक्षा, राजनीतिक स्थिरता तथा संवैधानिक जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है।
- विलय संबंधी प्रावधान का अक्सर दुरुपयोग कर अयोग्यता से बचा जाता है।
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निष्कर्ष:
दल-बदल विरोधी कानून में विलय संबंधी अपवाद की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की जा रही समीक्षा का भारत की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। इस मामले का निर्णय दलीय अनुशासन, विधायकों की स्वायत्तता तथा जनता के जनादेश की पवित्रता के बीच संतुलन को पुनर्परिभाषित कर सकता है। इसलिए यह भारत के लोकतांत्रिक शासन और संवैधानिक सुधारों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है।

