संदर्भ:
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से अपील की है कि नाबालिग बलात्कार पीड़िताओं के मामलों में गर्भपात की गर्भावधि सीमा (gestational limit) को हटाने के लिए कानून में संशोधन किया जाए। यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जो 15 वर्षीय पीड़िता की 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने से संबंधित थी।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ:
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- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में प्रजनन से जुड़े निर्णय केवल पीड़िता और उसके अभिभावकों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, न कि राज्य या चिकित्सा पेशेवरों के। न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने जोर दिया कि डॉक्टर केवल सहायक (facilitators) की भूमिका निभाते हैं और उन्हें नाबालिग पीड़िता तथा उसके माता-पिता के निर्णय का सम्मान करना चाहिए।
- न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 में महत्वपूर्ण सुधार किए जाएँ और नाबालिग बलात्कार पीड़िताओं के मामलों में गर्भावधि सीमा को पूरी तरह हटाया जाए। अदालत ने कहा कि रिपोर्टिंग और कानूनी प्रक्रियाओं में देरी के कारण अक्सर गर्भावस्था कानूनी सीमा से आगे बढ़ जाती है, और ऐसे में गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना गंभीर मानसिक आघात को बढ़ाता है।
- ट्रॉमा-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाते हुए, न्यायालय ने माना कि बलात्कार से उत्पन्न गर्भावस्था एक गहरा और स्थायी मानसिक घाव छोड़ती है, और पीड़िता को प्रसव के लिए मजबूर करना उसकी गरिमा और स्वतंत्रता का उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से सीधे जुड़ा है।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में प्रजनन से जुड़े निर्णय केवल पीड़िता और उसके अभिभावकों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, न कि राज्य या चिकित्सा पेशेवरों के। न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने जोर दिया कि डॉक्टर केवल सहायक (facilitators) की भूमिका निभाते हैं और उन्हें नाबालिग पीड़िता तथा उसके माता-पिता के निर्णय का सम्मान करना चाहिए।
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गर्भपात पर मौजूदा कानूनी ढांचा:
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- भारत में गर्भपात Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 (2021 संशोधन सहित) द्वारा नियंत्रित है, जो नाबालिग और बलात्कार पीड़िताओं जैसी विशेष श्रेणियों के लिए 24 सप्ताह तक गर्भ समाप्त करने की अनुमति देता है। 20 सप्ताह तक गर्भपात के लिए एक डॉक्टर की राय और 20–24 सप्ताह के बीच दो डॉक्टरों की अनुमति आवश्यक होती है, जो महिला के शारीरिक/मानसिक स्वास्थ्य जोखिम, भ्रूण में गंभीर विकृति या गर्भनिरोधक विफलता (विवाहित और अविवाहित दोनों महिलाओं के लिए) पर आधारित होती है।
- यह ढांचा सहमति और गोपनीयता की भी गारंटी देता है, जिसमें नाबालिगों के लिए अभिभावक की अनुमति आवश्यक होती है और मरीज की पहचान गोपनीय रखी जाती है। 24 सप्ताह से अधिक गर्भपात केवल असाधारण परिस्थितियों में मेडिकल बोर्ड की मंजूरी से किया जा सकता है। हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने प्रजनन अधिकारों को मौलिक अधिकार के रूप में और मजबूत किया है, जिससे एक अधिक मानवीय और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला है।
- भारत में गर्भपात Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 (2021 संशोधन सहित) द्वारा नियंत्रित है, जो नाबालिग और बलात्कार पीड़िताओं जैसी विशेष श्रेणियों के लिए 24 सप्ताह तक गर्भ समाप्त करने की अनुमति देता है। 20 सप्ताह तक गर्भपात के लिए एक डॉक्टर की राय और 20–24 सप्ताह के बीच दो डॉक्टरों की अनुमति आवश्यक होती है, जो महिला के शारीरिक/मानसिक स्वास्थ्य जोखिम, भ्रूण में गंभीर विकृति या गर्भनिरोधक विफलता (विवाहित और अविवाहित दोनों महिलाओं के लिए) पर आधारित होती है।
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महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के निर्णय:
यह न्यायिक दृष्टिकोण डॉक्टर-केन्द्रित ढांचे से हटकर महिला और बच्चे-केन्द्रित दृष्टिकोण की ओर स्पष्ट बदलाव दर्शाता है, जिसमें संस्थागत निर्णयों की बजाय पीड़िता की पसंद को प्राथमिकता दी गई है। यह निर्णय शारीरिक स्वायत्तता को मजबूत करता है और मानता है कि प्रजनन संबंधी निर्णय अत्यंत व्यक्तिगत होते हैं और संवैधानिक अधिकारों के तहत संरक्षित हैं। इसके साथ ही अनुच्छेद 21 का दायरा बढ़ाकर उसमें गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की जीवन संभावनाओं को भी शामिल किया गया है, जिससे जबरन गर्भधारण के दीर्घकालिक प्रभावों को स्वीकार किया गया है।
क्रियान्वयन में चुनौतियाँ:
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- कानून में संशोधन की आवश्यकता
- देर से किए गए गर्भपात से जुड़े नैतिक प्रश्न
- चिकित्सा अवसंरचना की तैयारी
- भ्रूण के अधिकार और पीड़िता के अधिकारों के बीच संतुलन
- कानून में संशोधन की आवश्यकता
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निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ एक प्रगतिशील बदलाव को दर्शाती हैं, जो कठोर कानूनी समय-सीमाओं की बजाय गरिमा, स्वायत्तता और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए पीड़िता-केंद्रित न्याय प्रणाली की ओर संकेत करती हैं।

