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Blog / 24 Jan 2026

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A

संदर्भ:

हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों वाली पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर एक 'विभाजित फैसला' (Split Verdict) सुनाया है। यह धारा किसी भी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कथित अपराधों की जांच या अन्वेषण शुरू करने से पहले संबंधित सरकार से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य बनाती है। 

पृष्ठभूमि:

लोक सेवकों द्वारा रिश्वतखोरी और आपराधिक कदाचार से निपटने वाले कानूनों को समेकित करने के लिए 1988 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम लागू किया गया था। इसकी उत्पत्ति संथानम समिति (1962-64) से जुड़ी है, जिसने भारत में भ्रष्टाचार विरोधी कानून को मजबूत करने की सिफारिश की थी। 

PCA, 1988 की प्रमुख विशेषताएं:

        • लोक सेवक: इसमें सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश और सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन करने वाले व्यक्ति शामिल हैं।
        • सार्वजनिक कर्तव्य: इसे सरकार, जनता या सामुदायिक हित को प्रभावित करने वाली जिम्मेदारी के रूप में परिभाषित किया गया है।
        • दंडनीय अपराध: अधिनियम के तहत रिश्वतखोरी , आपराधिक कदाचार और बिना किसी उचित प्रतिफल के अनुचित लाभ प्राप्त करने को गंभीर अपराध माना गया है।
        • धारा 19: यह अदालत में लोक सेवक पर मुकदमा चलाने से पहले सरकार से पूर्व मंजूरी (Prior Sanction) का प्रावधान करती है। 

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धारा 17A के बारे में:

        • 2018 के संशोधन के माध्यम से लागू की गई धारा 17A का उद्देश्य निम्नलिखित के बीच अंतर करना था:
          • जानबूझकर किया गया भ्रष्टाचार।
          • सद्भावना (Good faith) में लिए गए निर्णय, जिनसे अनजाने में गलतियाँ हो सकती हैं।
        • यह लोक सेवकों द्वारा की गई सिफारिशों या लिए गए निर्णयों से संबंधित अपराधों की जांच शुरू करने से पहले सरकार से पूर्व अनुमति की मांग करती है। इसका उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को तुच्छ शिकायतों से बचाना और नौकरशाही में "सुरक्षित खेलने" (Play-it-safe) की प्रवृत्ति को रोकना था।

पूर्व न्यायिक निर्णय:

        • विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998): जांच से पहले पूर्व अनुमति की आवश्यकता वाले कार्यकारी आदेश को रद्द कर दिया गया था।
        • डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम सीबीआई (2014): DSPE अधिनियम की धारा 6A को अमान्य कर दिया गया था, जो वरिष्ठ अधिकारियों के लिए पूर्व मंजूरी अनिवार्य बनाती थी, क्योंकि यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन थी।
        • इन फैसलों ने इस बात पर जोर दिया कि लोक सेवकों को मिलने वाले व्यापक संरक्षण के कारण कानून के समक्ष समानता के अधिकार से समझौता नहीं होना चाहिए।

वर्तमान विभाजित फैसले (Split Verdict) के बारे में:

​'सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन' (CPIL) द्वारा दायर एक जनहित याचिका में धारा 17A को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने परस्पर विरोधी राय दी:

        • न्यायाधीश के.वी. विश्वनाथन का मत:
          • संरक्षण का समर्थन: उन्होंने ईमानदार अधिकारियों को उत्पीड़न से बचाने के लिए 'पूर्व अनुमति' की अनिवार्यता को उचित ठहराया।
          • स्वतंत्र संस्था की भूमिका: उन्होंने सुझाव दिया कि यह अनुमति स्वयं सरकार (Executive) के बजाय लोकपाल या लोकायुक्त जैसी स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा दी जानी चाहिए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
          • निर्णय लेने में अक्षमता का भय: उन्होंने आगाह किया कि सुरक्षा कवच के अभाव में नौकरशाहों में डर पैदा होगा, जिससे वे महत्वपूर्ण और निर्णायक कदम उठाने से बचेंगे (Decisional Paralysis)
        • न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना का मत:
          • असंवैधानिक घोषणा: उन्होंने धारा 17A को पूरी तरह असंवैधानिक और अवैध माना।
          • पुरानी व्यवस्था का दोहराव: उनका तर्क था कि यह प्रावधान "पुरानी शराब, नई बोतल" की तरह है, जो उन नियमों को फिर से लागू करने की कोशिश है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट पहले ही निरस्त कर चुका है।
          • समानता का उल्लंघन: उन्होंने कहा कि धारा 19 पहले से ही पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करती है। उनके अनुसार, धारा 17A अनुच्छेद 14 के तहत 'तार्किक वर्गीकरण' और 'स्पष्ट अंतर' की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और समानता के अधिकार का हनन करती है।

आगे की राह:

        • यह फैसला प्रशासनिक और न्यायिक प्रणाली में सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डालता है:
          • मामलों का त्वरित निस्तारण: भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का समयबद्ध और तेज़ निपटारा सुनिश्चित होना चाहिए, ताकि समाज में कानून का प्रभावी डर (Deterrence) बना रहे।
          • झूठी शिकायतों पर दंड: ईमानदार अधिकारियों को अनावश्यक मानसिक और कानूनी उत्पीड़न से बचाने के लिए, उनके विरुद्ध की गई आधारहीन या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर दंडात्मक कार्रवाई का सख्त प्रावधान होना चाहिए।

निष्कर्ष:

भारत की सुशासन व्यवस्था और भ्रष्टाचार विरोधी ढांचे की मजबूती के लिए नौकरशाही की जवाबदेही और ईमानदार लोक सेवकों के संरक्षण के बीच एक सटीक संतुलन बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।