संदर्भ:
3 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के राय पीथोरा सांस्कृतिक परिसर में पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस प्रदर्शनी का शीर्षक “द लाइट एंड द लोटस: रिलिक्स ऑफ़ द अवेकन्ड वन” रखा गया।
पिपरहवा अवशेषों के बारे में:
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- पिपरहवा अवशेष प्राचीन पुरावस्तुओं का एक संग्रह हैं, जिनमें अस्थि-अवशेष और रत्न शामिल हैं, जिन्हें व्यापक रूप से भगवान बुद्ध से संबंधित माना जाता है। इनकी खोज पहली बार 1898 में भारत–नेपाल सीमा के निकट पिपरहवा में एक स्तूप स्थल से हुई थी, जिसे पुरातात्विक रूप से प्राचीन कपिलवस्तु से जोड़ा जाता है—वह स्थान जहाँ बुद्ध ने संन्यास से पूर्व अपना प्रारंभिक जीवन बिताया।
- इन अवशेषों में पवित्र अवशेष-निधियाँ, अवशेष-पात्र (रिलिक्वेरी) और बहुमूल्य रत्नों का संग्रह शामिल है। औपनिवेशिक काल के दौरान इन पुरावस्तुओं का एक हिस्सा विदेश ले जाया गया था, जिनमें से कुछ बाद में निजी विदेशी संग्रहों में सामने आए।
- पिपरहवा अवशेष प्राचीन पुरावस्तुओं का एक संग्रह हैं, जिनमें अस्थि-अवशेष और रत्न शामिल हैं, जिन्हें व्यापक रूप से भगवान बुद्ध से संबंधित माना जाता है। इनकी खोज पहली बार 1898 में भारत–नेपाल सीमा के निकट पिपरहवा में एक स्तूप स्थल से हुई थी, जिसे पुरातात्विक रूप से प्राचीन कपिलवस्तु से जोड़ा जाता है—वह स्थान जहाँ बुद्ध ने संन्यास से पूर्व अपना प्रारंभिक जीवन बिताया।
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प्रदर्शनी का महत्व:
1. ऐतिहासिक पुनर्एकीकरण और प्रत्यावर्तन
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- इस प्रदर्शनी में प्रत्यावर्तित अवशेषों के साथ-साथ राष्ट्रीय संग्रहालय और भारतीय संग्रहालय जैसी भारतीय संस्थाओं में संरक्षित प्रामाणिक पुरातात्विक सामग्री को एक साथ प्रदर्शित किया गया है।
- यह एक सदी से अधिक समय में पहली बार है जब बिखरे हुए ये अवशेष एक ही स्थान पर एकत्रित किए गए हैं।
- इस प्रदर्शनी में प्रत्यावर्तित अवशेषों के साथ-साथ राष्ट्रीय संग्रहालय और भारतीय संग्रहालय जैसी भारतीय संस्थाओं में संरक्षित प्रामाणिक पुरातात्विक सामग्री को एक साथ प्रदर्शित किया गया है।
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2. सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत
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- यह आयोजन बौद्ध धर्म के साथ भारत के गहरे सभ्यतागत संबंध और उसके जन्मस्थल के रूप में भारत की भूमिका को रेखांकित करता है।
- यह भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए जा रहे नए प्रयासों को दर्शाता है।
- प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि बुद्ध की शिक्षाएँ कालातीत और सार्वभौमिक हैं तथा ये अवशेष केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि भारत की जीवंत विरासत का अभिन्न अंग हैं।
- यह आयोजन बौद्ध धर्म के साथ भारत के गहरे सभ्यतागत संबंध और उसके जन्मस्थल के रूप में भारत की भूमिका को रेखांकित करता है।
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3. जन-सहभागिता
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- इस प्रदर्शनी का उद्देश्य भारत के युवाओं को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है।
- सुव्यवस्थित प्रदर्शनों और इमर्सिव मल्टीमीडिया अनुभवों के माध्यम से आगंतुकों को बुद्ध के जीवन, शिक्षाओं और विरासत से जुड़ने के लिए प्रेरित किया गया है।
- इस प्रदर्शनी का उद्देश्य भारत के युवाओं को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है।
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रणनीतिक और कूटनीतिक आयाम:
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- पिपरहवा अवशेषों का प्रत्यावर्तन और प्रदर्शन भारत की व्यापक सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा है, जो वैश्विक बौद्ध विरासत और सॉफ्ट पावर के क्षेत्र में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को सुदृढ़ करता है।
- इन पुरावस्तुओं की वापसी में सरकारी समन्वय, संस्थागत सहयोग और नवीन सार्वजनिक–निजी भागीदारी मॉडल शामिल रहे, जो विरासत प्रत्यावर्तन के प्रति उभरते दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।
- पिपरहवा अवशेषों का प्रत्यावर्तन और प्रदर्शन भारत की व्यापक सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा है, जो वैश्विक बौद्ध विरासत और सॉफ्ट पावर के क्षेत्र में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को सुदृढ़ करता है।
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निष्कर्ष:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्षण है। यह भारत की प्राचीन सभ्यतागत विरासत के संरक्षण और उत्सव के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, एक सदी से अधिक समय बाद अमूल्य बौद्ध अवशेषों का पुनर्एकीकरण करता है तथा सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देते हुए भारत की आध्यात्मिक परंपराओं से जन-सहभागिता को गहराता है।
