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Blog / 07 Apr 2026

शहरी सीवरों में सुपरबग्स: भारत का पहला AMR अपशिष्ट जल अध्ययन

संदर्भ:

हाल ही में CSIR-CCMB, हैदराबाद और साझेदार संस्थानों द्वारा भारत में पहली बार शहरी अपशिष्ट जल में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR) पर अध्ययन किया गया जिसमें पाया गया कि शहरी सीवर में सुपरबग्स तेजी से विकसित हो रहे हैं।

एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR)  के बारे में:

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR) आज वैश्विक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब बैक्टीरिया, वायरस, कवक और परजीवी एंटीमाइक्रोबियल दवाओं जैसे एंटीबायोटिक, एंटीवायरल या एंटिफंगल दवाओं का प्रभाव नहीं मानते। परिणामस्वरूप संक्रमण का इलाज कठिन या असंभव हो जाता है, जिससे गंभीर बीमारियाँ, रोग का प्रसार और मृत्यु दर बढ़ती है।

अध्ययन के बारे में:

      • अध्ययन मार्च 2022 से मार्च 2024 तक चार प्रमुख मेट्रो शहरों- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई  किया गया। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि चार प्रमुख मेट्रो शहरोंके अपशिष्ट जल में बैक्टीरिया किस तरह एंटीबायोटिक दवाओं से बचने के लिए अपने जीन में बदलाव कर रहे हैं।
      • इस दौरान 19 साइटों से 447 नमूने एकत्र किए गए। शोधकर्ताओं ने शॉटगन मेटाजेनोमिक्स तकनीक का उपयोग कर बैक्टीरिया के जीन का विश्लेषण किया।

Superbugs in Urban Sewers

अध्ययन से निम्नलिखित निष्कर्ष सामने आए:

      • शहर-विशिष्ट बैक्टीरिया: अलग-अलग शहरों में बैक्टीरिया का वितरण भिन्न था- चेन्नई और मुंबई में क्लेबसिएला न्यूमोनिया (Klebsiella pneumonia), जबकि कोलकाता में स्यूडोमोनास एरुजिनोसा (Pseudomonas aeruginosa) अधिक मिला है।
      • समान प्रतिरोध जीन: हालांकि बैक्टीरिया अलग थे, लेकिन एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीन सभी शहरों में समान पाए गए। ये जीन बैक्टीरिया को मजबूत कोशिका दीवार बनाने, एंटीबायोटिक दवा के असर को ख़त्म करना या कोशिका से बाहर निकालने की क्षमता देते हैं।
      • जीन का प्रसार: प्रतिरोधी जीन न केवल संतानों में बल्कि पड़ोसी सूक्ष्मजीवों में भी साझा होते हैं।
      • एंटीबायोटिक वर्ग: बैक्टीरिया टेट्रासाइक्लिन और बीटा-लैक्टम वर्ग की दवाओं के खिलाफ अधिक आसानी से प्रतिरोध विकसित कर सकते हैं, जबकि मैक्रोलाइड्स के खिलाफ कम।

भारत में AMR बढ़ने के प्रमुख कारण:

      • अत्यधिक और अनुचित एंटीमाइक्रोबियल उपयोग: दवाओं का अत्यधिक या अनुचित उपयोग सुपरबग्स उत्पन्न करता है।
      • अस्वच्छता और संक्रमण नियंत्रण की कमी: अस्पतालों और क्लीनिकों में स्वच्छता का अभाव और उचित संक्रमण नियंत्रण न होने से प्रतिरोधी बैक्टीरिया फैलते हैं।
      • फार्मास्यूटिकल कचरा: एंटीबायोटिक उत्पादन से निकलने वाला कचरा नई प्रतिरोधी प्रजातियों के लिए सहायक है।
      • सही डायग्नोस्टिक्स का अभाव: बिना परीक्षण के केवल लक्षण देखकर एंटीबायोटिक दवा देना AMR बढ़ाता है।
      • पशु और पोल्ट्री में अनियंत्रित दवा उपयोग: मानव चिकित्सा में एंटीबायोटिक निगरानी पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन पशु पालन और डेयरी उद्योग में अनियंत्रित उपयोग आम है।

AMR का वैश्विक और राष्ट्रीय महत्व:

      • AMR न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि पशु, वनस्पति और पर्यावरण को भी प्रभावित करता है।
      • शहरी अपशिष्ट जल अध्ययन यह दिखाता है कि सुपरबग्स हमारे शहरों में न केवल मौजूद हैं बल्कि तेजी से विकसित हो रहे हैं।

नीतिगत और रणनीतिक पहल:

      • वॉटरबेस्ड पैथोजन सर्विलांस: पूरे देश में अपशिष्ट जल आधारित निगरानी प्रणाली विकसित करना।
      • वन हेल्थ दृष्टिकोण : मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य को एकीकृत दृष्टिकोण से देखना।
      • अत्यधिक एंटीबायोटिक उपयोग पर नियंत्रण: केवल डॉक्टर की पर्ची पर दवा उपलब्ध कराना।
      • संक्रमण नियंत्रण और स्वच्छता: अस्पतालों और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में उच्च स्तर की स्वच्छता और संक्रमण नियंत्रण मानक अपनाना।
      • फार्मास्यूटिकल प्रदूषण नियंत्रण: एंटीबायोटिक उत्पादन से निकलने वाले कचरे को नियंत्रित करना।

निष्कर्ष:

भारत में AMR अब केवल चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण सुरक्षा का संकट बन चुका है। यह अध्ययन हमें चेतावनी देता है कि सुपरबग्स न केवल अस्पतालों में बल्कि हमारे शहरों के सीवर और पर्यावरण में भी मौजूद हैं। इस संकट से निपटने के लिए व्यापक निगरानी, नीतिगत हस्तक्षेप और वन हेल्थ दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। यह अध्ययन आने वाले वर्षों में भारत में AMR प्रबंधन और नीति निर्माण के लिए मार्गदर्शक साबित होगा।