चर्चा में क्यों?
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय कार्यबल (National Task Force-NTF) की अंतरिम रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में छात्र आत्महत्याओं को केवल मानसिक स्वास्थ्य की समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें एक संरचनात्मक और संस्थागत समस्या के रूप में समझने की आवश्यकता है।
पृष्ठभूमि:
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- सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में 13,000 से अधिक छात्र आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए गए, जो देश में हुई कुल आत्महत्याओं का लगभग 7.6 प्रतिशत थे। यह संख्या उसी वर्ष दर्ज किसान आत्महत्याओं से भी अधिक थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के विभिन्न दिशा-निर्देशों, परामर्श पहलों तथा राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (National Suicide Prevention Strategy) के बावजूद छात्र आत्महत्याओं में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है।
- इन गंभीर परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, शैक्षणिक संस्थानों में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं के बीच अमित कुमार और अन्य बनाम भारत संघ (2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय कार्यबल का गठन किया। इस कार्यबल को छात्र आत्महत्याओं के कारणों की जांच करने, मौजूदा कानूनी एवं संस्थागत व्यवस्थाओं की समीक्षा करने तथा रोकथाम हेतु सुझाव देने का दायित्व सौंपा गया।
- सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में 13,000 से अधिक छात्र आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए गए, जो देश में हुई कुल आत्महत्याओं का लगभग 7.6 प्रतिशत थे। यह संख्या उसी वर्ष दर्ज किसान आत्महत्याओं से भी अधिक थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के विभिन्न दिशा-निर्देशों, परामर्श पहलों तथा राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (National Suicide Prevention Strategy) के बावजूद छात्र आत्महत्याओं में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है।
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रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:
रिपोर्ट के अनुसार, छात्र आत्महत्याएँ प्रायः मानसिक बीमारी का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि वे सामाजिक भेदभाव, शैक्षणिक बहिष्करण, आर्थिक संकट, संस्थागत उपेक्षा तथा सहयोगी तंत्रों के अभाव जैसी संरचनात्मक समस्याओं से उत्पन्न होती हैं।
रिपोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ निम्नलिखित हैं-
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- भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए आत्महत्या रोकथाम संबंधी कोई समर्पित वैधानिक ढाँचा (Dedicated Statutory Framework) उपलब्ध नहीं है।
- वर्तमान व्यवस्थाएँ मुख्यतः परामर्शात्मक (Advisory) एवं प्रतिक्रियात्मक (Reactive) हैं, वे न तो निवारक हैं और न ही कानूनी रूप से बाध्यकारी।
- वर्ष 2018 से 2023 के बीच केंद्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIMs) से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के 13,600 से अधिक विद्यार्थियों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी।
- सर्वेक्षण में शामिल लगभग 46 प्रतिशत छात्र प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी (First-generation learners) थे, जिन्हें शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।
- 70 प्रतिशत से अधिक संस्थानों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं, जबकि 4 प्रतिशत से भी कम संस्थानों में आत्महत्या-जोखिम प्रबंधन संबंधी प्रोटोकॉल मौजूद हैं।
- विद्यार्थियों ने जाति, भाषा, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव तथा छात्रवृत्ति सहायता की अपर्याप्तता जैसी समस्याओं की ओर संकेत किया।
- भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए आत्महत्या रोकथाम संबंधी कोई समर्पित वैधानिक ढाँचा (Dedicated Statutory Framework) उपलब्ध नहीं है।
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न्यायिक व्याख्या:
सुकदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2025) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मानसिक कल्याण, संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है। न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि छात्र आत्महत्या की रोकथाम हेतु कोई एकीकृत कानूनी ढाँचा उपलब्ध नहीं है। अतः व्यापक कानून बनने तक शैक्षणिक संस्थानों के लिए अंतरिम दिशा-निर्देश जारी किए गए।
प्रमुख अनुशंसाएँ:
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- आरक्षित श्रेणी के पदों सहित सभी रिक्त शैक्षणिक पदों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर भरा जाए।
