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Blog / 14 Feb 2026

सावलकोट जलविद्युत परियोजना

संदर्भ:

हाल ही में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर प्रस्तावित ₹5,129 करोड़ की सावलकोट जलविद्युत परियोजना को आगे बढ़ाने के भारत के निर्णय पर कड़ा विरोध जताया है। पाकिस्तान का आरोप है कि यह कदम भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं (विशेषकर सिंधु जल संधि) की भावना के विपरीत है। पाकिस्तान ने इसे जल-निर्जलीकरण नीतिकी संज्ञा देते हुए कहा है कि इससे उसके वैध जल अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) के बारे में:

सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच संपन्न एक ऐतिहासिक जल-वितरण समझौता है, जिसे विश्व बैंक की मध्यस्थता से अंतिम रूप दिया गया था। यह संधि सिंधु नदी तंत्र की छह प्रमुख नदियों के जल के उपयोग और प्रबंधन को नियंत्रित करती है।

मुख्य विशेषताएँ:

      • हस्ताक्षरकर्ता एवं तिथि: 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान द्वारा हस्ताक्षर किए गए।
      • नदियों का विभाजन:
        • पूर्वी नदियाँ (भारत): रावी, ब्यास और सतलुजनदियों का पूर्ण उपयोग भारत को प्राप्त है।
        • पश्चिमी नदियाँ (पाकिस्तान): “सिंधु, झेलम और चिनाब” नदियों पर पाकिस्तान का प्राथमिक अधिकार है, जबकि भारत को सीमित उपयोग की अनुमति है।
      • पश्चिमी नदियों पर भारत के अधिकार: घरेलू उपयोग, सिंचाई हेतु सीमित उपयोग, गैर-उपभोगात्मक कार्य तथा रन-ऑफ-द-रिवर प्रकार की जलविद्युत परियोजनाएँ स्थापित करने का अधिकार।
      • स्थायी सिंधु आयोग (पीआईसी): दोनों देशों के आयुक्तों से मिलकर बनी द्विपक्षीय संस्था, जो सूचना साझा करने, निरीक्षण और वार्षिक बैठकों के माध्यम से सहयोग सुनिश्चित करती है।
      • विवाद समाधान तंत्र:
        • तकनीकी प्रश्नों के लिए स्थायी सिंधु आयोग
        • मतभेद की स्थिति में विश्व बैंक द्वारा नियुक्त तटस्थ विशेषज्ञ
        • औपचारिक विवादों के लिए मध्यस्थता न्यायालय
      • सावलकोट परियोजना को 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि के कुछ प्रावधानों को स्थगित करने की घोषणा के पश्चात चिनाब नदी पर स्वीकृत पहली बड़ी परियोजना के रूप में देखा जा रहा है।

Sawalkote Hydropower Project

पाकिस्तान की प्रमुख आपत्तियाँ:

      • संधि दायित्वों के उल्लंघन का आरोप: पाकिस्तान का दावा है कि भारत का एकतरफा निर्णय संधि की प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं है। उसका कहना है कि परियोजना से संबंधित तकनीकी विवरणों पर सिंधु जल आयुक्तों के माध्यम से औपचारिक परामर्श किया जाना चाहिए था।
      • जल सुरक्षा संबंधी चिंता: पाकिस्तान का तर्क है कि उसकी बड़ी आबादी सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों पर निर्भर है। ऐसे में किसी भी बड़े जलविद्युत ढाँचे से उसके दीर्घकालिक जल प्रवाह और कृषि आवश्यकताओं पर प्रभाव पड़ सकता है।

भारत का पक्ष:

      • भारत का मत है कि सावलकोट जलविद्युत परियोजना एक वैध और संप्रभु विकास पहल है, जो संधि के प्रावधानों के अनुरूप रन-ऑफ-द-रिवर मॉडल पर आधारित है। भारत यह भी स्पष्ट करता है कि पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएँ स्थापित करना उसके अधिकार क्षेत्र में आता है, बशर्ते वे संधि की तकनीकी शर्तों का पालन करें।
      • भारत के अनुसार, ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय विकास और बुनियादी ढाँचे का विस्तार राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ हैं, और इन पर बाहरी आपत्तियाँ बाध्यकारी नहीं हो सकतीं।

सावलकोट जलविद्युत परियोजना के बारे में:

      • स्थान: चिनाब नदी पर, उधमपुर और रामबन जिलों के बीच; बगलीहार (ऊपरी धारा) और सलाल (निचली धारा) परियोजनाओं के मध्य
      • कुल स्थापित क्षमता: 1,856 मेगावाट
        • चरण-I: 1,406 मेगावाट
        • चरण-II: 450 मेगावाट
      • प्रकार: रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजना
      • लागत एवं समयसीमा: ₹5,129 करोड़; अनुमानित निर्माण अवधि लगभग 9 वर्ष, शीघ्र संचालन हेतु केंद्र सरकार का विशेष प्रयास

निष्कर्ष:

सावलकोट जलविद्युत परियोजना भारत की विकासात्मक आवश्यकताओं और सिंधु जल संधि के दायित्वों के बीच संतुलन की जटिलता को दर्शाती है, जहाँ भारत इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता और अवसंरचनात्मक प्रगति की दिशा में आवश्यक कदम मानता है, वहीं पाकिस्तान इसे अपनी जल सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील विषय समझता है। यह प्रकरण दक्षिण एशिया में सीमापार जल कूटनीति, संधि अनुपालन और विवाद समाधान की महत्ता को रेखांकित करता है तथा यह दर्शाता है कि अवसंरचना विकास, भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय विधि किस प्रकार परस्पर जुड़े हुए हैं।