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Blog / 11 Mar 2026

हथियार आयात पर SIPRI रिपोर्ट

संदर्भ:

हाल ही में स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 से 2025 के बीच भारत, विश्व का दूसरा सबसे बड़ा प्रमुख हथियार आयातक देश रहा।

सिपरी (SIPRI) रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

      • सिपरी (SIPRI) के विश्लेषण में वैश्विक हथियार हस्तांतरण और रक्षा बाज़ार में भारत की स्थिति से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं।
      • 2021–25 के दौरान हथियार आयात के मामले में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर रहा।
      • वैश्विक हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 8.2% रही।
      • 2016–2020 की तुलना में 2021–2025 के दौरान भारत के हथियार आयात में लगभग 4% की कमी आई।
      • इस कमी का एक कारण देश में बढ़ता घरेलू रक्षा उत्पादन है, हालांकि स्वदेशी परियोजनाओं में अक्सर देरी देखने को मिलती है।
      • वैश्विक स्तर पर यूक्रेन सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा, इसके बाद भारत, सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान का स्थान रहा।

SIPRI Report: India Second Largest Arms Importer (2021–25)

भारत में हथियार आयात अधिक होने के कारण:

      • दक्षिण एशिया में सुरक्षा चुनौतियाँ:
        • भारत द्वारा हथियारों की खरीद मुख्य रूप से पड़ोसी देशों से उत्पन्न रणनीतिक खतरों से प्रभावित होती है। चीन और पाकिस्तान के साथ तनाव तथा समय-समय पर होने वाली सैन्य झड़पों के कारण भारत को अपनी रक्षा क्षमता को लगातार मजबूत और आधुनिक बनाना पड़ता है।
        • इन भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भारत को उन्नत सैन्य उपकरण जैसे लड़ाकू विमान, पनडुब्बियाँ, मिसाइलें और निगरानी प्रणालियाँ खरीदनी पड़ती हैं।
      • सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण: भारत अपनी सेना, नौसेना और वायुसेना के पुराने होते उपकरणों को बदलने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम चला रहा है।
      • बड़े रक्षा खरीद कार्यक्रमों में शामिल हैं:
        • लड़ाकू विमानों की खरीद
        • उन्नत मिसाइल प्रणालियाँ
        • पनडुब्बियाँ और नौसैनिक प्लेटफॉर्म
      • इनमें से कई उच्च तकनीक वाले रक्षा उपकरण अभी भी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से खरीदे जाते हैं।
      • घरेलू रक्षा उत्पादन की सीमाएँ: भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलों के तहत स्वदेशी प्रणालियों के विकास में प्रगति की है। फिर भी घरेलू निर्माण में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे:
        • तकनीकी कमी
        • उत्पादन में देरी
        • सीमित औद्योगिक क्षमता
      • इसी कारण उन्नत हथियार प्रणालियों के लिए आयात अभी भी आवश्यक बना हुआ है।

रक्षा खरीद के बदलते रुझान:

      • रूस पर निर्भरता में कमी: ऐतिहासिक रूप से रूस भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में भारत के हथियार आयात में उसकी हिस्सेदारी लगातार कम हुई है।
        • 2011–15 के दौरान लगभग 70%
        • 2016–20 के दौरान लगभग 51%
        • 2021–25 के दौरान लगभग 40%
      • इससे स्पष्ट है कि भारत अब अपने रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में विविधता ला रहा है।
      • पश्चिमी देशों के साथ रक्षा सहयोग में वृद्धि: भारत अब कई पश्चिमी देशों से भी अधिक रक्षा उपकरण खरीद रहा है, जैसे:
        • फ्रांस 
        • संयुक्त राज्य अमेरिका 
        • इज़राइल 
        • यह बदलाव भारत की उस रणनीति को दर्शाता है जिसके तहत वह किसी एक देश पर निर्भरता कम करना और रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत करना चाहता है।
      • वैश्विक हथियार व्यापार के रुझान: SIPRI रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर हथियार व्यापार के कुछ व्यापक रुझान भी बताए गए हैं:
        • संयुक्त राज्य अमेरिका 42% वैश्विक निर्यात के साथ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बना रहा।
        • दूसरे स्थान पर फ्रांस रहा, इसके बाद रूस का स्थान रहा।
        • यूक्रेन संघर्ष से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं के कारण यूरोप सबसे बड़ा हथियार-आयातक क्षेत्र बनकर उभरा।
        • ये रुझान बताते हैं कि दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण रक्षा खर्च में लगातार वृद्धि हो रही है।

भारत के लिए निहितार्थ:

रिपोर्ट के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को और तेज़ी से बढ़ाने, घरेलू अनुसंधान एवं विकास को मजबूत करने तथा रक्षा निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष:

सिपरी (SIPRI) रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि भारत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रयास कर रहा है, लेकिन जटिल सुरक्षा परिस्थितियों और सैन्य आधुनिकीकरण की आवश्यकताओं के कारण वह अभी भी दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक है। दीर्घकाल में विदेशी सैन्य उपकरणों पर निर्भरता कम करने के लिए तकनीकी नवाचार, औद्योगिक विकास और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक होगा।