सर्वोच्च न्यायालय का आवारा कुत्तों पर फैसला और अनुच्छेद 21 का विस्तार
संदर्भ:
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के दायरे का विस्तार किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों के हमलों के डर के बिना स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार है, विशेषकर उन परिस्थितियों में जब कुत्तों के काटने और रेबीज़ से मौतों के मामले बढ़ रहे हैं।
न्यायालय की मुख्य टिप्पणी:
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अनुच्छेद 21 की संवैधानिक व्याख्या:
- न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे, बुजुर्ग और आम नागरिक सड़कों, पार्कों, स्कूलों, अस्पतालों और परिवहन केंद्रों का उपयोग बिना किसी शारीरिक खतरे के भय के कर सकें।
- इस निर्णय ने अनुच्छेद 21 को एक नया आयाम देते हुए “सार्वजनिक स्थानों में भय-मुक्त जीवन” को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है।
- न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे, बुजुर्ग और आम नागरिक सड़कों, पार्कों, स्कूलों, अस्पतालों और परिवहन केंद्रों का उपयोग बिना किसी शारीरिक खतरे के भय के कर सकें।
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मानव अधिकार और पशु कल्याण में संतुलन:
- सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आवारा कुत्ते मानव जीवन के लिए खतरा बनते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर बिना नियंत्रण के रहने का असीमित अधिकार नहीं है। हालांकि संविधान का अनुच्छेद 51A(g) जीवों के प्रति करुणा को बढ़ावा देता है, लेकिन न्यायालय ने कहा कि पशु कल्याण नागरिकों के सुरक्षा, गतिशीलता और गरिमा से जुड़े अधिकारों (अनुच्छेद 19 और 21) पर हावी नहीं हो सकता।
- इस प्रकार, यह निर्णय पशुओं के प्रति मानवीय दृष्टिकोण और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आवारा कुत्ते मानव जीवन के लिए खतरा बनते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर बिना नियंत्रण के रहने का असीमित अधिकार नहीं है। हालांकि संविधान का अनुच्छेद 51A(g) जीवों के प्रति करुणा को बढ़ावा देता है, लेकिन न्यायालय ने कहा कि पशु कल्याण नागरिकों के सुरक्षा, गतिशीलता और गरिमा से जुड़े अधिकारों (अनुच्छेद 19 और 21) पर हावी नहीं हो सकता।
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“नो-रिलीज़ ज़ोन” (No-Release Zones) की घोषणा:
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि अधिक भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों में आवारा कुत्तों की उपस्थिति नहीं होनी चाहिए, जैसे:
- स्कूल और कॉलेज
- अस्पताल और क्लिनिक
- रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे और बस डिपो
- खेल परिसर और सार्वजनिक पार्क
- स्कूल और कॉलेज
- इन क्षेत्रों से पकड़े गए कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद भी वापस नहीं छोड़ा जाएगा। इसके बजाय उन्हें अधिकृत पशु आश्रयों (shelters) में स्थानांतरित करना होगा।
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि अधिक भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों में आवारा कुत्तों की उपस्थिति नहीं होनी चाहिए, जैसे:
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इच्छामृत्यु और भोजन संबंधी नियम:
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न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि इच्छामृत्यु (euthanasia) केवल उन कानूनी मामलों में ही अनुमति होगी जिनमें कुत्ते रेबीज़ से संक्रमित हों, गंभीर रूप से बीमार हों या विशेषज्ञ पशु चिकित्सकीय निगरानी में अत्यधिक आक्रामक पाए गए हों।
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इसके साथ ही कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को अनियंत्रित रूप से भोजन कराने पर रोक लगा दी है और नगर निकायों को निर्दिष्ट भोजन क्षेत्र (
designated feeding zones) बनाने के निर्देश दिए हैं।
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जवाबदेही और प्रशासनिक निर्देश:
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि प्रत्येक जिले में कम से कम एक पूर्ण रूप से कार्यशील पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control - ABC) केंद्र स्थापित किया जाए। उच्च न्यायालय इन निर्देशों के कार्यान्वयन की सतत निगरानी करेंगे। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अगस्त 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। साथ ही, आवारा कुत्तों के प्रबंधन में सद्भावनापूर्वक कार्य करने वाले अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा भी प्रदान की गई है।
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि प्रत्येक जिले में कम से कम एक पूर्ण रूप से कार्यशील पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control - ABC) केंद्र स्थापित किया जाए। उच्च न्यायालय इन निर्देशों के कार्यान्वयन की सतत निगरानी करेंगे। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अगस्त 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। साथ ही, आवारा कुत्तों के प्रबंधन में सद्भावनापूर्वक कार्य करने वाले अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा भी प्रदान की गई है।
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आगे की राह:
भारत को “वन हेल्थ अप्रोच” (One Health Approach) अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य, पशु कल्याण और पर्यावरण प्रबंधन को एकीकृत किया जाए। नसबंदी अभियानों का विस्तार, वैज्ञानिक कचरा निपटान, जन-जागरूकता बढ़ाना तथा पशु कल्याण संगठनों के साथ साझेदारी जैसे कदम आवश्यक हैं।
निष्कर्ष:
यह निर्णय अनुच्छेद 21 के दायरे का एक महत्वपूर्ण विस्तार है, जिसमें सार्वजनिक सुरक्षा को जीवन के अधिकार से जोड़ा गया है। यह एक संतुलित ढांचा स्थापित करने का प्रयास करता है, जो मानवीय और वैज्ञानिक आवारा कुत्ता प्रबंधन के माध्यम से मानव गरिमा और पशु कल्याण दोनों की रक्षा सुनिश्चित करता है।