- आवासीय शिक्षण संस्थानों में चौबीसों घंटे चिकित्सीय एवं मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
- शैक्षणिक संस्थानों के लिए छात्र आत्महत्या की रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाया जाए।
- प्रत्येक संस्थान में आत्महत्या-जोखिम प्रबंधन प्रोटोकॉल विकसित किए जाएँ।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) विद्यालय एवं उच्च शिक्षा स्तर के छात्रों की आत्महत्याओं का पृथक आँकड़ा संकलित करे।
- छात्र कल्याण और आत्महत्या रोकथाम हेतु कानूनी रूप से बाध्यकारी एवं प्रवर्तनीय ढाँचा विकसित किया जाए।
- आरक्षित श्रेणी के पदों सहित सभी रिक्त शैक्षणिक पदों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर भरा जाए।
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निष्कर्ष:
राष्ट्रीय कार्यबल ने रेखांकित किया है कि छात्र आत्महत्याएँ केवल व्यक्तिगत मानसिक स्वास्थ्य की विफलता नहीं हैं, बल्कि वे समाज और शैक्षणिक संस्थानों में विद्यमान गहरी संरचनात्मक असमानताओं का प्रतिबिंब हैं। इस संकट से निपटने के लिए कानूनी सुधार, समावेशी एवं भेदभाव-मुक्त परिसर, प्रभावी सहायता तंत्र तथा संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि उच्च शिक्षा सभी विद्यार्थियों के लिए सुलभ, समानतापूर्ण और सुरक्षित बन सके।
प्रश्न 1: छात्र मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्महत्या पर राष्ट्रीय कार्यबल (NTF) का गठन क्यों किया गया था?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय ने Amit Kumar & Ors. v. Union of India मामले में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं के कारणों की जांच करने, मौजूदा संस्थागत एवं कानूनी व्यवस्थाओं की समीक्षा करने तथा आत्महत्या की रोकथाम एवं छात्र कल्याण के लिए उपाय सुझाने हेतु राष्ट्रीय कार्यबल (NTF) का गठन किया था।
प्रश्न 2: Sukdeb Saha v. State of Andhra Pradesh (2025) मामले में सर्वोच्च न्यायालय की क्या टिप्पणी थी?
उत्तर:
Sukdeb Saha v. State of Andhra Pradesh (2025) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मानसिक कल्याण, संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न अंग है। न्यायालय ने छात्र आत्महत्याओं की रोकथाम के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचे की आवश्यकता पर भी बल दिया।
प्रश्न 3: मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (Mental Healthcare Act-MHCA), 2017 का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अधिकार-आधारित (Rights-based) ढाँचा प्रदान करना है, जिससे मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों की गरिमा, स्वायत्तता, उपचार तक पहुँच तथा उनके अधिकारों के संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सके।
प्रश्न 4: MHCA, 2017 के अंतर्गत "मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच का अधिकार" (Right to Access Mental Healthcare) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यह अधिनियम प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली अथवा वित्तपोषित सस्ती, सुलभ एवं गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच का अधिकार प्रदान करता है।
प्रश्न 5: मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के अंतर्गत 'अग्रिम निर्देश' (Advance Directives) क्या हैं?
उत्तर:
अग्रिम निर्देश (Advance Directives) व्यक्तियों को यह अधिकार प्रदान करते हैं कि वे पहले से ही अपने पसंदीदा उपचार के संबंध में निर्देश दे सकें तथा ऐसा प्रतिनिधि नामित कर सकें, जो उनके निर्णय लेने की क्षमता समाप्त होने की स्थिति में उनकी ओर से निर्णय ले सके।
प्रश्न 6: MHCA, 2017 मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा किस प्रकार करता है?
उत्तर:
यह अधिनियम क्रूर, अमानवीय एवं अपमानजनक व्यवहार पर प्रतिबंध लगाता है, चिकित्सीय अभिलेखों की गोपनीयता सुनिश्चित करता है, समुदाय-आधारित जीवन (Community Living) को प्रोत्साहित करता है तथा मानसिक एवं शारीरिक रोगों के लिए समान उपचार, जिसमें बीमा कवरेज भी शामिल है, को अनिवार्य बनाता है।
प्रश्न 7: MHCA, 2017 के अंतर्गत निगरानी एवं शिकायत निवारण के लिए कौन-सी संस्थाओं की स्थापना की गई है?
उत्तर:
इस अधिनियम के तहत रोगियों के अधिकारों की रक्षा करने एवं शिकायतों की सुनवाई हेतु मानसिक स्वास्थ्य पुनरीक्षण बोर्ड (Mental Health Review Boards-MHRBs) की स्थापना का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के विनियमन तथा देखभाल के मानकों को बनाए रखने के लिए केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (Central Mental Health Authority) और राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (State Mental Health Authority) की स्थापना की गई है।

