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Blog / 12 Mar 2026

दुर्लभ समुद्री एम्फिपोड स्टेनोथोए लोवरीआई की खोज

दुर्लभ समुद्री एम्फिपोड स्टेनोथोए लोवरीआई की खोज

संदर्भ:

हाल ही में समुद्री वैज्ञानिकों ने बरहामपुर यूनिवर्सिटी (ओडिशा) के नेतृत्व में भारतीय समुद्री जल क्षेत्र में एक दुर्लभ समुद्री एम्फिपोड प्रजाति की स्टेनोथोए लोवरीआई (Stenothoe lowryi) की पहली बार खोज की है। यह प्रजाति ओडिशा के गंजाम जिले में स्थित अर्ज्यपल्ली तट (Arjyapalli Beach) पर एक तटीय जैवविविधता सर्वेक्षण के दौरान पाई गई। यह खोज महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रजाति पहले केवल मलेशिया में ही रिकॉर्ड की गयी थी और अन्य क्षेत्रों में इसके वितरण के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी।

स्टेनोथोए लोवरीआई के बारे में:

      • स्टेनोथोए लोवरीआई (Stenothoe lowryi) एक दुर्लभ समुद्री एम्फिपोड है, जो झींगा के समान दिखने वाला एक क्रस्टेशियन (कवचधारी जीव) है। यह स्टेनोथोइडी (Stenothoidae) कुल तथा एम्फिपोडा (Amphipoda) से संबंधित है।
      • एम्फिपोड छोटे अकशेरुकी जीव होते हैं, जो केकड़े, लॉब्स्टर और झींगों से संबंधित होते हैं।

इस प्रजाति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

      • आकार: लगभग 5.5 मिमी लंबा।
      • आवास: चट्टानी अंतर-ज्वारीय (intertidal) तटीय क्षेत्र।
      • विशिष्ट विशेषता: बड़े पंजे (ग्नैथोपोड), जिनका उपयोग सतह को पकड़ने और भोजन प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
      • वितरण: भारत में पाए जाने से पहले यह केवल मलेशिया के समुद्री क्षेत्रों में ही ज्ञात थी।

एम्फिपोड विश्वभर में महासागरों, मीठे जल तंत्रों, समुद्री तटों, गुफाओं तथा आर्द्र आवासों में व्यापक रूप से पाए जाते हैं।

पारिस्थितिक महत्व:

      • यद्यपि स्टेनोथोए लोवरीआई की सटीक पारिस्थितिक भूमिका पर अभी अध्ययन जारी है, तथापि सामान्यतः एम्फिपोड समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
      • ये प्रायः अपघटक (detritivores) और मृतजीवी (scavengers) के रूप में कार्य करते हैं। ये कार्बनिक पदार्थों पर भोजन करते हैं और समुद्री पर्यावरण में पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं।
      • इसके अतिरिक्त, ये समुद्री खाद्य जाल (marine food web) में एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं और मछलियों तथा अन्य समुद्री अकशेरुकी जीवों के लिए भोजन का स्रोत प्रदान करते हैं।

ओडिशा में अन्य एम्फिपोड खोजें:

      • इसी अनुसंधान दल ने इससे पहले भी ओडिशा के तटीय पारिस्थितिक तंत्रों से कई नई एम्फिपोड प्रजातियों की खोज की है, जिनमें शामिल हैं:
        • ग्रैंडिडिएरेला गीतांजलाए (Grandidierella geetanjalae)-  जिसकी खोज Chilika Lagoon के निकट रंभा क्षेत्र में की गई।
        • पैरहायले ओडियन (Parhyale odian)- जिसे वर्ष 2022 में चिलिका झील के बरकुल क्षेत्र में खोजा गया।
      • ये खोजें ओडिशा के समुद्री तट की समृद्ध जैवविविधता को दर्शाती हैं और नई प्रजातियों के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण में अनुसंधान की महत्ता को रेखांकित करती हैं।

जैवविविधता संरक्षण के लिए महत्व:

      • स्टेनोथोए लोवरीआई की खोज के कई महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं:
        • इस प्रजाति के ज्ञात भौगोलिक वितरण का विस्तार हुआ है।
        • बंगाल की खाड़ी क्षेत्र की समुद्री जैवविविधता को समझने में सहायता मिलती है।
        • तटीय पारिस्थितिक तंत्रों के अनुसंधान और संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
        • यह दर्शाता है कि भारत के समुद्री तटों पर अभी भी अनेक जीव वैज्ञानिक रूप से अन्वेषित नहीं हुए हैं।

निष्कर्ष:

भारतीय समुद्री जल क्षेत्र में स्टेनोथोए लोवरीआई की पहचान समुद्री जैवविविधता अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह भारत के तटीय क्षेत्रों की पारिस्थितिक समृद्धि को दर्शाती है और समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण तथा वैज्ञानिक अध्ययन की निरंतर आवश्यकता को रेखांकित करती है। इस प्रकार की खोजें समुद्री जीवन, पारिस्थितिक संतुलन तथा हिंद महासागर क्षेत्र में जैवविविधता संरक्षण की हमारी समझ को और अधिक गहरा बनाती हैं।