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Blog / 24 Sep 2026

सुपर अल नीनो और भारत में गर्मी का प्रभाव

संदर्भ:

हाल ही में क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की एक रिपोर्ट ने अनुमान लगाया है कि वर्तमान में जारी अत्यधिक मजबूत अल नीनो (El Niño) घटना के कारण सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में लगभग 15,800 अतिरिक्त गर्मी से संबंधित मौतें हो सकती हैं। वैश्विक स्तर पर, इस घटना के पहले छह महीनों के दौरान लगभग 4.51 लाख अतिरिक्त गर्मी से संबंधित मौतों का अनुमान लगाया गया है।

अल नीनो क्या है?

      • अल नीनो (El Niño), अल नीनो–दक्षिणी दोलन (ENSO) का गर्म चरण है। यह तब होता है जब मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से असामान्य रूप से अधिक गर्म हो जाता है। इससे वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव होता है और दुनिया भर के मौसम के पैटर्न प्रभावित होते हैं।
      • “सुपर अल नीनो” किसी आधिकारिक वैज्ञानिक वर्गीकरण के बजाय, अत्यधिक मजबूत अल नीनो घटना के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अनौपचारिक शब्द है।

India Could Witness Around 15,000 Heat-Related Deaths Due To 'Super' El Niño  Over Next Six Months, Report Finds - The Wire

अल नीनो की कार्यप्रणाली (Mechanism):

      • सामान्य परिस्थितियाँ: सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक पवनें (Trade Winds) भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। इसके कारण गर्म पानी इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के आसपास जमा होता है, जबकि दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के पास समुद्र की गहराई से ठंडे पानी का ऊपर की ओर उठना (Upwelling) होता है।
      • अल नीनो के दौरान: व्यापारिक पवनें कमजोर हो जाती हैं या उनकी दिशा में बदलाव हो सकता है। इसके कारण गर्म सतही जल पूर्व की ओर खिसकने लगता है। इससे ठंडे पानी के ऊपर आने की प्रक्रिया कम हो जाती है और बड़ी मात्रा में ऊष्मा वायुमंडल में पहुँचती है।
      • ब्जर्कनेस फीडबैक (Bjerknes Feedback): पूर्वी प्रशांत महासागर के गर्म होने से दबाव प्रवणता और व्यापारिक पवनें और कमजोर हो जाती हैं। इससे समुद्र का तापमान और बढ़ता है। इस प्रकार एक सकारात्मक फीडबैक लूप बनता है, जिसे ब्जर्कनेस फीडबैक कहा जाता है।

भारत पर प्रभाव:

अल नीनो भारतीय मानसून को प्रभावित कर सकता है और अक्सर वर्षा को कमजोर या असमान बना सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, 22 सितंबर 2026 तक भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा सामान्य से लगभग 15% कम रही है।

प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं:

        • गर्मी से होने वाला तनाव और मृत्यु दर में वृद्धि
        • सूखा और जल संकट
        • कृषि क्षेत्र में नुकसान
        • बिजली की मांग में वृद्धि
        • पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव
        • वनाग्नि के बढ़ते जोखिम
      • अधिक गर्म मौसम के कारण कूलिंग और एयर-कंडीशनिंग की मांग भी बढ़ती है, जिससे भारत के विद्युत क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

वैश्विक प्रभाव:

अल नीनो अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रभाव उत्पन्न कर सकता है:

      • ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया: सूखा और वनाग्नि
      • दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्से: अत्यधिक वर्षा और बाढ़
      • दक्षिण-पूर्व एशिया: गर्मी और वर्षा के पैटर्न में बदलाव
      • भारत: मानसून में व्यवधान और गर्मी से संबंधित तनाव में वृद्धि
      • वैश्विक स्तर पर: औसत तापमान में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन से संबंध:

      • क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब ने वर्तमान घटना को “हमारे भविष्य की एक झलक” (postcard from our future) बताया है। इसका अर्थ है कि अल नीनो से जुड़ा वर्तमान तापमान भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण अधिक सामान्य होने वाली परिस्थितियों का संकेत दे सकता है।
      • हालाँकि, अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जबकि दीर्घकालिक वैश्विक तापमान वृद्धि मुख्य रूप से मानवजनित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण हो रही है। जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता के दौरान होने वाली अत्यधिक गर्मी की घटनाओं की तीव्रता को बढ़ा सकता है।

आगे की राह:

भारत को निम्नलिखित उपायों को मजबूत करने की आवश्यकता है:

      • मजबूत हीट-एक्शन प्लान (Heat Action Plans)
      • प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems)
      • जलवायु-लचीली स्वास्थ्य सेवाएँ
      • शहरों में कूलिंग और हीट-मैनेजमेंट रणनीतियाँ
      • जल संरक्षण
      • जलवायु-लचीली कृषि
      • विश्वसनीय और पर्याप्त विद्युत आपूर्ति
      • समुद्री, मीठे पानी और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों पर अल नीनो के प्रभावों की बेहतर निगरानी

निष्कर्ष:

मजबूत अल नीनो से जुड़ी गर्मी के कारण संभावित मृत्यु दर प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता, अत्यधिक गर्मी और जलवायु संवेदनशीलता के बीच संबंध को उजागर करती है। भारत के लिए बढ़ती जलवायु चरम घटनाओं के कारण होने वाली मृत्यु और आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए अनुकूलन क्षमता तथा पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना आवश्यक है।

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