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Blog / 11 Mar 2026

श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने गूगल के खिलाफ कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया

संदर्भ:

हाल ही में श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश ए. एच. एम. दिलीप नवाज़ ने गूगल सर्च परिणामों में दिखाई दे रहे कथित मानहानिकारक लेखों को हटाने की मांग करते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय का रुख किया है। उन्होंने यह मांग भूल जाने का अधिकार” (Right to be Forgotten) के प्रावधान के तहत की है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिकाकर्ता भारतीय नागरिक नहीं हैं, फिर भी उन्होंने भारतीय कानून के अंतर्गत उपलब्ध संवैधानिक सुरक्षा का सहारा लिया है। यह घटना सीमाहीन इंटरनेट के युग में उभरती नई कानूनी चुनौतियों को भी उजागर करती है।

मामले की पृष्ठभूमि:

      • न्यायमूर्ति नवाज़ ने एक याचिका दायर कर उन कुछ ऑनलाइन लेखों को हटाने की मांग की है, जिन्हें श्रीलंकाई समाचार पोर्टलों द्वारा वर्ष 2015 और 2020 में प्रकाशित किया गया था। इन लेखों में उन पर भ्रष्टाचार और कदाचार के आरोप लगाए गए थे।
      • हालाँकि बाद में संबंधित आपराधिक मामला श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त कर दिया गया था, फिर भी ये रिपोर्टें अभी भी गूगल सर्च परिणामों में दिखाई देती हैं और कथित रूप से उनकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा रही हैं।
      • इस मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), गूगल इंडिया तथा संबंधित समाचार पोर्टलों को नोटिस जारी कर आरोपों पर जवाब देने के लिए कहा है।
      • न्यायमूर्ति नवाज़ का तर्क है कि इन लेखों का लगातार प्रसार उन्हें स्थायी मीडिया ट्रायल” (perpetual media trial) की स्थिति में रखता है और उनके सम्मान तथा निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

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भूल जाने का अधिकारके बारे में:

      • यह याचिका भूल जाने का अधिकार” (Right to be Forgotten) की अवधारणा पर आधारित है, जिसके अंतर्गत कोई व्यक्ति सर्च इंजन से अपने बारे में उपलब्ध पुरानी, अप्रासंगिक या गलत व्यक्तिगत जानकारी को हटाने का अनुरोध कर सकता है।
      • इस सिद्धांत की उत्पत्ति यूरोप के डेटा संरक्षण कानूनों से हुई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके अतीत की घटनाओं के आधार पर स्थायी रूप से न किया जाए, विशेषकर तब जब आरोप बाद में असत्य सिद्ध हो चुके हों।
      • भारत में यह अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है, लेकिन अदालतों ने इसे धीरे-धीरे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार के हिस्से के रूप में मान्यता देना शुरू कर दिया है। 

कर्नाटक उच्च न्यायालय का रुख क्यों किया गया?

      • अनुच्छेद 21 का प्रयोग: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। अदालतों ने इसकी व्याख्या करते हुए इसमें निजता और प्रतिष्ठा के अधिकार को भी शामिल किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संरक्षण केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी व्यक्तियों पर लागू होता है। इसी आधार पर न्यायमूर्ति नवाज़ ने भारत में कानूनी राहत की मांग की है।
      • क्षेत्राधिकार (टेरिटोरियल जूरिस्डिक्शन): गूगल का भारतीय मुख्यालय बेंगलुरु में स्थित है। चूँकि विवादित लिंक दिखाने वाला सर्च इंजन वहीं से संचालित होता है, इसलिए याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस मामले पर कर्नाटक उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार बनता है।
      • श्रीलंका में नैतिक बाधाएँ: श्रीलंका में सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश होने के कारण अपने ही देश में मानहानि का मामला दायर करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत 'निमो जुडेक्स इन कॉसा सुआ' (Nemo Judex in Causa Sua- कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता)” का उल्लंघन माना जा सकता है।

निष्कर्ष:

जस्टिस ए. एच. एम. दिलीप नवाज़ से जुड़ा यह मामला कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष संवैधानिक कानून, डिजिटल निजता और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकार के महत्वपूर्ण संगम को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि सीमाहीन डिजिटल प्लेटफॉर्म के युग में अदालतों को निजता, प्रतिष्ठा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। इस मामले का निर्णय भारत में ऑनलाइन मानहानि और भूल जाने के अधिकारसे संबंधित विकसित हो रही न्यायिक व्याख्या को प्रभावित कर सकता है और साथ ही वैश्विक डिजिटल शासन के संदर्भ में भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है।