होम > Blog

Blog / 13 Aug 2026

धारा 187 BNSS: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कस्टडी की समय-सीमा बढ़ाई

संदर्भ:

हाल ही में, उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश राज्य बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू (2026) मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 187 के दायरे को, विशेष रूप से पुलिस अभिरक्षा के संबंध में,  स्पष्ट किया है। यह निर्णय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 167 के अंतर्गत पूर्व स्थिति से एक महत्वपूर्ण विचलन को दर्शाता है।

धारा 187 BNSS क्या है?

धारा 187 उस स्थिति में रिमांड से संबंधित है, जब 24 घंटे के भीतर जांच पूरी नहीं की जा सकती। यह पुलिस अभिरक्षा, न्यायिक अभिरक्षा तथा वैधानिक या डिफॉल्ट जमानत को विनियमित करती है। यद्यपि यह व्यापक रूप से CrPC की धारा 167 के अनुरूप है, BNSS पुलिस अभिरक्षा प्रदान करने के तरीके और समय के संबंध में अधिक लचीलापन प्रस्तुत करती है।

Section 187 BNSS: Supreme Court Expands Window for Police Custodyन्यायालय द्वारा की गई प्रमुख टिप्पणियाँ:

      • पुलिस अभिरक्षा के लिए विस्तारित अवधि: उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस अभिरक्षा की अधिकतम कुल अवधि 15 दिन ही रहती है। हालांकि, इन 15 दिनों को आवश्यक रूप से रिमांड के पहले 15 दिनों के भीतर पूरा करना अनिवार्य नहीं है। पुलिस अभिरक्षा प्रारंभिक 40 या 60 दिनों के दौरान हिस्सों या चरणों में मांगी जा सकती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि लागू कुल हिरासत अवधि 60 दिन है या 90 दिन। इस प्रकार, यह निर्णय पुलिस अभिरक्षा की अधिकतम अवधि में नहीं, बल्कि उसके उपयोग के समय-सीमा में परिवर्तन करता है।
      • CrPC की स्थिति से विचलन: पूर्ववर्ती CrPC व्यवस्था के अंतर्गत सीबीआई बनाम अनुपम जे. कुलकर्णीके निर्णय ने सामान्यतः पुलिस अभिरक्षा को पहले 15 दिनों तक सीमित कर दिया था। BNSS की धारा 187 जानबूझकर अभिरक्षा कोपूरी तरह या हिस्सों मेंप्रदान किए जाने की अनुमति देती है, जिससे जांचकर्ताओं को परिस्थितियों के उचित होने पर बाद में भी पुलिस अभिरक्षा मांगने की अनुमति मिलती है।
      • जांच संबंधी औचित्य: न्यायालय ने माना कि प्रारंभिक अभिरक्षा अवधि के बाद जांच में नए तथ्य, खोज या नए सुराग सामने आ सकते हैं। इसलिए, 15 दिनों के बाद किसी भी अतिरिक्त पुलिस अभिरक्षा को रोकने वाला कठोर नियम प्रभावी जांच, साक्ष्यों की बरामदगी और अपराध-स्थल के पुनर्निर्माण में बाधा डाल सकता है।
      • अधिवक्ता का अधिकार और सुरक्षा उपाय: न्यायालय ने BNSS की धारा 38 पर भी विचार किया, जो अभियुक्त को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार प्रदान करती है। हालांकि, यह प्रावधान पूरी पूछताछ के दौरान अधिवक्ता की निरंतर भौतिक उपस्थिति को आवश्यक नहीं बनाता।
      • साथ ही, अभिरक्षा संबंधी शक्तियां अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण के अधीन बनी रहती हैं। न्यायालय ने आवागमन के दौरान निरंतर वीडियोग्राफी जैसी अव्यावहारिक आवश्यकताओं को अस्वीकार किया, जबकि पूछताछ और बरामदगी की वीडियोग्राफी को एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय के रूप में मान्यता दी।
      • छह महीने की सुरक्षा: धारा 187 उन अभियुक्तों को भी संरक्षण प्रदान करती है, जिनके मामले मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय समन-मामले हैं। यदि गिरफ्तारी से छह महीने के भीतर जांच पूरी नहीं होती है, तो मजिस्ट्रेट को सामान्यतः आगे की जांच रोक देनी चाहिए, जब तक कि विशेष कारणों और न्याय के हित में जांच जारी रखना उचित न हो।

निष्कर्ष:

धारा 187 BNSS, CrPC व्यवस्था से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। 15 दिन पुलिस अभिरक्षा की अधिकतम कुल अवधि बनी रहती है, लेकिन इन 15 दिनों को विभाजित करके प्रारंभिक 40 या 60 दिनों के भीतर उपयोग किया जा सकता है। परिणामस्वरूप, यह प्रावधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए न्यायिक निगरानी और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए जांच में अधिक लचीलापन प्रदान करता है।

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj