रूस–चीन संबंध और पुतिन की बीजिंग यात्रा
संदर्भ:
हाल ही में, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 19–20 मई 2026 को बीजिंग का दौरा किया, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा के तुरंत बाद हुआ। दोनों देशो के बीच एक शिखर सम्मलेन का भी आयोजन किया गया। इस यात्रा ने वैश्विक कूटनीति में चीन की बढ़ती केंद्रीय भूमिका को उजागर किया।
रूस–चीन संबंधों की पृष्ठभूमि:
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- रूस और चीन के संबंधों में सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों पाए जाते है। शीत युद्ध के दौरान, 1950 की चीनी कम्युनिस्ट क्रांति के बाद दोनों देशों ने “मित्रता संधि” पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, वैचारिक मतभेदों के कारण 1960 के दशक में चीन–सोवियत विभाजन हुआ और 1969 में सीमा संघर्ष भी हुए।
- सोवियत संघ के पतन के बाद संबंधों में सुधार हुआ और व्लादिमीर पुतिन तथा शी जिनपिंग के नेतृत्व में यह संबंध काफी मजबूत हुए। 2022 में दोनों देशों ने इसे “बिना सीमाओं की साझेदारी” (no-limits partnership) घोषित किया।
- रूस और चीन के संबंधों में सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों पाए जाते है। शीत युद्ध के दौरान, 1950 की चीनी कम्युनिस्ट क्रांति के बाद दोनों देशों ने “मित्रता संधि” पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, वैचारिक मतभेदों के कारण 1960 के दशक में चीन–सोवियत विभाजन हुआ और 1969 में सीमा संघर्ष भी हुए।
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शिखर सम्मलेन बारे में:
शिखर सम्मेलन का मुख्य फोकस रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी सहयोग को मजबूत करना था। दोनों नेताओं ने ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार विस्तार, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), परिवहन संपर्क और वैश्विक शासन सुधारों पर चर्चा की। बैठक के दौरान 40 से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।
बैठक के मुख्य परिणाम:
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- द्विपक्षीय व्यापार और निवेश का विस्तार।
- ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष क्षेत्रों में अधिक सहयोग।
- “पावर ऑफ साइबेरिया” गैस पाइपलाइन परियोजनाओं पर अधिक ध्यान।
- व्यापार में स्थानीय मुद्राओं (युआन और रूबल) का अधिक उपयोग, जिससे डॉलर पर निर्भरता कम करने (डी-डॉलराइजेशन) को बढ़ावा दिया जा सके।
- “बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था” (multipolar world order) का संयुक्त समर्थन और पश्चिमी प्रभुत्व की आलोचना।
- द्विपक्षीय व्यापार और निवेश का विस्तार।
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रूस–चीन साझेदारी के लाभ:
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- रूस को यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद चीन से एक बड़ा आर्थिक सहारा मिला है।
- चीन बड़ी मात्रा में रूसी तेल, गैस और कच्चे माल खरीदता है, जिससे रूस की निर्यात आय को समर्थन मिलता है।
- चीन रूस को मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन और तकनीक प्रदान करता है, जिन्हें पहले पश्चिमी देशों से आयात किया जाता था।
- 2025 में रूस के कुल व्यापार का लगभग 32% हिस्सा चीन के साथ था, जो बीजिंग पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है।
- रूस वैश्विक मंचों पर, विशेषकर अमेरिका के दबाव के खिलाफ, चीन को कूटनीतिक और रणनीतिक समर्थन देता है।
- यह साझेदारी दोनों देशों को वैश्विक मामलों में पश्चिमी प्रभाव का संतुलन करने में मदद करती है।
- रूस को यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद चीन से एक बड़ा आर्थिक सहारा मिला है।
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साझेदारी के वैश्विक प्रभाव:
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- यह साझेदारी अमेरिका-नेतृत्व वाले वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देती है।
- यह बहुध्रुवीय (multipolar) विश्व की अवधारणा को बढ़ावा देती है, जिसमें कई शक्ति केंद्र होते हैं।
- यह स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देती है, जिससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होती है।
- यह वैश्विक व्यापार में धीरे-धीरे डी-डॉलराइजेशन में योगदान देती है।
- यह प्रमुख शक्तियों के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाती है।
- यह भारत, जापान और यूरोपीय देशों जैसे देशों को अपनी विदेश नीतियों को समायोजित करने के लिए मजबूर करती है।
- कुल मिलाकर, यह एक औपचारिक गठबंधन बनाए बिना वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल रही है।
- यह साझेदारी अमेरिका-नेतृत्व वाले वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देती है।
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भारत के लिए निहितार्थ:
रूस और चीन की यह बढ़ती नजदीकियां भारत की विदेश नीति के लिए एक गंभीर चुनौती पैदा कर सकती हैं:
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- रणनीतिक दुविधा: भारत पारंपरिक रूप से रूस का एक मजबूत रक्षा और रणनीतिक साझेदार रहा है। रूस का चीन के पाले में पूरी तरह चले जाना वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत की स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
- रक्षा आपूर्ति पर प्रभाव: भारत अभी भी अपने सैन्य उपकरणों के लिए रूस पर निर्भर है। रूस-चीन की घनिष्ठता संकट के समय इन आपूर्तियों को प्रभावित कर सकती है।
- बहुध्रुवीयता बनाम एकध्रुवीयता: भारत भी एक बहुध्रुवीय विश्व का समर्थन करता है, लेकिन वह चीनी प्रभुत्व वाले एशिया के पक्ष में नहीं है।
- रणनीतिक दुविधा: भारत पारंपरिक रूप से रूस का एक मजबूत रक्षा और रणनीतिक साझेदार रहा है। रूस का चीन के पाले में पूरी तरह चले जाना वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत की स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
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निष्कर्ष:
रूस के राष्ट्रपति पुतिन की हालिया बीजिंग यात्रा पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता को उजागर करती है। साथ ही ट्रंप द्वारा शी जिनपिंग के साथ संबंध सुधारने के प्रयासों के बीच, भारत को अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक कूटनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने चाहिए।

