संदर्भ:
हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) विधेयक, 2025 (जिसे आधिकारिक रूप से परमाणु ऊर्जा विधेयक, 2025 कहा जाता है) को मंज़ूरी दी है। इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक सुधार करना है, ताकि निजी निवेश को सक्षम बनाया जा सके और 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता के सरकारी लक्ष्य को पूरा किया जा सके।
पृष्ठभूमि:
वर्तमान में परमाणु ऊर्जा अधिनियम निजी कंपनियों और राज्य सरकारों को परमाणु विद्युत संयंत्रों के संचालन की अनुमति नहीं देता। इसके कारण देश में सभी 24 वाणिज्यिक परमाणु रिएक्टरों का संचालन केवल न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) द्वारा किया जाता है।
SHANTI विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ
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- निजी क्षेत्र की भागीदारी: यह विधेयक निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा के पूरे वैल्यू चेन में भाग लेने की अनुमति देता है जिसमें विद्युत उत्पादन, रिएक्टर निर्माण, उपकरण निर्माण, ईंधन निर्माण तथा अन्य नागरिक परमाणु गतिविधियाँ शामिल हैं, जो पहले परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत प्रतिबंधित थीं।
- एकीकृत कानूनी ढाँचा: विधेयक मौजूदा परमाणु ऊर्जा से जुड़े कानूनों को एक सरल और सुव्यवस्थित कानून में समेकित करने का प्रस्ताव करता है। इससे लाइसेंसिंग, सुरक्षा अनुपालन, विवाद निपटान और नियामकीय स्पष्टता में सुधार होगा तथा उन नियामकीय कमियों को दूर किया जा सकेगा, जो अब तक निजी निवेश में बाधक रही हैं।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश: SHANTI विधेयक परमाणु क्षेत्र में 49% तक FDI की अनुमति देता है, जिससे वैश्विक तकनीकी भागीदारों, रणनीतिक निवेशकों और सॉवरेन वेल्थ फंड्स के साथ सहयोग संभव होगा।
- दायित्व और बीमा सुधार: इस विधेयक में परमाणु दायित्व प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव है जिसमें उपकरण आपूर्तिकर्ताओं की देनदारी (liability) को सीमित करना तथा भारतीय परमाणु बीमा पूल (Indian Nuclear Insurance Pool) के माध्यम से ऑपरेटर बीमा ढाँचे का पुनर्गठन शामिल है। इससे भारत की व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाकर निवेशकों का विश्वास बढ़ाया जाएगा।
- नियामकीय सुदृढ़ीकरण: विधेयक एक स्वतंत्र परमाणु सुरक्षा प्राधिकरण तथा संभवतः एक विशेषीकृत परमाणु न्यायाधिकरण (Nuclear Tribunal) की स्थापना की परिकल्पना करता है, ताकि प्रभावी निगरानी, पारदर्शिता और नियामकीय निश्चितता सुनिश्चित की जा सके।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: यह विधेयक निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा के पूरे वैल्यू चेन में भाग लेने की अनुमति देता है जिसमें विद्युत उत्पादन, रिएक्टर निर्माण, उपकरण निर्माण, ईंधन निर्माण तथा अन्य नागरिक परमाणु गतिविधियाँ शामिल हैं, जो पहले परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत प्रतिबंधित थीं।
रणनीतिक महत्व:
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- ऊर्जा एवं जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति: भारत ने 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता और 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। स्थिर बेसलोड ऊर्जा स्रोत होने के कारण परमाणु ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा की पूरक है और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- निवेश और नवाचार को बढ़ावा: निजी क्षेत्र की भागीदारी से बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश आएगा, परमाणु परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेज़ी आएगी तथा स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) और अगली पीढ़ी की परमाणु तकनीकों जैसे क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
- घरेलू अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहन: निजी भागीदारी की अनुमति से भारत में एक प्रतिस्पर्धी नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होगा, जिससे स्वदेशी तकनीक, कौशल विकास और बौद्धिक संपदा (IP) सृजन को बल मिलेगा।
- ऊर्जा एवं जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति: भारत ने 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता और 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। स्थिर बेसलोड ऊर्जा स्रोत होने के कारण परमाणु ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा की पूरक है और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
चुनौतियाँ:
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- दायित्व और बीमा ढाँचा: परमाणु दायित्व व्यवस्था में प्रभावी सुधार अत्यंत आवश्यक है, ताकि वैश्विक तकनीकी प्रदाताओं और घरेलू निवेशकों की जोखिम संबंधी चिंताओं को दूर किया जा सके।
- विनियमन और निगरानी: स्वतंत्र, विश्वसनीय नियामकों की स्थापना और जोखिम-आधारित सुरक्षा प्रोटोकॉल अपनाना सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के पालन के लिए आवश्यक होगा।
- दीर्घकालिक परियोजना अवधि: परमाणु परियोजनाओं में लंबा समय और उच्च पूंजी निवेश लगता है इसलिए नीतिगत स्थिरता, विश्वसनीय वित्तपोषण तंत्र और मज़बूत संस्थागत क्षमता अनिवार्य होगी।
- दायित्व और बीमा ढाँचा: परमाणु दायित्व व्यवस्था में प्रभावी सुधार अत्यंत आवश्यक है, ताकि वैश्विक तकनीकी प्रदाताओं और घरेलू निवेशकों की जोखिम संबंधी चिंताओं को दूर किया जा सके।
निष्कर्ष:
SHANTI विधेयक, 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंज़ूरी भारत की परमाणु नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव का संकेत देती है जहाँ राज्य-प्रधान मॉडल से आगे बढ़कर एक समावेशी, प्रतिस्पर्धी और नवाचार-आधारित ढाँचा अपनाया जा रहा है। यदि संसद से पारित होकर इसका प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो यह विधेयक भारत की परमाणु क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि, ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूती और निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर तेज़ संक्रमण में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

