‘सॉइल सखी’ पहल
सन्दर्भ:
हाल के दिनों में महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में ‘सॉइल सखी’ (Soil Sakhis) पहल ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने और कृषि लचीलेपन को बढ़ाने का एक अभिनव मॉडल बन चुकी है। प्रशिक्षित महिलाएं मृदा परीक्षण और वैज्ञानिक खेती के माध्यम से मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार कर रही हैं, जिससे खेती की लागत कम होती है और उत्पादन बढ़ता है। यह पहल महिला-नेतृत्व वाली कृषि (feminisation of agriculture) और समान रूप से सहभागी ग्रामीण विकास का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
पृष्ठभूमि:
महाराष्ट्र के कई जिलों में पानी की कमी और मिट्टी की उर्वरता में गिरावट के कारण लघु और सीमांत किसानों के लिए आजीविका संकट बना रहता है। रसायनों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग ने मिट्टी की जैविक स्थिति और जल धारण क्षमता को प्रभावित किया है। इस स्थिति में पारंपरिक कृषि तकनीकें अपर्याप्त साबित हो रही हैं, जिससे समुदाय-आधारित विज्ञान और प्रशिक्षण की आवश्यकता बढ़ गई है।
‘सॉइल सखी’ के बारे में:
सॉइल सखियां, प्रशिक्षित ग्रामीण महिलायें होती हैं जो अपने गांव में पैरा-एक्सटेंशन एजेंट (para-extension agents) की भूमिका निभाती है। ये महिलाएं:
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- वैज्ञानिक मृदा परीक्षण और पोषक तत्व विश्लेषण करती हैं।
- स्वयं सहायता समूह (SHGs) के माध्यम से साथी किसानों को मिट्टी और पोषण संबंधी जानकारी देती हैं।
- फसल योजना, जलवायु अनुकूलन और टिकाऊ कृषि (sustainable farming) के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
- वैज्ञानिक मृदा परीक्षण और पोषक तत्व विश्लेषण करती हैं।
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इन सखियों के माध्यम से महिलाएं न केवल खेतिहर मजदूर रहकर काम करती हैं, बल्कि निर्णय लेने वाली (decision-makers) बनती हैं, जो कृषि का नेतृत्व कर सकती हैं।
कृषि का नारीकरण:
पुरुषों के प्रवास और ग्रामीण श्रम में बदलाव के कारण भारत में कृषि में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। ‘सॉइल सखी’ पहल इस नारीकरण को मजबूती देती है और महिलाओं को तकनीकी ज्ञान, नेतृत्व और आर्थिक सशक्तिकरण प्रदान करती है।
स्वयं सहायता समूह (SHGs) की भूमिका:
स्वयं सहायता समूह इस पहल की रीढ़ की हड्डी हैं। ये समूह:
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- सामूहिक सीखने और संसाधन साझा करने का मंच प्रदान करते हैं।
- महिलाओं को क्रेडिट, बीमा और सरकारी योजनाओं तक पहुँच सुनिश्चित करते हैं।
- मृदा परीक्षण और कृषि-परामर्श जैसी सूक्ष्म-उद्यम (micro-enterprises) शुरू करने के अवसर देते हैं।
- इस तरह SHGs सामाजिक और आर्थिक समर्थन के साथ सशक्त ग्रामीण नेटवर्क का निर्माण करते हैं।
- सामूहिक सीखने और संसाधन साझा करने का मंच प्रदान करते हैं।
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प्रभाव और महत्व:
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- मृदा स्वास्थ्य और उत्पादकता: वैज्ञानिक खेती और उचित पोषक तत्व प्रबंधन से लागत कम और उपज में वृद्धि।
- आर्थिक सशक्तिकरण: महिलाओं को आय के नए स्रोत और नेतृत्व भूमिकाएं।
- सामाजिक परिवर्तन: ग्रामीण पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती और महिलाओं की ‘ज्ञान धारक’ के रूप में मान्यता।
- जलवायु लचीलापन: सूखाग्रस्त क्षेत्रों में टिकाऊ और प्रतिरोधी कृषि का विकास।
- मृदा स्वास्थ्य और उत्पादकता: वैज्ञानिक खेती और उचित पोषक तत्व प्रबंधन से लागत कम और उपज में वृद्धि।
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नीतिगत संबंध:
यह मॉडल राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM), महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना (MKSP) और कृषि सखी कार्यक्रमों के अनुरूप है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से SHGs और सखियों को प्रशिक्षण, वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है, जिससे महिलाओं का सशक्त और सहभागी नेतृत्व सुनिश्चित होता है।
निष्कर्ष:
‘सॉइल सखी’ पहल सिर्फ कृषि तकनीक का सुधार नहीं है, बल्कि यह जेंडर, कृषि और समुदाय के अंतर्संबंध को बदलकर ग्रामीण विकास को समावेशी और टिकाऊ बनाती है। महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त जिलों में यह पहल महिलाओं के नेतृत्व में भविष्योन्मुखी कृषि दृष्टिकोण का उदाहरण पेश करती है।

