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Blog / 04 Nov 2026

दक्षिण एशिया की प्रवाल भित्तियाँ गंभीर रूप से संकटग्रस्त: IUCN

संदर्भ:

हाल ही में, अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature–IUCN) ने पारिस्थितिकी तंत्रों की रेड लिस्ट (IUCN Red List of Ecosystems) के अंतर्गत प्रवाल भित्तियों का पहला वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र-स्तरीय मूल्यांकन जारी किया है। इसमें चेतावनी दी गई है कि अगले 50 वर्षों में संभावित समुद्री ताप तनाव (Marine Heat Stress) को ध्यान में रखते हुए दक्षिण एशिया के सभी 13 प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी क्षेत्रों के गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) होने का खतरा है। इनमें से चार पारिस्थितिकी क्षेत्र भारत में स्थित हैं।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

      • इस मूल्यांकन में भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और चागोस द्वीपसमूह में लगभग 8,282.6 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली प्रवाल भित्तियों को शामिल किया गया है। यह विश्व की कुल प्रवाल भित्तियों के लगभग 4% हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
      • अध्ययन के अनुसार, केवल ऐतिहासिक अवलोकनों के आधार पर दक्षिण एशिया के सात पारिस्थितिकी क्षेत्रों को सुभेद्य (Vulnerable), चार को संकटग्रस्त (Endangered) और दो को गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में रखा गया था। हालाँकि, जब IPCC के जलवायु परिदृश्यों के अंतर्गत संभावित समुद्री ताप तनाव को भी शामिल किया गया, तो सभी 13 पारिस्थितिकी क्षेत्र गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में आ गए।

भारत के चार प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी क्षेत्र:

      • इस मूल्यांकन में भारत के चार प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी क्षेत्रों की पहचान की गई है:
        • अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह।
        • लक्षद्वीप द्वीपसमूह।
        • मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरूमध्य (दक्षिणी तट)।
        • कच्छ की खाड़ी (पश्चिमी तट)।
      • दक्षिण एशिया के कुल 350 निगरानी स्थलों में से 162 स्थल भारत में स्थित हैं, जो क्षेत्रीय निगरानी नेटवर्क का लगभग 46.3% हिस्सा है।

प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) क्या हैं?

प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) क्या हैं?

      • प्रवाल भित्तियाँ समुद्र के भीतर पाए जाने वाले ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जिनका निर्माण प्रवाल पॉलीप्स (Coral Polyps) नामक छोटे समुद्री जीवों की कॉलोनियों द्वारा होता है। ये जीव कैल्शियम कार्बोनेट का स्राव करके भित्तियों की संरचना का निर्माण करते हैं। इन्हें असाधारण जैव विविधता के कारण अक्सर "समुद्र के वर्षावन" (Rainforests of the Sea) कहा जाता है।
      • प्रवाल भित्तियाँ समुद्र तल के 1% से भी कम क्षेत्र में फैली हैं, लेकिन लगभग 25% समुद्री मछली प्रजातियों को सहारा देती हैं। ये लाखों लोगों को भोजन, तटीय सुरक्षा, पर्यटन के अवसर और आजीविका प्रदान करती हैं।

प्रवाल भित्तियों के समक्ष प्रमुख खतरे:

इस मूल्यांकन में कई परस्पर संबंधित खतरों की पहचान की गई है, जिनमें समुद्री हीटवेव, समुद्र के तापमान में वृद्धि, व्यापक प्रवाल विरंजन (Mass Coral Bleaching), महासागरीय अम्लीकरण, अत्यधिक मछली पकड़ना, विनाशकारी मत्स्यन प्रथाएँ, तटीय विकास, ड्रेजिंग (समुद्र तल की खुदाई), प्लास्टिक प्रदूषण, अवसादन और असतत पर्यटन शामिल हैं।

प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) क्या है?

प्रवाल विरंजन की प्रक्रिया तब होती है, जब प्रवाल पर्यावरणीय तनाव, विशेष रूप से समुद्र के असामान्य रूप से उच्च तापमान का सामना करते हैं। ऐसी स्थिति में वे अपने ऊतकों में रहने वाले सहजीवी शैवाल (Zooxanthellae) को बाहर निकाल देते हैं। ये शैवाल प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से प्रवालों को भोजन प्रदान करते हैं और उन्हें विशिष्ट रंग देते हैं।

इसके परिणामस्वरूप प्रवाल सफेद दिखाई देने लगते हैं। यदि तनावपूर्ण परिस्थितियाँ लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो प्रवालों की मृत्यु हो सकती है, जिससे संपूर्ण प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण हो सकता है।

भारत के लिए निहितार्थ:

प्रवाल भित्तियों का क्षरण समुद्री जैव विविधता, मत्स्य पालन, तटीय आजीविका और पर्यटन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इससे तटीय अपरदन, चक्रवात और तूफानी ज्वार (Storm Surges) के विरुद्ध मिलने वाली प्राकृतिक सुरक्षा भी कम हो जाती है। प्रवाल भित्तियों का विनाश समुद्री खाद्य शृंखलाओं को बाधित कर सकता है और तटीय एवं द्वीपीय समुदायों की आजीविका के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है।

सरकार की पहलें:

भारत ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए कई उपाय किए हैं, जिनमें शामिल हैं:

      • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी कई समुद्री प्रजातियों को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।
      • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: पर्यावरण संरक्षण के लिए एक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
      • तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचना: तटीय क्षेत्रों में विभिन्न गतिविधियों को विनियमित करती है।
      • राष्ट्रीय तटीय मिशन (National Coastal Mission): तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण और प्रबंधन में सहायता करता है।
      • समुद्री संरक्षित क्षेत्र (Marine Protected Areas): पारिस्थितिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण समुद्री आवासों का संरक्षण करते हैं।
      • भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI): समुद्री जैव विविधता का सर्वेक्षण, प्रवाल निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान करता है।

आगे की राह:

      • भारत को समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (Marine Protected Areas) को मजबूत करने, प्रवाल पारिस्थितिकी तंत्रों की वैज्ञानिक निगरानी को बढ़ावा देने तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशील प्रवाल प्रजातियों के माध्यम से प्रवाल पुनर्स्थापन की प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता है।
      • तटीय निर्माण का विनियमन, सतत मत्स्यन, समुद्री प्रदूषण पर नियंत्रण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना और वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C के करीब सीमित रखना प्रवाल भित्तियों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष:

IUCN का यह मूल्यांकन जलवायु परिवर्तन के कारण दक्षिण एशिया के प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्रों की बढ़ती सुभेद्यता को उजागर करता है। समुद्री जैव विविधता, तटीय आजीविका और पारिस्थितिक सुरक्षा के संरक्षण के लिए इनका संरक्षण आवश्यक है। भारत को इन मूल्यवान पारिस्थितिकी तंत्रों की सुरक्षा के लिए जलवायु परिवर्तन शमन, समुद्री संरक्षण और सतत तटीय विकास को एकीकृत करना चाहिए।

 

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